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आशियाने को जंग लड़ रहा रज्मी का परिवार
Updated Tue, 19 Sep 2017 12:28 AM IST
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कैराना (शामली)।
वो जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई। अपने इस बेहतरीन शेर और गजलों के बूते देश दुनिया में कैराना की शोहरत बढ़ाने वाले शायर मुजफ्फर रज्मी आज इस दुनिया में नहीं हैं। 19 सितंबर 2012 में उनका इंतकाल हो गया था, मगर उनका परिवार आज भी आशियाने के लिए जंग लड़ रहा है।
कैराना के मोहल्ला बेगमपुरा में नगर पालिका के किराए के मकान में परिवार रहता है, जिसका विवाद न्यायालय में विचाराधीन है। कैराना नगर पालिका प्रशासन की तरफ से मकान खाली कराने के लिए बार बार नोटिस भेजे जा रहे हैं। मंगलवार को उनकी पांचवी पुण्यतिथि है। उनका परिवार आज भी कैराना में नगर पालिका परिषद के किराए के मकान में रहता है। परिवार के पास रोजगार का कोई खास साधन नहीं है। जैसे तैसे गुजर बसर हो रही है। नगर पालिका परिषद मकान को खाली कराना चाहता है। उनके बेटे जावेद इकबाल ने बताया कि 15 दिन पूर्व ही पालिका की तरफ से मकान खाली कराने के लिए नोटिस मिला। मकान का विवाद न्यायालय में लंबित है, लेकिन हर दिन यही डर सताता रहता है कि कहीं आशियाना छिन न जाए। उन्होंने अपने पिता का एक शेर पढ़ते हुए कहा कि, बात को सादगी से मत कहिए लोग कमजोरिया पकड़ते हैं, परिंदे भी नहीं रहते पराये आशियानों में, हमने उम्र गुजार दी किराये के मकानों में।
जावेद इकबाल ने बताया कि वह बीमार रहते हैं तथा छोटा भाई परवेज जमाल बेरोजगार है, जबकि उससे छोटा नवेद कमाल भी किसी तरह अपने परिवार का पेट पालता है। नगर पालिका प्रशासन मकान खाली कराने के लिए उनके परिवार का दबाव बना रहा है। नगर पालिका उनके परिवार को सड़क पर लाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहा है।
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---- मुजफ्फर रज्मी का जीवन परिचय
दरअसल, पांच जून 1940 में मोहल्ला बेगमपुरा में मोहम्मद इश्हाक के परिवार में जन्मे मुजफ्फर रजमी 12 साल की उम्र से ही शायरी करने लगे थे। नगर पालिका में बहुत कम वेतन पर नौकरी करते हुए वह दूरदराज में जाकर शायरी करते थे। उनकी शायरी के दीवाने देश विदेश में थे। 2008 में केंद्र सरकार की पहल पर पाकिस्तान में हुए मुशायरे में शिरकत की। साथ ही वह तीन बार सऊदी अरब और एक बार बहरीन तथा दुबई भी गए। इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें 2004 और 2011 में दो बार 7 रेस कोर्स बुलाकर मुलाकात की थी। कई नामचीन नेताओं ने उनका शेर वो जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई पढ़ा था। यही नहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 2012 में विपक्ष में रहते हुए यही शेर संसद में पढ़ा था। 19 सितंबर 2012 में मुजफ्फर रज्मी इस दुनिया से अलविदा कह गए।
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वो जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई। अपने इस बेहतरीन शेर और गजलों के बूते देश दुनिया में कैराना की शोहरत बढ़ाने वाले शायर मुजफ्फर रज्मी आज इस दुनिया में नहीं हैं। 19 सितंबर 2012 में उनका इंतकाल हो गया था, मगर उनका परिवार आज भी आशियाने के लिए जंग लड़ रहा है।
कैराना के मोहल्ला बेगमपुरा में नगर पालिका के किराए के मकान में परिवार रहता है, जिसका विवाद न्यायालय में विचाराधीन है। कैराना नगर पालिका प्रशासन की तरफ से मकान खाली कराने के लिए बार बार नोटिस भेजे जा रहे हैं। मंगलवार को उनकी पांचवी पुण्यतिथि है। उनका परिवार आज भी कैराना में नगर पालिका परिषद के किराए के मकान में रहता है। परिवार के पास रोजगार का कोई खास साधन नहीं है। जैसे तैसे गुजर बसर हो रही है। नगर पालिका परिषद मकान को खाली कराना चाहता है। उनके बेटे जावेद इकबाल ने बताया कि 15 दिन पूर्व ही पालिका की तरफ से मकान खाली कराने के लिए नोटिस मिला। मकान का विवाद न्यायालय में लंबित है, लेकिन हर दिन यही डर सताता रहता है कि कहीं आशियाना छिन न जाए। उन्होंने अपने पिता का एक शेर पढ़ते हुए कहा कि, बात को सादगी से मत कहिए लोग कमजोरिया पकड़ते हैं, परिंदे भी नहीं रहते पराये आशियानों में, हमने उम्र गुजार दी किराये के मकानों में।
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जावेद इकबाल ने बताया कि वह बीमार रहते हैं तथा छोटा भाई परवेज जमाल बेरोजगार है, जबकि उससे छोटा नवेद कमाल भी किसी तरह अपने परिवार का पेट पालता है। नगर पालिका प्रशासन मकान खाली कराने के लिए उनके परिवार का दबाव बना रहा है। नगर पालिका उनके परिवार को सड़क पर लाने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहा है।
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---- मुजफ्फर रज्मी का जीवन परिचय
दरअसल, पांच जून 1940 में मोहल्ला बेगमपुरा में मोहम्मद इश्हाक के परिवार में जन्मे मुजफ्फर रजमी 12 साल की उम्र से ही शायरी करने लगे थे। नगर पालिका में बहुत कम वेतन पर नौकरी करते हुए वह दूरदराज में जाकर शायरी करते थे। उनकी शायरी के दीवाने देश विदेश में थे। 2008 में केंद्र सरकार की पहल पर पाकिस्तान में हुए मुशायरे में शिरकत की। साथ ही वह तीन बार सऊदी अरब और एक बार बहरीन तथा दुबई भी गए। इसी के चलते पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें 2004 और 2011 में दो बार 7 रेस कोर्स बुलाकर मुलाकात की थी। कई नामचीन नेताओं ने उनका शेर वो जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने, लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई पढ़ा था। यही नहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 2012 में विपक्ष में रहते हुए यही शेर संसद में पढ़ा था। 19 सितंबर 2012 में मुजफ्फर रज्मी इस दुनिया से अलविदा कह गए।