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चौपाल से चलती थी राजनीति की चौधर
ब्यूरो, अमर उजाला/शामली
Updated Mon, 05 Feb 2018 12:12 AM IST
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Hukum Singh Panchtatta merged
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शामली। गांव कंडेला बाबूजी हुकुम सिंह की राजनीति की धुरी रहा है। यह वह गांव है, जहां से बाबूजी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की। कांग्रेस से टिकट मिलने के बाद 1974 कंडेला में पहुंचे हुकुम सिंह ने चौपाल पर पूछा था कि आप सब कहो तो मै चुनाव लड़ लूं, या नहीं? और जवाब में पूरे गांव ने हां कहा था और पहली ही बार चुनाव जीत गए।
बाद उन दिनों की है। जब बाबूजी ने आर्मी से इस्तीफा देने के बाद दोबारा वकालत शुरू की। उसके बाद उनको कांग्रेस से 1974 में विधानसभा का टिकट मिल गया था। कंडेला गांव के 95 वर्षीय बुजुर्ग बाबा बुंदी बताते हैं कि बाबूजी गांव में कंडेला चौपाल पर पहुंचे। सर्वसमाज के ग्रामीणों को चौपाल पर एकत्र किया गया था। अपनी सादगी भरे अंदाज में हाथ जोड़कर बाबूजी पंचायत में पहुंचे और अपनी चुनाव लड़कर देश सेवा करने की इच्छा जताकर ग्रामीणों से पूछा था कि यदि आप सब कहों तो मै चुनाव लडूं या नहीं तो नहीं।
गांव वालों के हां करने के बाद वह चुनाव लड़े और जीत भी गए। उस वक्त पूरे गांव ने बाबूजी को वोट दी। 1974 से लेकर अब तक राजनीति में उनको 44 साल बीत गए। सात बार वह कैराना से विधायक रहे और 2014 में कैराना से सांसद बने, लेकिन ना तो कंडेला गांव इधर से उधर गया और ना ही बाबूजी का क्रम टूटा। बाबा बुंदी के अनुसार हर बार चुनाव लड़ने से पहले बाबूजी ने गांव में आकर कंडेला चौपाल पर गांव वालों की हा या ना ली और उसके बाद चुनाव लड़ा।
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गांव के 96 वर्षीय चौधरी रणजीत सिंह बताते हैं कि बाबूजी जी गांव में छोटों से लेकर बड़ों तक सभी का सम्मान करते थे और अपना घर मानकर गांव में आते थे।
...जब दोबारा चुनाव कराने पर 90 की जगह 98 प्रतिशत हो गया पोलिंग
बाबा करतार सिंह बताते है कि एक विधानसभा चुनाव में गांव कंड़ेला, शेखूपुरा, हिंगोखेडी सहित कई गांवों में मतदान 90 प्रतिशत के करीब हो गया था, जिस पर विपक्षी दलों ने हुकुम सिंह के पक्ष में ठप्पा लगने की शिकायत चुनाव आयोग कर दी थी। जिस पर इन गांवों में दोबारा कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान कराया गया था, लेकिन इस बार मतदान करीब 98 प्रतिशत पहुंच गया था।
एकदूसरे के पूरक हो गए दोनों नाम
जब तक बाबूजी रहे, तब तक गांव कंडेला बाबूजी के साथ रहा। बाबूली कैराना निवासी थे, लेकिन कंडेला गांव के हर ग्रामीण का उनके प्रति लगाव और बाबूजी जी का कंड़ेला गांव के प्रति लगाव ने दोनों कंडेला और हुकुम सिंह को एक दूसरे का पूरक बना दिया। कंडेला गांव को बाबू हुकुम सिंह के नाम से जाना जाने लगा और इसी लगाव के कारण बाबूजी ने गांव में अपने पिता चौधरी मान सिंह के नाम राजकीय इंटर कॉलेज बनवाया और इसी इंटर कॉलेज में उनकी प्रतिमा स्थापित कराई।
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बाद उन दिनों की है। जब बाबूजी ने आर्मी से इस्तीफा देने के बाद दोबारा वकालत शुरू की। उसके बाद उनको कांग्रेस से 1974 में विधानसभा का टिकट मिल गया था। कंडेला गांव के 95 वर्षीय बुजुर्ग बाबा बुंदी बताते हैं कि बाबूजी गांव में कंडेला चौपाल पर पहुंचे। सर्वसमाज के ग्रामीणों को चौपाल पर एकत्र किया गया था। अपनी सादगी भरे अंदाज में हाथ जोड़कर बाबूजी पंचायत में पहुंचे और अपनी चुनाव लड़कर देश सेवा करने की इच्छा जताकर ग्रामीणों से पूछा था कि यदि आप सब कहों तो मै चुनाव लडूं या नहीं तो नहीं।
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गांव वालों के हां करने के बाद वह चुनाव लड़े और जीत भी गए। उस वक्त पूरे गांव ने बाबूजी को वोट दी। 1974 से लेकर अब तक राजनीति में उनको 44 साल बीत गए। सात बार वह कैराना से विधायक रहे और 2014 में कैराना से सांसद बने, लेकिन ना तो कंडेला गांव इधर से उधर गया और ना ही बाबूजी का क्रम टूटा। बाबा बुंदी के अनुसार हर बार चुनाव लड़ने से पहले बाबूजी ने गांव में आकर कंडेला चौपाल पर गांव वालों की हा या ना ली और उसके बाद चुनाव लड़ा।
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गांव के 96 वर्षीय चौधरी रणजीत सिंह बताते हैं कि बाबूजी जी गांव में छोटों से लेकर बड़ों तक सभी का सम्मान करते थे और अपना घर मानकर गांव में आते थे।
...जब दोबारा चुनाव कराने पर 90 की जगह 98 प्रतिशत हो गया पोलिंग
बाबा करतार सिंह बताते है कि एक विधानसभा चुनाव में गांव कंड़ेला, शेखूपुरा, हिंगोखेडी सहित कई गांवों में मतदान 90 प्रतिशत के करीब हो गया था, जिस पर विपक्षी दलों ने हुकुम सिंह के पक्ष में ठप्पा लगने की शिकायत चुनाव आयोग कर दी थी। जिस पर इन गांवों में दोबारा कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान कराया गया था, लेकिन इस बार मतदान करीब 98 प्रतिशत पहुंच गया था।
एकदूसरे के पूरक हो गए दोनों नाम
जब तक बाबूजी रहे, तब तक गांव कंडेला बाबूजी के साथ रहा। बाबूली कैराना निवासी थे, लेकिन कंडेला गांव के हर ग्रामीण का उनके प्रति लगाव और बाबूजी जी का कंड़ेला गांव के प्रति लगाव ने दोनों कंडेला और हुकुम सिंह को एक दूसरे का पूरक बना दिया। कंडेला गांव को बाबू हुकुम सिंह के नाम से जाना जाने लगा और इसी लगाव के कारण बाबूजी ने गांव में अपने पिता चौधरी मान सिंह के नाम राजकीय इंटर कॉलेज बनवाया और इसी इंटर कॉलेज में उनकी प्रतिमा स्थापित कराई।