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जाट-मुस्लिम समीकरण कराई सपा-रालोद गठबंधन की नैया पार
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शामली। विधानसभा चुनाव में जिले में जाट-मुस्लिमों समीकरण के बलबूते सपा-रालोद गठबंधन की नैया पार हो गई। इस समीकरण के चलते जहां कैराना सीट बरकरार रही, वहीं थानाभवन और शामली सीट भी भाजपा से छीन ली।
जिला बनने के बाद वर्ष 2012 में हुए चुनाव में कैराना विधानसभा सीट पर भाजपा के हुकुम सिंह जीते थे। हुकुम सिंह ने हसन परिवार के बसपा प्रत्याशी हाजी अनवर को हराकर जीत दर्ज की थी। जबकि थानाभवन विधानसभा सीट पर भाजपा के सुरेश राणा ने आरएलडी के अशरफ अली को हराया था। जबकि बसपा के अब्दुल राव वारिस तीसरे नंबर पर रहे थे। शामली विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी पंकज मलिक ने सपा के वीरेंद्र सिंह को हराया था। मुजफ्फरनगर जिले के कवाल कांड के बाद शामली में हुए सांप्रदायिक दंगे के बाद हुए 2017 के विधानसभा चुनाव में शामली विधान सभा सीट पर तेजेंद्र निर्वाल ने सपा-कांग्रेस गठबंधन के पंकज मलिक को हराकर भाजपा के खाते में यह सीट डाल दी थी।
थानाभवन विधानसभा सीट पर भाजपा के सुरेश राणा दूसरी बार बसपा के अब्दुल राव वारिस को हराकर विधायक बने। प्रदेश में भाजपा की सरकार आने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार में सुरेश राणा को गन्ना मंत्री की जिम्मेदारी दी सौंपी। किसान आंदोलन के बाद उभर कर आए सपा-रालोद गठबंधन में जिले की जाट मुस्लिम-समीकरण के आधार पर विधानसभा चुनाव 2022 में प्रत्याशी घोषित किए गए। जिसमें थानाभवन सीट पर गठबंधन ने रालोद से मुस्लिम प्रत्याशी के रूप में अशरफ अली और शामली विधानसभा सीट पर जाट प्रत्याशी प्रसन्न चौधरी को टिकट दिया। जबकि कैराना से सपा विधायक नाहिद हसन को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा गया।
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कैराना विधानसभा सीट पर नामांकन करने के अगले दिन ही नाहिद हसन गैंगस्टर के मामले में जेल चले गए। भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जिले मे गुर्जर, जाट और ठाकुर कार्ड खेलते हुए कैराना विधानसभा सीट पर भाजपा के पूर्व सांसद हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह गुर्जर, शामली विधानसभा सीट पर विधायक तेजेंद्र निर्वाल जाट और थानाभवन विधानसभा सीट पर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा को प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा। किसान आंदोलन और देरी से गन्ना भुगतान होने से जाट मतदाताओं में नाराजगी दिखाई दी। जबकि मुस्लिम मतदाताओं में ध्रुवीकरण हुआ। जिसके चलते जाट-मुस्लिम समीकरण का पूरा फायदा गठबंधन को हुआ। भाजपा को जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। लखीमपुर खीरी कांड के बाद कैराना विधानसभा सीट पर सिख वोट बैंक भी भाजपा से खिसक गया। इसके अलावा हर सीट आमने-सामने का मुकाबला भी भाजपा के लिए घाटे का सौदा साबित रहा।
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जिला बनने के बाद वर्ष 2012 में हुए चुनाव में कैराना विधानसभा सीट पर भाजपा के हुकुम सिंह जीते थे। हुकुम सिंह ने हसन परिवार के बसपा प्रत्याशी हाजी अनवर को हराकर जीत दर्ज की थी। जबकि थानाभवन विधानसभा सीट पर भाजपा के सुरेश राणा ने आरएलडी के अशरफ अली को हराया था। जबकि बसपा के अब्दुल राव वारिस तीसरे नंबर पर रहे थे। शामली विधानसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी पंकज मलिक ने सपा के वीरेंद्र सिंह को हराया था। मुजफ्फरनगर जिले के कवाल कांड के बाद शामली में हुए सांप्रदायिक दंगे के बाद हुए 2017 के विधानसभा चुनाव में शामली विधान सभा सीट पर तेजेंद्र निर्वाल ने सपा-कांग्रेस गठबंधन के पंकज मलिक को हराकर भाजपा के खाते में यह सीट डाल दी थी।
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थानाभवन विधानसभा सीट पर भाजपा के सुरेश राणा दूसरी बार बसपा के अब्दुल राव वारिस को हराकर विधायक बने। प्रदेश में भाजपा की सरकार आने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार में सुरेश राणा को गन्ना मंत्री की जिम्मेदारी दी सौंपी। किसान आंदोलन के बाद उभर कर आए सपा-रालोद गठबंधन में जिले की जाट मुस्लिम-समीकरण के आधार पर विधानसभा चुनाव 2022 में प्रत्याशी घोषित किए गए। जिसमें थानाभवन सीट पर गठबंधन ने रालोद से मुस्लिम प्रत्याशी के रूप में अशरफ अली और शामली विधानसभा सीट पर जाट प्रत्याशी प्रसन्न चौधरी को टिकट दिया। जबकि कैराना से सपा विधायक नाहिद हसन को प्रत्याशी बनाकर मैदान में उतारा गया।
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कैराना विधानसभा सीट पर नामांकन करने के अगले दिन ही नाहिद हसन गैंगस्टर के मामले में जेल चले गए। भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जिले मे गुर्जर, जाट और ठाकुर कार्ड खेलते हुए कैराना विधानसभा सीट पर भाजपा के पूर्व सांसद हुकुम सिंह की पुत्री मृगांका सिंह गुर्जर, शामली विधानसभा सीट पर विधायक तेजेंद्र निर्वाल जाट और थानाभवन विधानसभा सीट पर प्रदेश के गन्ना मंत्री सुरेश राणा को प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा। किसान आंदोलन और देरी से गन्ना भुगतान होने से जाट मतदाताओं में नाराजगी दिखाई दी। जबकि मुस्लिम मतदाताओं में ध्रुवीकरण हुआ। जिसके चलते जाट-मुस्लिम समीकरण का पूरा फायदा गठबंधन को हुआ। भाजपा को जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा। लखीमपुर खीरी कांड के बाद कैराना विधानसभा सीट पर सिख वोट बैंक भी भाजपा से खिसक गया। इसके अलावा हर सीट आमने-सामने का मुकाबला भी भाजपा के लिए घाटे का सौदा साबित रहा।