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प्राण प्रातिष्ठा: पैरों में पड़ गए थे छाले, फिर भी नहीं थके कदम, आज हर्षित हो रहा कारसेवकों का मन

Mon, 22 Jan 2024 11:13 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शामली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शामली Published by: Dimple Sirohi Updated Mon, 22 Jan 2024 11:13 AM IST
सार

राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर आज रामभक्तों में गजब का उल्लास है। वर्ष 1990 में अयोध्या के लिए शामली से 11 कार सेवकों का जत्था रवाना हुआ था। लखनऊ से आगे गांव दर गांव पैदल चलकर अयोध्या जाते समय कई कार सेवकों के पैरों में छाले भी पड़ गए थे लेकिन अयोध्या की तरफ बढ़ते कदम नहीं रूके।
 

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Pran Pratishtha: There were blisters on the feet, still steps did not get tired, today Kar Sevaks are Happy
रविंद्र सिंह, चंद सेन - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

1990 में अयोध्या के लिए शामली से 11 कार सेवकों का जत्था रवाना हुआ था। लखनऊ से आगे गांव दर गांव पैदल चलकर अयोध्या जाते समय कई कार सेवकों के पैरों में छाले तक पड़ गए थे, लेकिन अयोध्या की तरफ बढ़ते कदम नहीं रूके। इन 11 में चार रामभक्त स्वर्गवासी हो चुके हैं। रामभक्तों का कहना है कि आज श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को देखकर लग रहा है कि मानों उनका सपना पूरा हो रहा है। इस जत्थे में शामिल रहे कार सेवक गांव बलवा निवासी एवं सरस्वती बालिका विद्या मंदिर इंटर कॉलेज शामली के प्रधानाचार्य रविंद्र कुमार की जुबानी उस दौर की कहानी...

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यह बात 19 अक्तूबर 1990 की है, जब वह अपने गांव के चरण सिंह, मैनपाल, रमेश चंद सहित सात लोग शामली से बिजेंद्र, तेजपाल, सुरेश चंद्र, सुरेश कुमार और हरिओम पाठक सभी चंद्रदेव के नेतृत्व में अयोध्या जाने के लिए रवाना हुए।

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सभी सहारनपुर से ट्रेन में बैठकर लखनऊ पहुंचे थे। लखनऊ से कोई साधन अयोध्या जी के लिए नहीं मिला, सरकार ने सभी परिवहन के साधन बंद कर रखे थे। किसी तरह से एक टेंपो में बैठकर बाराबंकी पहुंचे। वहां एक परिचित के यहां रात में रुके। वहां से अगले दिन अयोध्या के लिए रवाना हुए।

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पहले दिन हम लालदास की कुटिया में रुके। वहीं पर भोजन किया। उसके बाद गांव-गांव होते हुए अयोध्या की तरफ बढ़ते रहे। जत्थे में कुछ साथियों के पैरों में छाले पड़ गए थे, जिनकी मवाद इंजेक्शन से निकालते थे। जिस गांव में हम जाते, उस गांव के लोग हमें अगला रास्ता बताते थे और हमारे भोजन और नाश्ते की अच्छी व्यवस्था करते थे।

अयोध्या से 10-12 किलोमीटर दूर मानापुर गांव में बहुत सारे कार सेवक इकट्ठे हुए थे। उस गांव को पुलिस ने घेर लिया था। गांव वालों ने सबको भोजन कराया और पास के एक बाग में भेज दिया। बाग को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया था। एक पुलिस अधिकारी पुलिस के साथ वहां पहुंचे और उन्होंने सभी कार सेवकों से विनती की कि आप यहीं बाग में रुके। आपके लिए बाग को ही जेल बना दिया जाएगा।

गांव के लोग आपके भोजन पानी की व्यवस्था करेंगे, लेकिन कार सेवकों ने उनकी बात नहीं मानी और जय श्रीराम का नारा लगाते हुए हैं वहां से निकलकर चल दिए और पुलिस देखती रह गई। गांव वालाें ने पुलिस वालों की गाड़ी के पहियों की हवा निकाल दी थी। इसके बाद सभी वहां से निकवे। अयोध्या से लगभग छह किलोमीटर दूर रास्ते में थक गए तो श्मशान में बने चबूतरे पर पर सो गए। उस गांव के लोग रात्रि 11 बजे वहां आए। उन्होंने वहीं पर श्मशान में ही उन्हें भोजन कराया।

30 अक्तूबर की सुबह उठकर हम अयोध्या की तरफ बढ़े और पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़कर सभी कार सेवक अयोध्या में घुस गए। यह देखकर पुलिस प्रशासन के हाथ पैर फूल गए थे। हम वहां एक आईटीआई के भवन में रुक गए। पास में ही एक गांव के लोगों ने हमारे लिए भोजन भेज दिया था। इसके बाद पुलिस ने हमें वहां से बस में बैठा कर लखनऊ तक भेज दिया। फिर वे एक नवंबर को शामली के लिए वहां से चले थे।

रविंद्र कुमार कहते हैं कि उनके जत्थे में शामिल बिजेंद्र, गोविंद, सुरेश ओर तेजपाल तो स्वर्गवासी हो चुके हैं,लेकिन हम सात कार सेवक बड़े सौभाग्यशाली है कि आज अयोध्या में श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम हो रहा है और हम श्री रामचंद्र के भव्य मंदिर का निर्माण होते देख रहे हैं। 

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