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दंगे ने छीन लिया सभी का अमन-चैन
अमर उजाला ब्यूरो, शामली
Updated Wed, 07 Sep 2016 11:48 PM IST
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कांधला में जानकारी देता लिसाढ़ के दंगा पीड़ित नवाब का परिवार।
- फोटो : अमर उजाला
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तीन साल पहले सात सितंबर को भड़के दंगे के दंश को शामली के लोग आज भी भुला नहीं पाए हैं। तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी जख्म हरे हैं। कहने को तो सरकार ने दंगा पीड़ितों को आर्थिक सहायता के तौर पर मुआवजा दिया, मगर गांव की पुरानी यादें आज भी उनकी आंखें नम कर देती हैं।
सात सितंबर 2013 को शामली जनपद के कई गांवों में दंगा भड़क गया था। इसके बाद सैकड़ों लोग बेघर हो गए। कुछ लोगों ने कांधला और आसपास के क्षेत्रों में शरण ली थी। कांधला के हाजीपुर दुगड्डा मार्ग पर रह रहे गांव लिसाढ़ निवासी नवाब बताते हैं कि उनका करीब 150 लोगों का परिवार था। गांव में खुशहाल जीवन जी रहे थे लेकिन नफरत की ऐसी आग फैली कि सब कुछ तबाह हो गया। अमन और रोजगार की कोई कमी नहीं थी। हम लोग किसानों की जमीन को ठेके पर लेकर अपने परिवार को पालते थे। बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ सभी लोगों से आपस में जरूरत का लेने देन था। लेकिन दंगे ने सब छीन लिया।
तीन साल बीत जाने के बाद भी उनकी ताई छोटी और चचेरे भाई हकीमुद्दीन का कोई सुराग नहीं है। जीवन जी रहे हैं, लेकिन कोई सुविधा नहीं है। बच्चों की पढ़ाई छूट गई है, क्योंकि जीवन यापन करना मुश्किल है।रफीकन ने बताया कि उनके परिवार गांव में खुश थे, यहां पर रोजी रोटी के भी लाले पड़े हुए हैं। सभी लोग मदद किया करते थे, लेकिन हालात कुछ और हैं। लिसाढ़ गांव में उनका मकान आज भी है, जो बिक नहीं पाया है। हम लोग किराए के मकान में रहकर गुजर बसर कर रहे हैं।
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सात सितंबर 2013 को शामली जनपद के कई गांवों में दंगा भड़क गया था। इसके बाद सैकड़ों लोग बेघर हो गए। कुछ लोगों ने कांधला और आसपास के क्षेत्रों में शरण ली थी। कांधला के हाजीपुर दुगड्डा मार्ग पर रह रहे गांव लिसाढ़ निवासी नवाब बताते हैं कि उनका करीब 150 लोगों का परिवार था। गांव में खुशहाल जीवन जी रहे थे लेकिन नफरत की ऐसी आग फैली कि सब कुछ तबाह हो गया। अमन और रोजगार की कोई कमी नहीं थी। हम लोग किसानों की जमीन को ठेके पर लेकर अपने परिवार को पालते थे। बच्चों की पढ़ाई के साथ-साथ सभी लोगों से आपस में जरूरत का लेने देन था। लेकिन दंगे ने सब छीन लिया।
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तीन साल बीत जाने के बाद भी उनकी ताई छोटी और चचेरे भाई हकीमुद्दीन का कोई सुराग नहीं है। जीवन जी रहे हैं, लेकिन कोई सुविधा नहीं है। बच्चों की पढ़ाई छूट गई है, क्योंकि जीवन यापन करना मुश्किल है।रफीकन ने बताया कि उनके परिवार गांव में खुश थे, यहां पर रोजी रोटी के भी लाले पड़े हुए हैं। सभी लोग मदद किया करते थे, लेकिन हालात कुछ और हैं। लिसाढ़ गांव में उनका मकान आज भी है, जो बिक नहीं पाया है। हम लोग किराए के मकान में रहकर गुजर बसर कर रहे हैं।
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