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जीवन भर रही टीस, अब तक नहीं मिला आशियाना

Sat, 19 Sep 2020 12:24 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 19 Sep 2020 12:24 AM IST
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Twenty-one life, not yet got home
कैराना के मशहूर शायर मुजफफर रज्मी एक प्रोग्राम में शायरी करते हुए-फाइल फोटो - फोटो : SHAMLI
कैराना। अपनी शायरी से देश और दुनिया में नाम कमाने वाले मकबूल शायर मुजफ्फर रज्मी खुद के एक अदद आशियाने के लिए जीवन भर बेचैन रहे, वह उनकी मौत के आठ साल बाद भी उनके परिवार को नसीब न हो सका।
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मुजफ्फरनगर रज्मी का परिवार आज भी नगर पालिका के उसी किराये के मकान में रहता है जहां रज्मी खुद रहा करते थे। खुद की छत न होने की टीस में ही शायद उन्होंने लिखा था ‘परिंदे भी नहीं रहते पराये आशियानों में, हमने उम्र गुजार दी किराये के मकानों में।’ कैराना में पांच जून 1935 को जन्में मुजफ्फर रज्मी कैराना नगर पालिका में लिपिक के पद पर नौकरी करते थे। वह नगरपालिका के ही किराये के मकान में रहते थे। पालिका की नौकरी करते करते धीरे-धीरे वह शायरी की दुनिया में शोहरत हासिल करने लगे। उनका कहा गया शेर ‘ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई’ कई बार संसद में पढ़ा गया। बड़े-बड़े नामचीन मंचों पर इस मकबूल शायर के इस शेर ने शोहरत पाई। सुषमा स्वराज ने इस शेर को संसद की कार्यवाही के दौरान पूरा पढ़ा था। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उन्हें दो बार आमंत्रित किया था।
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मुजफ्फर रज्मी अपनी शायरी की बदौलत चर बार सउदी अरब, एक-एक बार बहरीन और पाकिस्तान गए। उन्होंनेे अपनी शायरी के दम पर कैराना का नाम रोशन किया लेकिन उनके अपने आवास का सपना पूरा न हो सका। आज भी उनका परिवार उसी किराये के मकान में रहने को मजबूर है। मुजफ्फर रज्मी का 19 सितंबर 2012 को इंतकाल हो गया था। उनके तीन बेटे जावेद इकबाल, परवेज जमाल व नवेद कमाल अपने परिवार के साथ आज भी मोहल्ला बेगमपुरा में नगर पालिका के उसी किराये के मकान में रहते हैं, जहां मुजफ्फर रज्मी रहा करते थे। नवेद कमाल ने बताया कि लॉकडाउन से पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किराये के मकान में हो रही परेशानी के बारे में पत्र लिखा था। साथ ही उनके वालिद द्वारा पढ़ी गईं गजलों को भी पत्र के साथ भेजा था। 27 जुलाई को उनको प्रधानमंत्री कार्यालय से धन्यवाद पत्र मिला है लेकिन इसमें आवास के संबंध में कोई जिक्र नहीं किया गया है।
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