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Shamli News: आधुनिकता में खो गए होली के लोकगीत
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संवाद न्यूज एजेंसी
थानाभवन। होली खुशियों और उमंगों का अनोखा पर्व है। जहां लोग सब कुछ भुलाकर एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर देने की परंपरा है। होली हो और गीत-संगीत न बजे तो सब फीका सा लगता है। ऐसे माहौल में होली का सजीव वर्णन करते लोकगीत बज उठे तो बात ही क्या। लेकिन अब मदिरा और उत्तेजक फिल्मी गीतों के प्रचलन से होली के आदर्शों में गिरावट आ गई है। आधुनिकता में होली के लोकगीत खो गए हैं।
आंगन में खींची दीवारों और टूटते रिश्ते पर हावी होती पाश्चात्य संस्कृति का कुप्रभाव होली की परंपरा को विखंडित कर रहा है। ब्रज की मशहूर होली की तरह पश्चिम क्षेत्र में भी होली की अलग पहचान रही है। होलिका दहन के पूजन से शुरू होने वाली फागुन की मस्ती अब अदृश्य सी होती जा रही है। बच्चों की टोलियां गली मोहल्लों में होलिका दहन के लिए लकड़ियां एकत्रित करने में जुटी रहती थी। पिचकारी लेकर वाहनों को रुकवा कर रंग डालने का भय दिखाकर चंदा वसूला जाता था।
सरला देवी ने बताया होली से पूर्व महिलाएं कामकाज निपटा कर इकट्ठा हो कर ताल के साथ मधुर होली गीत गाती व नृत्य करती थी। यही स्थिति लोकगीतों के माध्यम से रही है। मेरी बूंदी पर बूंद नहीं रस की, धरती मत छोड़ दे बरस दस की, मुझे रास्ता बता दो हवेली का, खिल गया फूल चमेली का आदि लोकगीतों की गूंज अब सुनने को नहीं मिलती। दुल्हैंडी पर नई नवेली दुल्हनों का जेठ और ससुर पर रंग डाल कर बतौर शगुन लेने की परंपरा भी कम होती जा रही है। इसी रिवाज में मेरी बिंदी के बीच चिलम चटकी, न्यारा हो जा मेरे जेठ जेठानी मटकी। देवर भाभी और जीजा साली की होली आज भी मशहूर है। भाभी का अपने देवर पर कुछ रंग डालना गजब होता है। मेरे कोलिर बीच चिलम चटके न्यारा हो जा रे देवर दोरानी मटके।
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संतोष रानी का कहना है कि पहले महिलाओं के अलावा युवकों की टोलियां भी ढोल नगाड़ों की थाप पर थिरकते नजर आती थी। अब केवल दुल्हैंडी के दिन मद के नशे में झूम होली का लुत्फ उठाने का चलन बढ़ गया है। होली के आदर्शों में आई गिरावट से होली के रंग में भंग तो पड़ा ही है। होली मनाने की परंपरा आज संयुक्त परिवारों के विघटन व आधुनिक सोच के कारण टूट गई है। मनभावन व लोक लुभावने लोक गीतों की प्रथा समाप्त होने के पीछे नई पीढ़ी पर फिल्मी गीतों का जादू छाना मुख्य कारण है।
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थानाभवन। होली खुशियों और उमंगों का अनोखा पर्व है। जहां लोग सब कुछ भुलाकर एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर देने की परंपरा है। होली हो और गीत-संगीत न बजे तो सब फीका सा लगता है। ऐसे माहौल में होली का सजीव वर्णन करते लोकगीत बज उठे तो बात ही क्या। लेकिन अब मदिरा और उत्तेजक फिल्मी गीतों के प्रचलन से होली के आदर्शों में गिरावट आ गई है। आधुनिकता में होली के लोकगीत खो गए हैं।
आंगन में खींची दीवारों और टूटते रिश्ते पर हावी होती पाश्चात्य संस्कृति का कुप्रभाव होली की परंपरा को विखंडित कर रहा है। ब्रज की मशहूर होली की तरह पश्चिम क्षेत्र में भी होली की अलग पहचान रही है। होलिका दहन के पूजन से शुरू होने वाली फागुन की मस्ती अब अदृश्य सी होती जा रही है। बच्चों की टोलियां गली मोहल्लों में होलिका दहन के लिए लकड़ियां एकत्रित करने में जुटी रहती थी। पिचकारी लेकर वाहनों को रुकवा कर रंग डालने का भय दिखाकर चंदा वसूला जाता था।
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सरला देवी ने बताया होली से पूर्व महिलाएं कामकाज निपटा कर इकट्ठा हो कर ताल के साथ मधुर होली गीत गाती व नृत्य करती थी। यही स्थिति लोकगीतों के माध्यम से रही है। मेरी बूंदी पर बूंद नहीं रस की, धरती मत छोड़ दे बरस दस की, मुझे रास्ता बता दो हवेली का, खिल गया फूल चमेली का आदि लोकगीतों की गूंज अब सुनने को नहीं मिलती। दुल्हैंडी पर नई नवेली दुल्हनों का जेठ और ससुर पर रंग डाल कर बतौर शगुन लेने की परंपरा भी कम होती जा रही है। इसी रिवाज में मेरी बिंदी के बीच चिलम चटकी, न्यारा हो जा मेरे जेठ जेठानी मटकी। देवर भाभी और जीजा साली की होली आज भी मशहूर है। भाभी का अपने देवर पर कुछ रंग डालना गजब होता है। मेरे कोलिर बीच चिलम चटके न्यारा हो जा रे देवर दोरानी मटके।
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संतोष रानी का कहना है कि पहले महिलाओं के अलावा युवकों की टोलियां भी ढोल नगाड़ों की थाप पर थिरकते नजर आती थी। अब केवल दुल्हैंडी के दिन मद के नशे में झूम होली का लुत्फ उठाने का चलन बढ़ गया है। होली के आदर्शों में आई गिरावट से होली के रंग में भंग तो पड़ा ही है। होली मनाने की परंपरा आज संयुक्त परिवारों के विघटन व आधुनिक सोच के कारण टूट गई है। मनभावन व लोक लुभावने लोक गीतों की प्रथा समाप्त होने के पीछे नई पीढ़ी पर फिल्मी गीतों का जादू छाना मुख्य कारण है।