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Shamli News: किसान भाई न लगाए धान साठा, भूजल का होगा घाटा
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-धान की दो फसल लेने से गिर रहा है जिले का भूगर्भ जलस्तर
-कृषि विभाग ने साठा धान की बुवाई न करने की अपील की
फोटो
शामली। कृषि विभाग ने जिले के किसानों से साठा धान की बुवाई न करने की अपील की है। जिला कृषि अधिकारी प्रदीप कुमार यादव का कहना है कि जिले में अप्रैल एवं मई माह में लगाई जाने वाली धान की प्रजाति पीबी 1509 और पीबी 1692 में अधिक पानी की जरूरत होती है। वाटर रिर्साेस ऑफ इंडिया 2022 के आंकड़ों के अनुसार जनपद के पांच ब्लॉक में से शामली, कांधला और ऊन अतिदोहित स्तर पर हैं। कैराना क्रिटिकल स्तर पर और थानाभवन सेमी क्रिटिकल स्तर पर है। शोध के मुताबिक एक किग्रा चावल का उत्पादन करने में लगभग 2500 लीटर पानी का प्रयोग होता है। जिले के सभी ब्लॉकों में भूमिगत जल की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है। धान की दोबार फसल लगाने से भूमिगत जल का अतिदोहन हो रहा है। इससे भविष्य में जल की गंभीर समस्या के साथ-साथ सिंचाई के पानी की भी समस्या उत्पन्न हो जाएगी। पंजाब, हरियाणा सरकार ने इस प्रकार की खेती पर समय पूर्व धान की फसल की रोपाई करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही दंड का भी प्रावधान किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एनसीआर के डार्क जोन के जिलों में भी इस प्रकार के खेती को रोकने के लिए जागरूकता अभियान और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश मिल रहे हैं। धान की बार-बार फसल लगाने से जल के अतिदोहन के साथ-साथ बीमारी, कीट का प्रकोप भी अधिक हो जाता है। ऐसे में किसान अप्रैल माह में ढैंचा और सनई की बुवाई करके हरी खाद के रूप में अपने खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकते हैं। धान के बीज की सीधी बुवाई करके पानी की बचत कर सकते हैं। पडलिंग में लगने वाला खर्च भी बचा सकते हैं। सीधी बुवाई में फसल लागत कम होती है और उत्पादन अधिक होता है।
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-कृषि विभाग ने साठा धान की बुवाई न करने की अपील की
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शामली। कृषि विभाग ने जिले के किसानों से साठा धान की बुवाई न करने की अपील की है। जिला कृषि अधिकारी प्रदीप कुमार यादव का कहना है कि जिले में अप्रैल एवं मई माह में लगाई जाने वाली धान की प्रजाति पीबी 1509 और पीबी 1692 में अधिक पानी की जरूरत होती है। वाटर रिर्साेस ऑफ इंडिया 2022 के आंकड़ों के अनुसार जनपद के पांच ब्लॉक में से शामली, कांधला और ऊन अतिदोहित स्तर पर हैं। कैराना क्रिटिकल स्तर पर और थानाभवन सेमी क्रिटिकल स्तर पर है। शोध के मुताबिक एक किग्रा चावल का उत्पादन करने में लगभग 2500 लीटर पानी का प्रयोग होता है। जिले के सभी ब्लॉकों में भूमिगत जल की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है। धान की दोबार फसल लगाने से भूमिगत जल का अतिदोहन हो रहा है। इससे भविष्य में जल की गंभीर समस्या के साथ-साथ सिंचाई के पानी की भी समस्या उत्पन्न हो जाएगी। पंजाब, हरियाणा सरकार ने इस प्रकार की खेती पर समय पूर्व धान की फसल की रोपाई करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही दंड का भी प्रावधान किया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एनसीआर के डार्क जोन के जिलों में भी इस प्रकार के खेती को रोकने के लिए जागरूकता अभियान और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश मिल रहे हैं। धान की बार-बार फसल लगाने से जल के अतिदोहन के साथ-साथ बीमारी, कीट का प्रकोप भी अधिक हो जाता है। ऐसे में किसान अप्रैल माह में ढैंचा और सनई की बुवाई करके हरी खाद के रूप में अपने खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकते हैं। धान के बीज की सीधी बुवाई करके पानी की बचत कर सकते हैं। पडलिंग में लगने वाला खर्च भी बचा सकते हैं। सीधी बुवाई में फसल लागत कम होती है और उत्पादन अधिक होता है।