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हाथ के हुनर को बनाया रोजगार का जरिया

Sun, 29 Dec 2019 11:18 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 29 Dec 2019 11:18 PM IST
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Hand skills made a means of employment
रोहित अग्रवाल
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शामली। हाथ में हुनर हो तो उसे अपने रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है। जिले में कई महिलाएं हैं जिन्होंने अपने हुनर से राष्ट्रीय आजीविका मिशन के जरिए स्वयं सहायता समूह बनाकर खुद का रोजगार खड़ा किया है। इन समूहों में जुड़ी महिलाएं अलग अलग क्षेत्र में अपने घर में ही काम शुरू कर आमदनी कर रही हैं। परिजनों का भी उन्हें भरपूर सहयोग मिल रहा है। अमर उजाला ने इन महिलाओं से बात की।
घर में ही बना रही एलईडी बल्ब
कांधला क्षेत्र के नाला गांव की कविता अपने घर में ही एलईडी बल्ब तैयार करती हैं। उनका काम देख गांव की कई महिलाएं उनसे प्रेेरित हुईं और उनसे जुड़ी। उन्होंने गांव में ही विष्णु स्वयं सहायता समूह बनाया। जिसमें 12 महिलाएं हैं। दिल्ली से कविता के पति बल्ब बनाने के अलग अलग सामान लाते हैं। जिनके माध्यम से ये महिलाएं एक साथ बैठकर इन्हें तैयार करती हैं। फिलहाल ये सात से 15 वाट के बल्ब बना रही हैं। उन्होंने पिछले साल 75 हजार रुपये लगाकर काम शुरू किया था। तैयार बल्ब को गांव में ही और आसपास के गांवों में बेचती हैं। एक बल्ब पर 13 रुपये बचते हैं। हर महीने चार से पांच हजार तक की कमाई सदस्यों को हो जाती है।
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मट्ठी और कपड़े धोने का लिक्विड करती हैं तैयार
ऊन क्षेत्र के हसनपुर गांव की बुजुर्ग प्रियंका सैनी ने कपडे़ धोने का लिक्विड तैयार किया है। इसके अलावा मट्ठी भी बनाती है। उन्होंने इस काम में गांव की 12 महिलाओं को जोड़कर गगन सहायता समूह बनाया है। ये सभी महिलाएं इस काम में जुटकर माल तैयार करती है। एक लीटर की बोतल में लिक्विड की बोतल 40 और मट्ठी 80 से 100 रुपये किलो बेचती हैं। इस काम से हर सदस्य महिला तीन से चार हजार रुपये महीना कमाई हो जाती है।
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झूमर और डेकोरेटड आइटम बनाती हैं पारूल
कांधला क्षेत्र के इस्सोपुर टील गांव की पारूल ने गांव की 12 महिलाओं को जोड़कर ओम सहायता समूह बनाया है। इसमें अधिकतर महिलाएं हाथ की दस्तकारी में निपुण हैं। ये ऊनी और डेकोरेटेड झूमर, दरवाजे खिड़कियों के झूमर, लाइट वाले सजावटी आइटम तैयार करते हैं। हर महीने दो से तीन हजार कमा लेते हैं। दिवाली के सीजन में उनका खूब काम चलता है।
पोस्टर, पेंटिंग की शानदार फ्रेमिंग
थानाभवन क्षेत्र के नोजली गांव की शालू ने अपने घर में ही पोस्टर, पेंटिंग की जड़ाई करके बेचने का काम शुरू किया है। शालू ने बताया कि दिल्ली से अच्छी अच्छी पेंटिंग और पोस्टर वह खरीदकर लाते हैं और उनकी फ्रेमिंग का सामान भी थोक में लाकर घर में ही उनकी आकर्षक फ्रेमिंग कर बेचते हैं। पहले उसने ये काम शुरू किया और अब गांव की 12 महिलाओं का ग्रुप बनाया। राष्ट्रीय आजीविका मिशन के सहयोग से उन्हें बैंक से लोन की सुविधा भी उपलब्ध हो रही है। समूह की सभी सदस्य तीन से चार हजार रुपये महीने की आय कर लेती हैं।

कोट
जनपद में कुल 3911 स्वयं सहायता समूह हैं। जिनसे 45 हजार 365 महिलाएं जुड़ी हैं। बहुत महिलाएं रोजगार के क्षेत्र में काफी अच्छा काम कर रही हैं और आगे बढ़ रही हैं। अच्छा काम करने वाले समूहों को राष्ट्रीय आजीविका मिशन की तरफ से 1.10 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद दी जाती है। बैंक से सात प्रतिशत की दर से लोन भी दिया जाता है। - शैलेंद्र व्यास, डिप्टी कमिश्नर, राष्ट्रीय आजीविका मिशन
राष्ट्रीय आजीविका मिशन के जनपद के आंकडे़
कुल समूह - 3911
सदस्यों की संख्या 45,365
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