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कभी पूरे संयुक्त प्रांत में सर्वश्रेष्ठ थी शाहजहांपुर की आबोहवा
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जिले में वन क्षेत्र धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है।
- फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। आज भले ही शाहजहांपुर वन कटान और औद्योगिक गतिविधियों की वजह से प्रदूषण की मार झेल रहा हो लेकिन कभी यहां का हवा-पानी बहुत बेहतर माना जाता था। पूरा क्षेत्र पेड़ों से पटा हुआ था और जंगली जानवरों की बहुतायत थी।
वर्तमान में जिले का वन क्षेत्र 6464.50 हेक्टेयर है। आज शाहजहांपुर प्रदेश के सबसे कम हरियाली वाले 13 जिलों में शामिल है। पहले स्थिति ऐसी नहीं थी। एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि ब्रिटिश गजेटियर के अध्ययन से पता चलता है कि सौ वर्ष पूर्व जिले का तकरीबन 70 हजार एकड़ क्षेत्र घने वनों से ढका हुआ था। उत्तर के खुटार परगने में कोरो के विशाल जंगल थे। जलालाबाद की तरफ रामगंगा के साथ चलते हुए ढाक के जंगल काफी मशहूर थे।
उत्तरी जंगली क्षेत्र हिमालयी जंगलों के विस्तार की आखिरी कड़ी थे। इनमे विभिन्न प्रकार के वन्य जीवों की उपस्थिति थी। गजेटियर से स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में बारहसिंघा इन जंगलों में वास करते थे। इसके अलावा हाथी, चार सिंघों वाले हिरन, भेड़िये, गीदड़, खरगोश, जंगली सुअर बहुत थे। ढाक के जंगलों में नीलगाय पाई जाती थीं। बाघो की संख्या भी यहां अनगिनत थीं लेकिन शिकार के चलते बहुत कम रह गए।
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शाहजहांपुर शहर भी एक बड़े उद्यान का प्रतिनिधि शहर था। जनरल हिस्ट्री ऑफ दी डिस्ट्रिक्ट्स के खंड पांच से पता चलता है कि शहर पीपल, बरगद, आम, नीम, इमली, जामुन, गूलर, बबूल के वृक्षों से पटा पड़ा था। यहां तक कि आबोहवा को पूरे संयुक्त प्रान्त में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया था और अंग्रेज अधिकारी यहां स्वास्थ्यलाभ लेने आते थे।
सन 1845 में तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर बॉइलर ने यहां टीक, कॉर्क के वृक्षों का आरोपण शुरू किया था। 2019 में जिले के 17 हजार एकड़ जंगल को टाइगर रिजर्व में शामिल कर दिया गया। जिसके बाद क्षेत्रफल के हिसाब से वनावरण क्षेत्र में काफी कमी दर्ज की गई। व्यक्तिगत, संस्थागत प्रयासों तथा कैंटोनमेंट बोर्ड की खाली पड़ी भूमि पर सघन वन उगाए जाने के बाद कैंट क्षेत्र में काफी हरियाली नजर आती है। इसके विपरीत शहर कंक्रीट का ही जंगल बनकर रह गया है। आज शहर की मुख्य सड़क पर मात्र दो या तीन पीपल के पेड़ ही नजर आते है जो मंदिर के परिसरों में लगे हैं।
माई हाफ ट्री ने तीन साल में लगाए हजारों पेड़
माई हॉफ ट्री संस्था की स्थापना 2018 में शहर के प्रकृति प्रेमी आशीष भारद्वाज ने की थी। उद्देश्य था मियावाकी पद्धति के अनुसार शहर में पेड़ों की संख्या बढ़ाना। शीघ्र ही संस्था से शहर के अनेक उत्साही युवा जुड़ गए। बड़ी संख्या में कम खर्च पर आदमकद पौधों को लगाया गया। बहुत ही कम समय मे शहर की अनेक सड़कें, मंदिर परिसर पौधों से हरे-भरे हो गए। मियावाकी पद्धति से कम से कम दस हजार पौधे लगाए गए जिनका सरवाइवल रेट अच्छा रहा। वर्तमान में संस्था द्वारा खाली पड़े विशाल भू-क्षेत्र पर बड़े और सघन उपवन ‘हरिवन’ तथा ‘रामवन’ बनाने का काम चल रहा है। शहर में एक अनूठी परंपरा भी स्थापित की गई है। जब भी किसी का जन्मदिन अथवा अन्य कोई प्रमुख दिन होता है तो वह वह इन उपवन में पौधा रोपता है। देखरेख के लिए संस्था द्वारा विशेष स्टाफ की नियुक्ति भी की गई है।
घर-घर पहुंचाए तुलसी के पौधे
पर्यावरण के लिए समर्पित संस्था पृथ्वी की स्थापना एसएस कालेज में इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने 2011 में कॉलेज के प्राध्यापकों और छात्र-छात्राओं के साथ की थी। संस्था ने लगभग डेढ़ लाख से अधिक तुलसी के पौधे शहर के मंदिरों में वितरित किए। मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद की प्रेरणा से तीन नक्षत्र वाटिकाएं लगाईं। संस्था ने ग्रीन शाहजहांपुर, नेचर, चिड़ियां, गर्रा बचाओ आदि अभियान चलाकर पर्यावरण को संरक्षित रखने में योगदान दिया। शहर के अनेक उजड़े पार्कों को गोद लेकर संस्था से जुड़े छात्रों ने हराभरा किया। संस्था द्वारा समय-समय पर शहर के प्रदूषण के स्तर की जांच कर आंकड़े प्रकाशित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त गर्रा नदी में अवैध खनन, खुटार में वनों की अनधिकृत कटाई तथा गरई नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए संस्था नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के दरवाजे खटखटा चुकी है। संवाद
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वर्तमान में जिले का वन क्षेत्र 6464.50 हेक्टेयर है। आज शाहजहांपुर प्रदेश के सबसे कम हरियाली वाले 13 जिलों में शामिल है। पहले स्थिति ऐसी नहीं थी। एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि ब्रिटिश गजेटियर के अध्ययन से पता चलता है कि सौ वर्ष पूर्व जिले का तकरीबन 70 हजार एकड़ क्षेत्र घने वनों से ढका हुआ था। उत्तर के खुटार परगने में कोरो के विशाल जंगल थे। जलालाबाद की तरफ रामगंगा के साथ चलते हुए ढाक के जंगल काफी मशहूर थे।
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उत्तरी जंगली क्षेत्र हिमालयी जंगलों के विस्तार की आखिरी कड़ी थे। इनमे विभिन्न प्रकार के वन्य जीवों की उपस्थिति थी। गजेटियर से स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में बारहसिंघा इन जंगलों में वास करते थे। इसके अलावा हाथी, चार सिंघों वाले हिरन, भेड़िये, गीदड़, खरगोश, जंगली सुअर बहुत थे। ढाक के जंगलों में नीलगाय पाई जाती थीं। बाघो की संख्या भी यहां अनगिनत थीं लेकिन शिकार के चलते बहुत कम रह गए।
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शाहजहांपुर शहर भी एक बड़े उद्यान का प्रतिनिधि शहर था। जनरल हिस्ट्री ऑफ दी डिस्ट्रिक्ट्स के खंड पांच से पता चलता है कि शहर पीपल, बरगद, आम, नीम, इमली, जामुन, गूलर, बबूल के वृक्षों से पटा पड़ा था। यहां तक कि आबोहवा को पूरे संयुक्त प्रान्त में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया था और अंग्रेज अधिकारी यहां स्वास्थ्यलाभ लेने आते थे।
सन 1845 में तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट मिस्टर बॉइलर ने यहां टीक, कॉर्क के वृक्षों का आरोपण शुरू किया था। 2019 में जिले के 17 हजार एकड़ जंगल को टाइगर रिजर्व में शामिल कर दिया गया। जिसके बाद क्षेत्रफल के हिसाब से वनावरण क्षेत्र में काफी कमी दर्ज की गई। व्यक्तिगत, संस्थागत प्रयासों तथा कैंटोनमेंट बोर्ड की खाली पड़ी भूमि पर सघन वन उगाए जाने के बाद कैंट क्षेत्र में काफी हरियाली नजर आती है। इसके विपरीत शहर कंक्रीट का ही जंगल बनकर रह गया है। आज शहर की मुख्य सड़क पर मात्र दो या तीन पीपल के पेड़ ही नजर आते है जो मंदिर के परिसरों में लगे हैं।
माई हाफ ट्री ने तीन साल में लगाए हजारों पेड़
माई हॉफ ट्री संस्था की स्थापना 2018 में शहर के प्रकृति प्रेमी आशीष भारद्वाज ने की थी। उद्देश्य था मियावाकी पद्धति के अनुसार शहर में पेड़ों की संख्या बढ़ाना। शीघ्र ही संस्था से शहर के अनेक उत्साही युवा जुड़ गए। बड़ी संख्या में कम खर्च पर आदमकद पौधों को लगाया गया। बहुत ही कम समय मे शहर की अनेक सड़कें, मंदिर परिसर पौधों से हरे-भरे हो गए। मियावाकी पद्धति से कम से कम दस हजार पौधे लगाए गए जिनका सरवाइवल रेट अच्छा रहा। वर्तमान में संस्था द्वारा खाली पड़े विशाल भू-क्षेत्र पर बड़े और सघन उपवन ‘हरिवन’ तथा ‘रामवन’ बनाने का काम चल रहा है। शहर में एक अनूठी परंपरा भी स्थापित की गई है। जब भी किसी का जन्मदिन अथवा अन्य कोई प्रमुख दिन होता है तो वह वह इन उपवन में पौधा रोपता है। देखरेख के लिए संस्था द्वारा विशेष स्टाफ की नियुक्ति भी की गई है।
घर-घर पहुंचाए तुलसी के पौधे
पर्यावरण के लिए समर्पित संस्था पृथ्वी की स्थापना एसएस कालेज में इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने 2011 में कॉलेज के प्राध्यापकों और छात्र-छात्राओं के साथ की थी। संस्था ने लगभग डेढ़ लाख से अधिक तुलसी के पौधे शहर के मंदिरों में वितरित किए। मुमुक्षु आश्रम के अधिष्ठाता स्वामी चिन्मयानंद की प्रेरणा से तीन नक्षत्र वाटिकाएं लगाईं। संस्था ने ग्रीन शाहजहांपुर, नेचर, चिड़ियां, गर्रा बचाओ आदि अभियान चलाकर पर्यावरण को संरक्षित रखने में योगदान दिया। शहर के अनेक उजड़े पार्कों को गोद लेकर संस्था से जुड़े छात्रों ने हराभरा किया। संस्था द्वारा समय-समय पर शहर के प्रदूषण के स्तर की जांच कर आंकड़े प्रकाशित किये जाते हैं। इसके अतिरिक्त गर्रा नदी में अवैध खनन, खुटार में वनों की अनधिकृत कटाई तथा गरई नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए संस्था नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के दरवाजे खटखटा चुकी है। संवाद