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दिगंबर जैन मंदिर में शुरू हुआ मोक्ष कल्याणक महोत्सव
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दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित मोक्ष कल्याणक महोत्सव के दौरान पूजन करते व मौजूद जैन समुदाय के लोग
- फोटो : SRAWASTI
कटरा (श्रावस्ती)। दिगंबर जैन मंदिर श्रावस्ती में शुक्रवार को मोक्ष कल्याणक महोत्सव प्रारंभ हुआ। दिगंबर जैन समिति के अध्यक्ष की अध्यक्षता में प्रारंभ हुए इस महोत्सव में मुनि सुबल सागर के साथ पंडित आशीष जैन ने श्रीजी का अभिषेक किया। इस दौरान विधान से पूजन किया गया।
दिगंबर जैन मंदिर श्रावस्ती में शुक्रवार को मोक्ष कल्याणक महोत्सव प्रारंभ हुआ। दिगंबर जैन समिति के अध्यक्ष संजीव जैन की अध्यक्षता में महोत्सव का प्रारंभ हुआ। इस दौरान सर्वप्रथम भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमय पूजन, दसभक्ति पाठ, मोक्ष गमन, निर्वाण कल्याणक पूजन, शांति यज्ञ व विसर्जन हुआ। भगवान के मोक्ष कल्याणक के बाद भगवान संभवनाथ का प्रथम मस्तकाभिषेक हुआ।
इस दौरान मुनि सुबल सागर ने कहा कि भगवान की भक्ति में अपना मन लगाकर रखें। इसी से हमारी आत्मा के परिणाम शुद्ध होते हैं। इसी से मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होगी। हम अक्सर एक त्रुटि करते हैं कि मोक्ष कल्याणक को अंतिम कल्याणक कहते हैं। एक तरह से चंद्रप्रभु की आत्मा के लिए मोक्षगमन के साथ यह अंतिम पड़ाव हो, किंतु तीर्थंकरत्व की यात्रा जो एक दर्शन को समग्र रूप देती है, अंतिम कहना विचारणीय है।
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वास्तव में मोक्षगमन जैन दर्शन के चिंतन की चरमोत्कृष्ट अवस्था है। समस्त कल्याणक महोत्सव का यह सरताज है। वहीं पंडित आशीष जैन भिंड वाले ने कहा कि मूर्ख लोग मिट्टी के पुतले की तरह ही होते हैं कि एक बार गिरे नहीं कि अपने अस्तित्व से भी विहीन हो जाते हैं और सज्जन तो सोने के आभूषण की तरह होते हैं काले से काले व्यक्त की शोभा को बढ़ा देते हैं। बुद्धि के बल से संसार में बड़े से बड़े कार्य किए जा सकते हैं। इस मौक पर महेंद्र कुमार जैन, सुरेंद्र कुमार जैन, स्वरूप चंद जैन, रूपेश कुमार जैन, प्रकाश चंद्र जैन, अनुराग जैन आदि जैन समुदाय के लोग मौजूद रहे।
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दिगंबर जैन मंदिर श्रावस्ती में शुक्रवार को मोक्ष कल्याणक महोत्सव प्रारंभ हुआ। दिगंबर जैन समिति के अध्यक्ष संजीव जैन की अध्यक्षता में महोत्सव का प्रारंभ हुआ। इस दौरान सर्वप्रथम भगवान जिनेंद्र का अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमय पूजन, दसभक्ति पाठ, मोक्ष गमन, निर्वाण कल्याणक पूजन, शांति यज्ञ व विसर्जन हुआ। भगवान के मोक्ष कल्याणक के बाद भगवान संभवनाथ का प्रथम मस्तकाभिषेक हुआ।
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इस दौरान मुनि सुबल सागर ने कहा कि भगवान की भक्ति में अपना मन लगाकर रखें। इसी से हमारी आत्मा के परिणाम शुद्ध होते हैं। इसी से मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होगी। हम अक्सर एक त्रुटि करते हैं कि मोक्ष कल्याणक को अंतिम कल्याणक कहते हैं। एक तरह से चंद्रप्रभु की आत्मा के लिए मोक्षगमन के साथ यह अंतिम पड़ाव हो, किंतु तीर्थंकरत्व की यात्रा जो एक दर्शन को समग्र रूप देती है, अंतिम कहना विचारणीय है।
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वास्तव में मोक्षगमन जैन दर्शन के चिंतन की चरमोत्कृष्ट अवस्था है। समस्त कल्याणक महोत्सव का यह सरताज है। वहीं पंडित आशीष जैन भिंड वाले ने कहा कि मूर्ख लोग मिट्टी के पुतले की तरह ही होते हैं कि एक बार गिरे नहीं कि अपने अस्तित्व से भी विहीन हो जाते हैं और सज्जन तो सोने के आभूषण की तरह होते हैं काले से काले व्यक्त की शोभा को बढ़ा देते हैं। बुद्धि के बल से संसार में बड़े से बड़े कार्य किए जा सकते हैं। इस मौक पर महेंद्र कुमार जैन, सुरेंद्र कुमार जैन, स्वरूप चंद जैन, रूपेश कुमार जैन, प्रकाश चंद्र जैन, अनुराग जैन आदि जैन समुदाय के लोग मौजूद रहे।