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झोंकी ताकत पर जिता नहीं पाए अपनों को

Sun, 12 Mar 2017 12:02 AM IST
शामली, अमर उजाला ब्यूरो
शामली, अमर उजाला ब्यूरो Updated Sun, 12 Mar 2017 12:02 AM IST
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Can not win the strength of the zombies
election - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
शामली।  तीन से चार दशक से शामली जिले की राजनीति में सिक्का कायम रखने वाले राजनीतिक दिग्गज अपने पुत्र पुत्री को          जिताने में नाकाम साबित हुए। सांसद की बेटी हों, या एमएलसी का बेटा, सबको हार का सामना करना पड़ गया। 
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कैराना सीट से भाजपा सांसद हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह चुनाव लड़ीं। टिकट को लेकर अपनों से टकराव के बावजूद भाजपा सांसद हुकुम सिंह उम्मीद
लगाए बैठे थे कि बेटी मृगांका सिंह को विधायक बनाकर लखनऊ भिजवा देंगे, लेकिन उनकी रणनीति फेल हो गई। सपा के नाहिद हसन ने मृगांका को 21,125 वोटों से हराकर सीट पर कब्जा कर लिया। सांसद हुकुम सिंह कैराना सीट पर 40 साल से भी ज्यादा समय से राजनीति कर रहे हैं। सात बार इसी सीट से वह विधायक रहे हैं और 2014 के चुनाव में सांसद चुने गए। अपनी राजनीतिक विरासत वह बेटी मृगांका सिंह को सौंपना चाहते थे और उसी लिहाज से कैराना विधानसभा सीट से बेटी को चुनाव लड़ाया। 
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वहीं, शामली सीट पर पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक के बेटे पंकज मलिक ने कांग्रेस-सपा गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा। पंकज मलिक 2012 के विधानसभा चुनाव में शामली सीट से ही कांग्रेस-रालोद गठबंधन में चुनाव जीते थे। उससे पूर्व 2007 में बघरा से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीतकर विधायक बने थे। पूर्व सांसद हरेंद्र मलिक को भी राजनीति का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। 
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इसी लिहाज से बेटे पंकज मलिक के चुनाव की कमान हरेंद्र मलिक के हाथ में ही रही। चुनाव जीतने के लिए उन्होंने तमाम रणनीति बनाईं, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर में उनका सपना चकनाचूर हो गया। 

इसी तरह सपा नेता एवं एमएलसी वीरेंद्र सिंह भी 40 साल से इस क्षेत्र में राजनीति से जुड़े हैं। वह छह बार कांधला विधानसभा सीट से विधायक बने और रालोद-सपा गठबंधन की सरकार में केबिनेट मंत्री तक रहे। इस बार उनके बेटे मनीष चौहान कई साल से शामली सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। सपा ने उन्हें प्रत्याशी भी बनाया था, लेकिन ऐन वक्त पर गठबंधन में सीट कांग्रेस में चली गई। 


मनीष चौहान निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे। रोड शो के जरिये मनीष चौहान ने शक्ति प्रदर्शन भी किया। इसके अलावा कांधला क्षेत्र में खुद की मजबूती के प्रति आश्वस्त थे, बावजूद इसके मनीष चौहान को हार का मुंह देखना पड़ गया।
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