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Shahjahanpur News: अंग्रेजों के खिलाफ तकरीर करने पर मिली थी काला पानी की सजा
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सैयद मंजूर हसन, प्रपौत्र
शाहजहांपुर। जंग-ए-आजादी में योगदान करने वालों में काजी सैयद सरफराज अली का योगदान रहा है। जिले की जनता का मनोबल बढ़ाने वे कुछ क्रांतिकारियों के साथ यहां आए थे। उन्होंने बड़ी ईदगाह में जलसा कर अंग्रेजों के खिलाफ तकरीर कर माहौल बनाया था। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर 14 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।
सैयद सरफराज अली के पारिवारिक लोग वर्तमान में मोहल्ला झंडा में रहते हैं। उनका जन्म 1812 में हुआ था। उनके प्रपौत्र सेवानिवृत्त शिक्षक सैयद मंजूर हसन ने बताया कि सैयद सरफराज अली ने अंग्रेजों के विरोध में तकरीर कर आमजन मानस को झकझोरने का काम किया था। 1857 की क्रांति के बाद उन पर मुकदमा चला और 14 वर्ष के कालापानी की सजा देकर अंडमान निकोबार भेज दिया था। वहां कर्नल ब्रूस काजी से उर्दू व फारसी सीखते थे।
वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा की पुस्तक में काजी सरफराज का जिक्र किया गया। पुस्तक के अनुसार, कर्नल ब्रूस उनसे इतने प्रभावित हुए कि उनकी सजा कम करने की सिफारिश की। तीन साल के बाद काजी को रिहा कर दिया गया। 1876 में उनका निधन हो गया था। उनकी मजार मोहल्ला चमकनी में स्थापित है।
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सैयद सरफराज अली सैयद उपनाम से शायरी करते थे। अंग्रेजों के खिलाफ तकरीर करने पर उन्हें सजा मिली थी। वह दुनिया से चले गए, लेकिन उनका नाम आज भी इतिहास के पन्नाें में दर्ज है।
- सैयद मंजूर हसन, प्रपौत्र
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सैयद सरफराज अली के पारिवारिक लोग वर्तमान में मोहल्ला झंडा में रहते हैं। उनका जन्म 1812 में हुआ था। उनके प्रपौत्र सेवानिवृत्त शिक्षक सैयद मंजूर हसन ने बताया कि सैयद सरफराज अली ने अंग्रेजों के विरोध में तकरीर कर आमजन मानस को झकझोरने का काम किया था। 1857 की क्रांति के बाद उन पर मुकदमा चला और 14 वर्ष के कालापानी की सजा देकर अंडमान निकोबार भेज दिया था। वहां कर्नल ब्रूस काजी से उर्दू व फारसी सीखते थे।
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वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा की पुस्तक में काजी सरफराज का जिक्र किया गया। पुस्तक के अनुसार, कर्नल ब्रूस उनसे इतने प्रभावित हुए कि उनकी सजा कम करने की सिफारिश की। तीन साल के बाद काजी को रिहा कर दिया गया। 1876 में उनका निधन हो गया था। उनकी मजार मोहल्ला चमकनी में स्थापित है।
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सैयद सरफराज अली सैयद उपनाम से शायरी करते थे। अंग्रेजों के खिलाफ तकरीर करने पर उन्हें सजा मिली थी। वह दुनिया से चले गए, लेकिन उनका नाम आज भी इतिहास के पन्नाें में दर्ज है।
- सैयद मंजूर हसन, प्रपौत्र