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Shamli News: याद आते ही बंटवारे का दर्द आ जाता है सामने

Mon, 14 Aug 2023 01:03 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 14 Aug 2023 01:03 AM IST
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As soon as one remembers, the pain of partition comes to the fore.
विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर विशेष:
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- रेलवे स्टेशन पर शरणार्थियों की हत्या, जवान महिलाओं को दंगाई ले गए थे अपने साथ
- घर कारोबार छोड़कर अपने देश में हो गए बेगाने

संवाद न्यूज एजेंसी
शामली। 14 अगस्त 1947 की याद आते ही भारत देश के बंटवारा का दर्द सामने आ जाता है। भारत विभाजन के बाद पैदा हुई नफरत और हिंसा में छह लाख लोग मारे गए थे। 1.5 करोड़ से ज्यादा लोग बेघर हो गए थे। पाकिस्तान से लाखों शरणार्थी अपना मकान, कारोबार, खेत खलियान छोड़कर बेघर हो गए। अपने ही देश में बेगाना होकर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले में आकर शरणार्थियों के रूप में बस गए। शामली में भी पाकिस्तान से आकर 350 लोग बसे थे। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की पूर्व संध्या पर संवाददाता ने शामली में बसे लोगों और उनके परिवार के लोगों से उनकी आपबीती जानी...
पंजाबी समाज के नेता राजन बत्रा बताते है कि उनके बाबा रामचंद्र, ताऊ मथुरा दास, श्यामलाल, तिलक राज बत्रा पाक के सरगौदा से शामली के मंदिर ठाकुर के पास काजीवाड़ा माेहल्ले में बस गए। देश की विभाजन विभीषिका का दंश झेलकर शामली शहर की पंजाबी कालोनी समेत शहर की कई कॉलोनियोें में 350 शरणार्थी परिवार आए थे। सरकार की ओर से उन्हें सिर ढकने के लिए सिर्फ आसरा दिया गया था।
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पाकिस्तान के लाहौर शहर को छोड़कर अपने माता पिता और परिवार के साथ आई 92 वर्षीय रामकली विभाजन का दर्द आज भी है। वह बताती हैं विभाजन के समय वह 16- 17 वर्ष की थी। देश टवारा के दौरान हमले की सूचना पर घर, कारोबार छोड़कर पाकिस्तान के पट्टो रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। बाद में दो माह फिरोजपुर में परिवार के साथ रही। माता पिता ने दो माह में उसकी शादी कर दी और पति के साथ शामली पंजाबी कालोनी आकर बस गई। पति की मौत के बाद परिवार में दो बेटे, तीन पौत्र के साथ रह रही हैं। लेकिन वह दिन आज तक नहीं भूली हैं।
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जवान महिलाओं को दंगाई ले गए अपने साथ
पाकिस्तान के मिंट कंबूरी जिले में पांच वर्षीय वृंदा अपने माता रमेशो देवी, पिता गुलजारी लाल के साथ देश के विभाजन के दौरान फंसी थी। पैदल चलकर माता पिता के साथ पट्टो रेलवे स्टेशन पर 14 दिन तक रेलवे स्टेशन पर रुके रहे। रेलवे स्टेशन मास्टर को शरणार्थियों ने मात्र सवा - सवा रुपये इकट्ठा करके दिए, तब शरणार्थियों का रुकने दिया गया। उनके सामने सामान लूट लिया। बाद मे फिरोजपुर से शामली आकर बस गए। वयोवृद्ध वृंदा बताती हैं कि रेलवे स्टेशन पर हिंसा के दौरान दूसरी ट्रेन में शरणार्थियों की हत्या करके उनकी बहू, बेटी महिलाओं को अपने साथ ले गए।
25 नावों में शरणार्थियों को डुबोकर मार दिया
शामली के पंजाबी कालोनी निवासी 90 वर्षीय बिहारी झांबा मिट कंबूरी बताते हैं कि वह उस समय नौ साल के थे। देश के विभाजन के दौरान झगड़े की सूचना पर 40 हजार शरणार्थियों के काफिले के साथ रवाना हुए झगड़ा शांत न होने पर एक नदी के पास पहुुंचे। पहले से दंगाइयों ने नदी पार कराने के लिए 25 नाव तैयार कर रखी थी। उनके पिता गोकुल नाथ ने उन्हें नाव में नही बैठने दिया। उसी दौरान दंगाइयो ने 25 नावों में सवार शरणार्थियों को डुबोकर मार दिया, सिर्फ तैरने वाले ही बच पाए। 26 वीं नाव में सवार होकर पैदल अमृतसर पहुंचे। एक सप्ताह में 40 मील चलकर अमृतसर पहुंच कर फिर फिरोजपुर आए। वहां पर उनके जीजा से मुलाकात हुई। 26 सितंबर 1947 को शामली में आकर बस गए।

पंजाबी कालोनी की ही सीता देवी कपूर बताती है कि वह 1947 में देश के विभाजन के समय चार पांच साल की थी, वह पाकिस्तान के झिंग जिला से अपने माता- पिता और भाई बहिन के साथ फिरोजपुर से रोहतक उसके बाद पति कुंदन लाल के साथ शामली में शादी के बाद रह रहे हैं।
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