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Shamli News: कुड़ाना में 42 साल से चल रही चकबंदी, किसानों को नहीं मिल रहा न्याय
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संवाद न्यूज एजेंसी
शामली। जिले के सात गांवों में लंबे समय से चकबंदी प्रक्रिया चलने से किसानों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। उच्च न्यायालय में किसानों के जाने के बाद कुुड़ाना में धारा 52 की कार्रवाई पूरी नहीं हो पाई है।
चकबंदी का मकसद है कि किसानों के बिखरे पड़े खेतों का चक एक स्थान पर कर दिया जाए। इससे किसानों को पैदावार करने में आसानी होगी। सिंचाई का प्रबंध करके कृषि पैदावार को बढ़ाया जा सकता है। किसानों का चक एक स्थान पर ही होने से उनकी आमदनी में भी बढ़ोत्तरी होती है। वह कई फसलों को एक साथ खेतों में लगा सकते हैं। हालांकि कई गांव ऐसे हैं, जहां चकबंदी प्रक्रिया किसानों के लिए सिरदर्द बन गई है।
जिले के कुड़ाना गांव में पिछले 42 साल से चकबंदी प्रक्रिया चलने के बावजूद किसानों को न्याय नही मिल पाया है। वहीं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मामला जाने के बाद धारा 52 की कार्रवाई पूरी नहीं हो पाई है।
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इसी प्रकार लांक और कुड़ाना में 1979 से प्रक्रिया चल रही है। भभीसा गांव में वर्ष 1988 और सुन्ना गांव में 1990, लिसाढ़ 2008 और भनेड़ा गांव में 2018 से चकबंदी जलालाबाद में प्रक्रिया चल रही है। लिसाढ़ गांव के गठवाला खाप के चौधरी राजेंद्र मलिक ने बताया कि लिसाढ़ गांव में लंबे समय चकबंदी चल रही है। गांव के सभी लोगों ने खादर क्षेत्र की चकबंदी कराने और सभी किसानों को आम रास्ते और नाली छुड़वाने के लिए डीएम और चकबंदी अधिकारियों को शिकायत देकर रोक लगा दी थी। चकबंदी अधिकारियों की ओर से गांव के चकों की पैमाइश नहीं होने दी थी। उन्होंने बताया कि पिछले छह माह से पुन: चकबंदी शुरू हो पाई है। गांव में नक्शा पांच की कार्रवाई जारी है। कुड़ाना गांव के पप्पू मलिक कहा कि गांव में लगभग 2500 बीघा भूमि बंजर होने के कारण कुछ किसान उच्च न्यायालय इलाहाबाद गए थे।
चकबंदी अधिकारियों की ओर से पैरवी नहीं की जा रही है। भभीसा गांव के किसान प्रदीप कुमार, मास्टर ब्रह्म सिंह और हरेंद्र बताते हैं कि गांव में 1988 से चकबदी प्रक्रिया चल रही है। गांव के ज्यादातर किसान चकबंदी नहीं चाहते हैं। लंबित चकबंदी प्रक्रिया डेढ़ साल पहले शुरू हुई थी। चकों की कीमत लगाई गई है, जिसका वे विरोध कर रहे हैं।
जलालाबाद देहात के किसान बलजीत, राकेश कुमार, राजकुमार सैनी का कहना है कि गांवों में सालाें से चकबंदी चल रही है। देरी के कारण किसानों को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। किसानों की विरासत दर्ज नहीं हो पा रही है।
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शामली। जिले के सात गांवों में लंबे समय से चकबंदी प्रक्रिया चलने से किसानों को न्याय नहीं मिल पा रहा है। उच्च न्यायालय में किसानों के जाने के बाद कुुड़ाना में धारा 52 की कार्रवाई पूरी नहीं हो पाई है।
चकबंदी का मकसद है कि किसानों के बिखरे पड़े खेतों का चक एक स्थान पर कर दिया जाए। इससे किसानों को पैदावार करने में आसानी होगी। सिंचाई का प्रबंध करके कृषि पैदावार को बढ़ाया जा सकता है। किसानों का चक एक स्थान पर ही होने से उनकी आमदनी में भी बढ़ोत्तरी होती है। वह कई फसलों को एक साथ खेतों में लगा सकते हैं। हालांकि कई गांव ऐसे हैं, जहां चकबंदी प्रक्रिया किसानों के लिए सिरदर्द बन गई है।
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जिले के कुड़ाना गांव में पिछले 42 साल से चकबंदी प्रक्रिया चलने के बावजूद किसानों को न्याय नही मिल पाया है। वहीं इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मामला जाने के बाद धारा 52 की कार्रवाई पूरी नहीं हो पाई है।
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इसी प्रकार लांक और कुड़ाना में 1979 से प्रक्रिया चल रही है। भभीसा गांव में वर्ष 1988 और सुन्ना गांव में 1990, लिसाढ़ 2008 और भनेड़ा गांव में 2018 से चकबंदी जलालाबाद में प्रक्रिया चल रही है। लिसाढ़ गांव के गठवाला खाप के चौधरी राजेंद्र मलिक ने बताया कि लिसाढ़ गांव में लंबे समय चकबंदी चल रही है। गांव के सभी लोगों ने खादर क्षेत्र की चकबंदी कराने और सभी किसानों को आम रास्ते और नाली छुड़वाने के लिए डीएम और चकबंदी अधिकारियों को शिकायत देकर रोक लगा दी थी। चकबंदी अधिकारियों की ओर से गांव के चकों की पैमाइश नहीं होने दी थी। उन्होंने बताया कि पिछले छह माह से पुन: चकबंदी शुरू हो पाई है। गांव में नक्शा पांच की कार्रवाई जारी है। कुड़ाना गांव के पप्पू मलिक कहा कि गांव में लगभग 2500 बीघा भूमि बंजर होने के कारण कुछ किसान उच्च न्यायालय इलाहाबाद गए थे।
चकबंदी अधिकारियों की ओर से पैरवी नहीं की जा रही है। भभीसा गांव के किसान प्रदीप कुमार, मास्टर ब्रह्म सिंह और हरेंद्र बताते हैं कि गांव में 1988 से चकबदी प्रक्रिया चल रही है। गांव के ज्यादातर किसान चकबंदी नहीं चाहते हैं। लंबित चकबंदी प्रक्रिया डेढ़ साल पहले शुरू हुई थी। चकों की कीमत लगाई गई है, जिसका वे विरोध कर रहे हैं।
जलालाबाद देहात के किसान बलजीत, राकेश कुमार, राजकुमार सैनी का कहना है कि गांवों में सालाें से चकबंदी चल रही है। देरी के कारण किसानों को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। किसानों की विरासत दर्ज नहीं हो पा रही है।