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Shamli News: नीतू और कविता कान्हा जी की ड्रेस तैयार कर बनीं आत्मनिर्भर
Tue, 28 Apr 2026 12:44 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Tue, 28 Apr 2026 12:44 AM IST
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गांव भैंसवाल में कान्हा जी की ड्रैस तैयार करती महिला नीतू। महिला
- फोटो : गुलरा परसोहना में ढहाया गया अतिक्रमण।
शामली। गांव लिलौन की कविता और भैंसवाल की नीतू ने समूह बनाकर स्थानीय कारीगरी को नई ऊंचाई दी है। दोनों महिलाओं ने मिलकर कान्हा जी की ड्रेस तैयार करना शुरू किया, जिसमें पारंपरिक शिल्प और आधुनिक डिजाइन का अनूठा मेल देखने को मिलता है।
गांव भैंसवाल की नीतू पिछले आठ वर्षों से कार्य करते हुए परिवार का पालन पोषण कर आगे बढ़ रही हैं। इनके साथ महिला रेनू, ममता, कुसुम आदि भी जुड़ी हैं। वहीं गांव लिलौन की कविता भी कई वर्षों से कान्हा जी के कपड़े तैयार कर बाजारों में सप्लाई कर रही हैं। महिलाओं का कहना है कि वह गर्मी और सर्दी के कपड़े तैयार करती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के समय तो उन्हें 50 से साठ हजार रुपये महीने तक की बचत हो जाती है। इस प्रयास के माध्यम से न केवल उन्होंने अपने हुनर को निखारा, बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त हुईं। शुरूआत में छोटे ऑर्डर लेकर काम शुरू करने वाली कविता और नीतू अब अपने डिजाइन की मांग शहरों तक पहुंचा रही हैं।
गांव के अन्य लोगों ने भी इस पहल को प्रेरक बताया है और कई युवा महिलाओं ने उनके मॉडल को अपनाने की सोच बनाई है। स्थानीय बाजार में ड्रैस की मांग बढ़ने से दोनों महिलाओं को स्थिर आमदनी मिली है और उनका समूह धीरे-धीरे एक सफल व्यवसाय में बदल रहा है। यह प्रयास ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का शानदार उदाहरण बन गया है, जो दिखाता है कि स्थानीय संसाधनों और हुनर के माध्यम से आर्थिक सफलता पाई जा सकती है।
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गांव भैंसवाल की नीतू पिछले आठ वर्षों से कार्य करते हुए परिवार का पालन पोषण कर आगे बढ़ रही हैं। इनके साथ महिला रेनू, ममता, कुसुम आदि भी जुड़ी हैं। वहीं गांव लिलौन की कविता भी कई वर्षों से कान्हा जी के कपड़े तैयार कर बाजारों में सप्लाई कर रही हैं। महिलाओं का कहना है कि वह गर्मी और सर्दी के कपड़े तैयार करती हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के समय तो उन्हें 50 से साठ हजार रुपये महीने तक की बचत हो जाती है। इस प्रयास के माध्यम से न केवल उन्होंने अपने हुनर को निखारा, बल्कि आर्थिक रूप से भी सशक्त हुईं। शुरूआत में छोटे ऑर्डर लेकर काम शुरू करने वाली कविता और नीतू अब अपने डिजाइन की मांग शहरों तक पहुंचा रही हैं।
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गांव के अन्य लोगों ने भी इस पहल को प्रेरक बताया है और कई युवा महिलाओं ने उनके मॉडल को अपनाने की सोच बनाई है। स्थानीय बाजार में ड्रैस की मांग बढ़ने से दोनों महिलाओं को स्थिर आमदनी मिली है और उनका समूह धीरे-धीरे एक सफल व्यवसाय में बदल रहा है। यह प्रयास ग्रामीण महिला सशक्तिकरण का शानदार उदाहरण बन गया है, जो दिखाता है कि स्थानीय संसाधनों और हुनर के माध्यम से आर्थिक सफलता पाई जा सकती है।
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