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कम हो रही जिले में खेतों की उर्वरक क्षमता

Sun, 19 Jan 2020 11:42 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 19 Jan 2020 11:42 PM IST
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Fertilizer capacity of farms in the district is decreasing
शामली। जिले में खेती की उर्वरकता क्षमता घटती जा रही है। यदि किसानों ने फसलों में रसायनिक खादों का प्रयोग बंद नहीं किया, तो यहां की भूमि जल्द बंजर हो जाएगी।
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कैैराना में मृदा प्रयोगशाला की जांच के बाद चौंकाने वाले आंकडे़ आए हैं। जिले में औसत मानक के अनुरूप नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की कमी आ रही है। रसायनिक खाद के प्रयोग से सबसे ज्यादा यमुना किनारे ऊन और कैराना ब्लाक के गांवों की हालत बदतर है। जिले में सबसे ज्यादा हालत ऊन ब्लाक के यमुना किनारे गांवों का जीवांश, फास्फोरस, पोटाश, जिंक व पीएच मान घटता जा रहा है। हालत यह बन चुकी है कि फसलों का जीवांश का औसतन सामान्य मानक 0.50 से लेकर .80 के सापेक्ष घटकर .30 तक पहुंच गया है। इसी प्रकार फास्फोरस का मानक औसत 11 से अधिक होना चाहिए। मगर मानक के सापेक्ष यहां 7 या 8 मात्रा सिमट गया है। पोटाश की मात्रा 150 से अधिक होना चाहिए, मगर पोटाश की मानक मात्रा 80- 90 के बीच रह गई। पीएच मान औसतन सामान्य आठ के सापेक्ष घटकर 6.50 रह गया है। जिंक .60 सापेक्ष .40- .45 रह गई है। कैैैैराना मृदा प्रयोगशाला के डॉ. संजीव कुमार का कहना है कि भूमि के जीवांश को बढ़ाने के लिए गोबर की खाद ज्यादा प्रयोग करना चाहिए।
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महत्वपूर्ण उपाय हरी खाद का प्रयोग
शामली। हरी खाद ‘मृदा की उर्वरता एवं भौतिक संरचना को सुधारने के लिए समुचित हरे पौधों या उनके किसी भाग को जोतकर खेत में दबा देने को ही हरी खाद बनाने की प्रक्रिया है। वैसे तो कृषकों द्वारा कृषि उपज बढ़ाने के लिए हरी खाद का प्रयोग किया जाता रहा है, परंतु आधुनिक कृषि में अधिक फसलोत्पादन के लिए भूमि पर बढ़ते दबाव से इसकी उपेक्षा होने लगी है। परिणामस्वरूप गत वर्षों में फसलों की उपज तो बढ़ती रही, लेकिन मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में व्यापक ह्रास भी होने लगा।
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- हरी खाद के लिए प्रयोग की जाने वाली फसलें
सनी : यह हरी खाद के लिए एक सर्वोत्तम फसल है। इसे बुवाई के 6-8 सप्ताह बाद खेत में पलट दिया जाता है। उत्तरी भारत में सिंचित गेहूं के लिए यह सबसे उपयुक्त हरी खाद की फसल है।
ढैंचा : इस फसल का हरी खाद में एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसे लगभग सभी प्रकार की मृदाओं में सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है। इसका प्रयोग मुख्यत: धान, गन्ना तथा आलू के लिए हरी खाद बनाने में किया जाता है।
उड़द एवं मूंग : इनकी हरी खाद उन स्थानों पर जहां पानी न भरता हो, आसानी से तैयार की जा सकती है। बोने के लगभग 50-65 दिन बाद अगस्त के अंतिम सप्ताह में मिट्टी में दबा दिया जाता है।
लोबिया : इसे रबी तथा खरीफ दोनों मौसमों में हरी खाद के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
ये सभी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके मृदा को अतिरिक्त नाइट्रोजन प्रदान करती हैं। इनके अतिरिक्त खेसारी, बरसीन आदि दलहनी फसलें भी हरी खाद बनाने के लिए प्रयोग की जाती हैं।

पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए सामान्यत 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है। जिनकी आपूर्ति मृदा में मुख्यत: इन तत्वों से युक्त उर्वरकों को डालकर की जाती है, परंतु परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि सिर्फ रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों की उन्नतशील प्रजातियों के फसलोत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि संभव नहीं है। मृदा उर्वरता में गिरावट के साथ-साथ इसके भौतिक, जैविक एवं रासायनिक गुणों में ह्रास होना है। हरी खाद कार्बनिक पदार्थ का अच्छा स्रोत है, जो मृदा के इन गुणों को सुधारने के लिए उत्तरदायी है। - डॉ. विकास कुुमार, वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र
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