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गेहूं की फसल में रोग लगने की आशंका
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गेहूं की फसल में रोग लगने की आशंका
शामली। आकस्मिक बारिश और मौसम में नमी के चलते गेहूं की फसल में पीला रतुआ और करनाल बंट रोग लगने की आशंका बढ़ गई है। उप कृषि निदेशक शिव कुमार केसरी ने बताया कि पीला रतुआ के प्रकोप 6 से 18 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और 90 प्रतिशत से अधिक आर्द्रता के साथ-साथ बादलीयुक्त मौसम अनुकूल होता है। इस रोग का प्रकोप जनवरी और फरवरी माह में दिखाई देता है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस रोग का प्रकोप होने पर पीले से नारंगी रंग की धारियों के आकार में पत्तियों पर पाउडर दिखाई पड़ता है। इसे छूने पर हाथों में पीला पाउडर चिपक जाता है। यह रोग खेत में 10-15 पौधों पर गोल घेरे के रूप में शुरू होकर बाद में पूरे खेत में फैलता है। पीला रतुआ से बचाव हेतु नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का प्रयोग अधिक नहीं करना चाहिए तथा प्रकोप के लक्षण परिलक्षित होने पर प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत या टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत, ट्राईफ्लाक्सीस्ट्राबिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 0.06 प्रतिशत का घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
करनाल बंट बीज एवं भूमि जनित रोग है। इसकी पहचान खेत में नहीं हो पाती है और ज्यादातर मामलों में फसल की कटाई और थ्रेसिंग के बाद ही दिखाई पड़ती है। इसके प्रकोप की दशा में गेहूं की बालियां व दानों पर काले रंग के पाउडर के रूप में टेलियोस्पोर चिपके रहते हैं। जिसका प्रसार हवा से तेजी से होता है। ठंडा तापमान, उच्च आर्द्रता एवं रुक-रुककर होने वाली बारिश से बढ़ता है। यदि बीते वर्षों में इस रोग का संक्रमण रहा हो और मौसम रोग संक्रमण के अनुकूल हो तो फूल अवस्था के दौरान यथासंभव सिंचाई नहीं करनी चाहिए। गेहूं की पुष्पावस्था में तापमान में गिरावट एवं अधिक आर्द्रता होने की स्थिति में बालियां निकलते समय प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत का सुरक्षात्मक छिड़काव करना चाहिए।
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शामली। आकस्मिक बारिश और मौसम में नमी के चलते गेहूं की फसल में पीला रतुआ और करनाल बंट रोग लगने की आशंका बढ़ गई है। उप कृषि निदेशक शिव कुमार केसरी ने बताया कि पीला रतुआ के प्रकोप 6 से 18 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और 90 प्रतिशत से अधिक आर्द्रता के साथ-साथ बादलीयुक्त मौसम अनुकूल होता है। इस रोग का प्रकोप जनवरी और फरवरी माह में दिखाई देता है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस रोग का प्रकोप होने पर पीले से नारंगी रंग की धारियों के आकार में पत्तियों पर पाउडर दिखाई पड़ता है। इसे छूने पर हाथों में पीला पाउडर चिपक जाता है। यह रोग खेत में 10-15 पौधों पर गोल घेरे के रूप में शुरू होकर बाद में पूरे खेत में फैलता है। पीला रतुआ से बचाव हेतु नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का प्रयोग अधिक नहीं करना चाहिए तथा प्रकोप के लक्षण परिलक्षित होने पर प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत या टेबुकोनाजोल 50 प्रतिशत, ट्राईफ्लाक्सीस्ट्राबिन 25 प्रतिशत डब्ल्यूजी 0.06 प्रतिशत का घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए।
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करनाल बंट बीज एवं भूमि जनित रोग है। इसकी पहचान खेत में नहीं हो पाती है और ज्यादातर मामलों में फसल की कटाई और थ्रेसिंग के बाद ही दिखाई पड़ती है। इसके प्रकोप की दशा में गेहूं की बालियां व दानों पर काले रंग के पाउडर के रूप में टेलियोस्पोर चिपके रहते हैं। जिसका प्रसार हवा से तेजी से होता है। ठंडा तापमान, उच्च आर्द्रता एवं रुक-रुककर होने वाली बारिश से बढ़ता है। यदि बीते वर्षों में इस रोग का संक्रमण रहा हो और मौसम रोग संक्रमण के अनुकूल हो तो फूल अवस्था के दौरान यथासंभव सिंचाई नहीं करनी चाहिए। गेहूं की पुष्पावस्था में तापमान में गिरावट एवं अधिक आर्द्रता होने की स्थिति में बालियां निकलते समय प्रोपिकोनाजोल 0.1 प्रतिशत का सुरक्षात्मक छिड़काव करना चाहिए।
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