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विजय दिवस : 1971 के भारत-पाक युद्ध में जिले के रणबांकुरों ने दी थी प्राणों की आहुति
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अमर शहीद दृगपाल सिंह के फोटो के साथ परिजन।
- फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। वर्ष 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध में मिली जीत में जिले के भी तमाम सैनिकों का योगदान रहा। आज मनाए जा रहे विजय पर्व की पृष्ठभूमि में जनपद के कई सैनिकों का प्राणोत्सर्ग छिपा है। कई सैनिकों के परिवारों का जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास कार्यालय में कोई विवरण उपलब्ध नहीं है।
नेवी में कमांडर पद से सेवानिवृत्त हुए जिला सैनिक कल्याण अधिकारी दिनेश कुमार मिश्रा ने बताया कि इसी युद्ध में भारतीय नेवी के जवानों ने पाकिस्तान की अजेय समझी जाने वाली गाजी पनडुब्बी अरब सागर में डुबो दी और वायुसेना के बमवर्षकों ने कराची बंदरगाह पूरी तरह तबाह कर दिया। दुश्मन के जवाबी हमले मेें भारत का युद्धपोत आईएनएस खुखरी नष्ट हो गया और उस पर तैनात कमांडिंग ऑफीसर एमएन मुल्ला व तिलहर के मोहल्ला हिंदूपट्टी निवासी नेवी के सब-लेफ्टिनेंट शशि प्रकाश समेत कई सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। एमएन मुल्ला को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। नौ दिसंबर 1971 को गुलड़िया (जलालाबाद) निवासी सेना के गार्ड रामहरि सिंह व रघुनाथपुर (जलालाबाद) के सिपाही विद्याराम ने शहादत दी और चार दिन बाद 13 दिसंबर 1971 को जनपद की जलालाबाद तहसील के ग्राम नौगवां निवासी लांसनायक द्रगपाल सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
लांसनायक द्रगपाल को मरणोपरांत मिला महावीर चक्र
नौगवां निवासी लांसनायक द्रगपाल सिंह 29 जून 1965 को थल सेना की पांच राजपूत यूनिट की इंफैंट्री शाखा में भर्ती हुए थे। सेना की विभिन्न छावनियों में तैनाती के बाद बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी की सहायता के लिए भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो द्रगपाल को पश्चिमी मोर्चे से बुलावा आ गया। वहां राजपूत रेजीमेंट की बटालियन के एक खंड की कमान संभालने के दौरान वह दुश्मन के बंकर में रेंगते हुए घुस गए। उन्होंने ग्रेनेड से हमला कर दुश्मन और उनके बंकर तबाह कर दिए। सेना की ओर से महावीर चक्र के साथ दिए गए प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि ग्रेनेड के पहले हमले में घायल द्रगपाल के शरीर से खून बहने पर भी उन्होंने अपने जीवन सुरक्षा की परवाह नहीं की और दुश्मन के दूसरे बंकर की ओर बढ़ गए। दूसरा धमाका उनकी छाती पर होने से वह शहीद हो गए और इस तरह उन्होंने सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप सर्वोच्च बलिदान दे दिया। अब उनका परिवार शहर के समीप चिनौर क्षेत्र में रह रहा है। गत वर्ष उनकी पत्नी विद्यावती का स्वर्गवास हो चुका है। उनके दो भाई वीरपाल सिंह व मुनीश्वर सिंह और उनके बेटे-बेटियों को द्रगपाल की शहादत पर बेहद गर्व है।
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तिलहर से विस्थापित हुआ शहीद शशि प्रकाश का परिवार
तिलहर। वर्ष 1971 के युद्ध में शहीद हुए तिलहर के मोहल्ला हिंदू पट्टी निवासी शशि प्रकाश तीन भाइयों में दूसरे नंबर के थे। वर्तमान समय में उनके बड़े भाई ओमप्रकाश सेवा से रिटायर होकर बरेली में निवास कर रहे हैं। उनके छोटे भाई (घरेलू नाम छुल्लक) भी सेना में थे, लेकिन वह इस समय कहां हैं, यह मोहल्ले के बड़े-बुजुर्गों को भी पता नहीं है। उनके पिता स्वर्गीय श्याम सुंदर लाल अपने जीवित अवस्था में अपना पैतृक मकान आर्यसमाज मंदिर को वसीयत कर गए थे। उनके पड़ोसी कैलाश प्रकाश खत्री ने बताते हैं कि शशि प्रकाश जब शहीद हुए, तब वह बहुत छोटे थे। उन्होंने बताया कि उनका शव यहां नहीं आ पाया था, लेकिन उनकी याद में यहां विशाल जुलूस निकाला गया था। कैलाश के अनुसार उस समय आर्य समाज के निकट से उनके घर को जाने वाले मार्ग का नाम शहीद शशि प्रकाश रखने का प्रस्ताव किया गया था, लेकिन नगरपालिका प्रशासन ने अभी तक इस सड़क का नामकरण नहीं किया है। शहीद शशि प्रकाश के पिता श्याम सुंदर पुलिस में थे और उनकी मां सरकारी शिक्षक थीं। संवाद
पाकिस्तान से जंग में शहीद हुए थे अजोधापुर के नायक अनोख सिंह
पुवायां। 1947 के भारत पाक बंटवारे में पाकिस्तान के सियालकोट से निकल कर ईशर सिंह और मां लाभ कौर के साथ आकर अनोख सिंह का परिवार बंडा के अजोधापुर में बसा था। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण अनोख सिंह ने पंजाब के जालंधर में पहुंचकर बहन प्यार कौर के यहां रहकर प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की और वहीं से पंजाब रेजीमेंट में भर्ती हो गए थे। वर्ष 1971 में शहादत से कुछ दिन पूर्व ही नायक अनोख सिंह अपनी तीन वर्ष की बेटी दलजीत कौर और डेढ़ वर्ष के बेटे कश्मीर सिंह को छोड़कर ड्यूटी पर गए थे। नायक अनोख सिंह के शहीद होने की जानकारी परिवार के लोगों को तब हो सकी थी, जब पंजाब रेजीमेंट के उनके साथी अनोख सिंह की वर्दी, जूते और अन्य सामान लेकर गांव अजोधापुर पहुंचे थे। तब सबको पता लगा कि अनोख सिंह देश की खातिर शहीद हो गए हैं। परिजनों को शहीद के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन तक मयस्सर नहीं हो सके थे। पुत्र कश्मीर सिंह ने बताया कि पिता अनोख सिंह पाकिस्तान से जंग में शहीद हुए थे। मैंने तो उन्हें देखा तक नहीं। घर पर उनके जूते और वर्दी आई थी। अनोख सिंह को खोने के बाद पत्नी गुरमीत कौर ने कच्ची गृहस्थी का भार अपने ससुर ईशर सिंह और सास लाभ कौर के सहारे वीर नारी की तरह संभाला। गुरमीत कौर की अप्रैल 2021 में मृत्यु हो चुकी है। संवाद
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नेवी में कमांडर पद से सेवानिवृत्त हुए जिला सैनिक कल्याण अधिकारी दिनेश कुमार मिश्रा ने बताया कि इसी युद्ध में भारतीय नेवी के जवानों ने पाकिस्तान की अजेय समझी जाने वाली गाजी पनडुब्बी अरब सागर में डुबो दी और वायुसेना के बमवर्षकों ने कराची बंदरगाह पूरी तरह तबाह कर दिया। दुश्मन के जवाबी हमले मेें भारत का युद्धपोत आईएनएस खुखरी नष्ट हो गया और उस पर तैनात कमांडिंग ऑफीसर एमएन मुल्ला व तिलहर के मोहल्ला हिंदूपट्टी निवासी नेवी के सब-लेफ्टिनेंट शशि प्रकाश समेत कई सैनिकों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। एमएन मुल्ला को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। नौ दिसंबर 1971 को गुलड़िया (जलालाबाद) निवासी सेना के गार्ड रामहरि सिंह व रघुनाथपुर (जलालाबाद) के सिपाही विद्याराम ने शहादत दी और चार दिन बाद 13 दिसंबर 1971 को जनपद की जलालाबाद तहसील के ग्राम नौगवां निवासी लांसनायक द्रगपाल सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
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लांसनायक द्रगपाल को मरणोपरांत मिला महावीर चक्र
नौगवां निवासी लांसनायक द्रगपाल सिंह 29 जून 1965 को थल सेना की पांच राजपूत यूनिट की इंफैंट्री शाखा में भर्ती हुए थे। सेना की विभिन्न छावनियों में तैनाती के बाद बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी की सहायता के लिए भारत सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ा तो द्रगपाल को पश्चिमी मोर्चे से बुलावा आ गया। वहां राजपूत रेजीमेंट की बटालियन के एक खंड की कमान संभालने के दौरान वह दुश्मन के बंकर में रेंगते हुए घुस गए। उन्होंने ग्रेनेड से हमला कर दुश्मन और उनके बंकर तबाह कर दिए। सेना की ओर से महावीर चक्र के साथ दिए गए प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि ग्रेनेड के पहले हमले में घायल द्रगपाल के शरीर से खून बहने पर भी उन्होंने अपने जीवन सुरक्षा की परवाह नहीं की और दुश्मन के दूसरे बंकर की ओर बढ़ गए। दूसरा धमाका उनकी छाती पर होने से वह शहीद हो गए और इस तरह उन्होंने सेना की सर्वोच्च परंपराओं के अनुरूप सर्वोच्च बलिदान दे दिया। अब उनका परिवार शहर के समीप चिनौर क्षेत्र में रह रहा है। गत वर्ष उनकी पत्नी विद्यावती का स्वर्गवास हो चुका है। उनके दो भाई वीरपाल सिंह व मुनीश्वर सिंह और उनके बेटे-बेटियों को द्रगपाल की शहादत पर बेहद गर्व है।
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तिलहर से विस्थापित हुआ शहीद शशि प्रकाश का परिवार
तिलहर। वर्ष 1971 के युद्ध में शहीद हुए तिलहर के मोहल्ला हिंदू पट्टी निवासी शशि प्रकाश तीन भाइयों में दूसरे नंबर के थे। वर्तमान समय में उनके बड़े भाई ओमप्रकाश सेवा से रिटायर होकर बरेली में निवास कर रहे हैं। उनके छोटे भाई (घरेलू नाम छुल्लक) भी सेना में थे, लेकिन वह इस समय कहां हैं, यह मोहल्ले के बड़े-बुजुर्गों को भी पता नहीं है। उनके पिता स्वर्गीय श्याम सुंदर लाल अपने जीवित अवस्था में अपना पैतृक मकान आर्यसमाज मंदिर को वसीयत कर गए थे। उनके पड़ोसी कैलाश प्रकाश खत्री ने बताते हैं कि शशि प्रकाश जब शहीद हुए, तब वह बहुत छोटे थे। उन्होंने बताया कि उनका शव यहां नहीं आ पाया था, लेकिन उनकी याद में यहां विशाल जुलूस निकाला गया था। कैलाश के अनुसार उस समय आर्य समाज के निकट से उनके घर को जाने वाले मार्ग का नाम शहीद शशि प्रकाश रखने का प्रस्ताव किया गया था, लेकिन नगरपालिका प्रशासन ने अभी तक इस सड़क का नामकरण नहीं किया है। शहीद शशि प्रकाश के पिता श्याम सुंदर पुलिस में थे और उनकी मां सरकारी शिक्षक थीं। संवाद
पाकिस्तान से जंग में शहीद हुए थे अजोधापुर के नायक अनोख सिंह
पुवायां। 1947 के भारत पाक बंटवारे में पाकिस्तान के सियालकोट से निकल कर ईशर सिंह और मां लाभ कौर के साथ आकर अनोख सिंह का परिवार बंडा के अजोधापुर में बसा था। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण अनोख सिंह ने पंजाब के जालंधर में पहुंचकर बहन प्यार कौर के यहां रहकर प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की और वहीं से पंजाब रेजीमेंट में भर्ती हो गए थे। वर्ष 1971 में शहादत से कुछ दिन पूर्व ही नायक अनोख सिंह अपनी तीन वर्ष की बेटी दलजीत कौर और डेढ़ वर्ष के बेटे कश्मीर सिंह को छोड़कर ड्यूटी पर गए थे। नायक अनोख सिंह के शहीद होने की जानकारी परिवार के लोगों को तब हो सकी थी, जब पंजाब रेजीमेंट के उनके साथी अनोख सिंह की वर्दी, जूते और अन्य सामान लेकर गांव अजोधापुर पहुंचे थे। तब सबको पता लगा कि अनोख सिंह देश की खातिर शहीद हो गए हैं। परिजनों को शहीद के पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन तक मयस्सर नहीं हो सके थे। पुत्र कश्मीर सिंह ने बताया कि पिता अनोख सिंह पाकिस्तान से जंग में शहीद हुए थे। मैंने तो उन्हें देखा तक नहीं। घर पर उनके जूते और वर्दी आई थी। अनोख सिंह को खोने के बाद पत्नी गुरमीत कौर ने कच्ची गृहस्थी का भार अपने ससुर ईशर सिंह और सास लाभ कौर के सहारे वीर नारी की तरह संभाला। गुरमीत कौर की अप्रैल 2021 में मृत्यु हो चुकी है। संवाद

गांव अजोधापुर में नायक अनोख सिंह के परिवार के लोग- फोटो : POWAYAN