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‘...अब आप देवकी नंदन से समाचार सुनिए’
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संवाद न्यूज एजेंसी शामली। वर्ष 1927 में देश में शुरू हुआ रेडियो का सफर इन 95 सालों में रोचक किस्सों-कहानियों से भरा है। नई पीढ़ी भले ही मोबाइल और कारों में रेडियो लेकर चलती हो पर एक जमाना था, जब रेडियो किसी अजूबे से कम नहीं था। तब रेडियो के लिए लाइसेंस लेना होता था। बुजुर्गों के जेहन में आज भी उन अनदेखे चेहरों की आवाज है जो वह रेडियो पर सुना करते थे। इसके अलावा समाचार, आपकी पसंद के गाने, कृषि से जुड़े कार्यक्रम तब लोगों की पसंद हुआ करते थे।
रेडियो के लिए लेना पड़ता था लाइसेंस
काका नगर निवासी सत्यप्रभा ने बताया कि जब उनके घर रेडियो आया था। तब रेडियो प्रसारण सुनने के लिए लाइसेंस लेना होता था। डोमेस्टिक लाइसेंस अपने लिए लिया जाता था और कॉमर्शियल लाइसेंस अन्य लोगों को प्रसारण सुनवाने के लिए लिया जाता था। उस समय पूरे मोहल्ले में चुनिंदा घरों में ही रेडियो था। जिस तरह टीवी पर रामायण और महाभारत देखने के लिए घरों में भीड़ जुटती थी, उसी तरह रेडियो सुनने के लिए भी लोग एकत्रित हुआ करते थे। तब रेडियो दहेज में भी दिया जाता था।
1966 में खरीदा पहला रेडियो
पेलखा गांव निवासी पीतम सिंह की आंखों से जरूर धुंधला दिखाई देता है, लेकिन, रेडियो से जुड़ी यादें आज भी उनके जेहन में उजली हैं। वर्ष 1966 में उन्होंने रेडियो खरीदा था। मुस्कुराते हुए बताते हैं कि रात नौ बजे के बुलेटिन में एक ही आवाज सुनाई देती थी... ये आकाशवाणी है.. ...अब आप देवकी नंदन से समाचार सुनिए।
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रेडियो पर ही सुना भारत-पाक और कारगिल युद्ध का हाल
हनुमान रोड निवासी नरेंद्र सिंघल बताते हैं कि रेडियो उनका पुराना साथी रहा है। खेती से भारत-पाकिस्तान युद्ध और कारगिल युद्ध तक की सूचनाएं उन्हें रेडियो से ही मिली। जब उन्होंने रेडियो खरीदा और लाइसेंस भी लिया था। तब जिस घर में रेडियो होता था उसे समृद्ध माना जाता था। ओमवीर कहते हैं कि आज मोबाइल फोन में ही रेडियो आ गया है।
1977 में खरीदा था पहला रेडियो
माजरा रोड निवासी सुनील निर्वाल कहते हैं कि वर्ष 1977 में अपना पहला मर्फी रेडियो खरीदा था। समाचार, आपकी पसंद के गाने, कृषि से जुड़े कार्यक्रम तब उनकी पसंद थे। जब वह रेडियो सुना करते थे तो गांव के लोग उनके पास आ जाते। सब मिलने वाली जानकारी व समाचारों पर चर्चा किया करते थे।
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रेडियो के लिए लेना पड़ता था लाइसेंस
काका नगर निवासी सत्यप्रभा ने बताया कि जब उनके घर रेडियो आया था। तब रेडियो प्रसारण सुनने के लिए लाइसेंस लेना होता था। डोमेस्टिक लाइसेंस अपने लिए लिया जाता था और कॉमर्शियल लाइसेंस अन्य लोगों को प्रसारण सुनवाने के लिए लिया जाता था। उस समय पूरे मोहल्ले में चुनिंदा घरों में ही रेडियो था। जिस तरह टीवी पर रामायण और महाभारत देखने के लिए घरों में भीड़ जुटती थी, उसी तरह रेडियो सुनने के लिए भी लोग एकत्रित हुआ करते थे। तब रेडियो दहेज में भी दिया जाता था।
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1966 में खरीदा पहला रेडियो
पेलखा गांव निवासी पीतम सिंह की आंखों से जरूर धुंधला दिखाई देता है, लेकिन, रेडियो से जुड़ी यादें आज भी उनके जेहन में उजली हैं। वर्ष 1966 में उन्होंने रेडियो खरीदा था। मुस्कुराते हुए बताते हैं कि रात नौ बजे के बुलेटिन में एक ही आवाज सुनाई देती थी... ये आकाशवाणी है.. ...अब आप देवकी नंदन से समाचार सुनिए।
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रेडियो पर ही सुना भारत-पाक और कारगिल युद्ध का हाल
हनुमान रोड निवासी नरेंद्र सिंघल बताते हैं कि रेडियो उनका पुराना साथी रहा है। खेती से भारत-पाकिस्तान युद्ध और कारगिल युद्ध तक की सूचनाएं उन्हें रेडियो से ही मिली। जब उन्होंने रेडियो खरीदा और लाइसेंस भी लिया था। तब जिस घर में रेडियो होता था उसे समृद्ध माना जाता था। ओमवीर कहते हैं कि आज मोबाइल फोन में ही रेडियो आ गया है।
1977 में खरीदा था पहला रेडियो
माजरा रोड निवासी सुनील निर्वाल कहते हैं कि वर्ष 1977 में अपना पहला मर्फी रेडियो खरीदा था। समाचार, आपकी पसंद के गाने, कृषि से जुड़े कार्यक्रम तब उनकी पसंद थे। जब वह रेडियो सुना करते थे तो गांव के लोग उनके पास आ जाते। सब मिलने वाली जानकारी व समाचारों पर चर्चा किया करते थे।