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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Shahjahanpur News ›   The history of Baba Vishwanath temple is wonderful

अद्भुत है बाबा विश्वनाथ मंदिर का इतिहास

Mon, 10 Jul 2017 12:25 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, शाहजहांपुर
अमर उजाला ब्यूरो, शाहजहांपुर Updated Mon, 10 Jul 2017 12:25 AM IST
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आदि देव भगवान भोले की विशेष पूजा-अर्चना का माह सावन दस जुलाई से आरंभ हो रहा है। अब श्रावण मास की चर्चा हो तो शिवालयों की बात न हो यह कैसे हो सकता है। वैसे तो जनपद में सुदूरवर्ती क्षेत्रों में कई पौराणिक शिवालय हैं, जो महाभारत काल के बताए जाते हैं, लेकिन नगर क्षेत्र की बात की जाए तो यहां भी कई प्राचीन मंदिर हैं। इनमें शिवालयों की स्थापना सौ-सवा सौ साल पहले हुए थी। इन मंदिरों में सबसे प्राचीन चौक स्थित बाबा चौकसी नाथ मंदिर है, जो अब 189 साल पहले बनवाया गया था। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहां एक ही अरघे में दो शिवलिंग स्थापित हैं।  
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नगर में टाउनहाल स्थित बाबा विश्वनाथ मंदिर सबसे भव्य है और इसका सुंदरीकरण निरंतर होता रहता है। सुंदरीकरण होने से इसकी भव्यता और दिव्यता में समय-दर-समय निखार आता जा रहा है। इतिहासकार डॉ. एनसी मेहरोत्रा की पुस्तक से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 1953 में विशन चंद्र सेठ नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष बने तो उन्होंने नगर पालिका कार्यालय के समीप ही अमरूद के बाग में मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। चूंकि नगर पालिका के समीप ही सेठ से पूर्व रहे अध्यक्ष ने मुस्लिम कर्मचारियों के लिए मस्जिद का निर्माण कराया था, इसलिए मंदिर निर्माण भी बहुत जरूरी समझा गया। बताते है कि शुरुआत में मंदिर का विरोध हुआ। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट के निरीक्षण से पूर्व बाग में एक पेड़ के नीचे कुछ पत्थर रखकर उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर दी गई। बाद में सरदार दर्शन सिंह के घर से शिवलिंग के आकार का एक भारी लोढ़ा लाकर उसकी स्थापना कर दी गई और उसी की पूजा शुरू हो गई।  
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बताते हैं कि एक ओर मंदिर निर्माण को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही थी, वहीं दूसरी ओर जनसमुदाय ने नगर पालिका अध्यक्ष को प्रार्थना पत्र देकर मंदिर निर्माण की मांग करनी शुरू कर दी। इसी बीच चार मई 1956 को बाबा विश्वनाथ मंदिर प्रबंध समिति का रजिस्ट्रेशन भी करा दिया गया। इसी क्रम में 21 जनवरी 1957 को प्रदेश के तत्कालीन मंत्री सैयद अली जहीर शाहजहांपुर आए तो समिति ने उन्हें ज्ञापन देकर मंदिर निर्माण की बात कही। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद के हस्तक्षेप से इसके बाद मंदिर निर्माण शुरू करा दिया गया। मंदिर के ही समीप 25 फरवरी 1966 को बाबा विश्वनाथ यात्री निवास की आधारशिला रखी गई। 
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अब यह मंदिर हिंदू समुदाय के लिए विशेष आराधना का केंद्र बन चुका है। यहां भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश जी, शिवलिंग, नंदी के साथ मां दुर्गा, राधा-कृष्ण, श्रीराम दरबार, रामभक्त हनुमान, शनिदेव आदि की दिव्य प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है। नवरात्र में जहां इस मंदिर में मां भगवती की आराधना को भक्त उमड़ते हैं, वहीं श्रावण मास में भगवान भोलेनाथ के भक्त जलाभिषेक को उमड़ते रहते हैं। यह शहर का प्रमुख मंदिर बन चुका है। 

बहुत लुभावनी है इन मंदिरों की वास्तुकला 
वास्तुकला की दृष्टि से चौक क्षेत्र के मंदिर बहुत लुभावने हैं। हालांकि इन मंदिरों में भक्तों का आना-जाना बहुत कम है, लेकिन सौ-सवा सौ साल पुराने यह मंदिर शहर की धरोहर हैं। खासतौर पर श्री बद्रीश्वर महादेव मंदिर, लाला चंदूलाल मंदिर, सरायंकाइयां का शिव मंदिर प्रमुख हैं। मंदिरों की इसी श्रृंखला में चौक में एक ही वास्तुकला के कच्चा कटरा मोड़ से छोटा चौक तक कई मंदिर हैं, जिसमें छोटा चौक स्थित महादेव मंदिर नगर का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है। इन मंदिरों का निर्माण 1857 क्रांति के बाद का बताया जाता है। पूजा-अर्चना की दृष्टि से बाबा बनखंडी नाथ मंदिर में भी सुबह-शाम सैकड़ों भक्त उमड़ते रहते हैं। 


शिव को जल अर्पित करना ही कांवड़
बाबा विश्वनाथ मंदिर के पुजारी आचार्य उमेश उपाध्याय ने बताया कि समुद्र मंथन के दौरान जो विष निकला था, उसे भगवान भोलेनाथ ने पी लिया था, जिससे उनके मस्तक पर गर्मी चढ़ गई थी। चूंकि बेल शीतल होता है, इसलिए इसी गर्मी को शांत करने के लिए बेलपत्र अर्पित किया जाता है। बेलपत्र के साथ दूध, दही, शहद, घी, गन्ने के रस, गंगाजल आदि से भोले भंडारी का अभिषेक किया जाता है। आचार्य ने कांवड़ का महत्व समझाते हुए बताया कि किसी भी घाट से गंगाजल लाकर अपने माने हुए शिवलिंग पर अर्पित करना ही कांवड़ कहलाती है। वह बताते हैं कि श्रावण मास में भगवान शिव मृत्युलोक में आते हैं, इसलिए इस महीने में अभिषेक करना अधिक लाभदायक हो जाता है। बेलपत्र अर्पित करने का कोई समय निर्धारित नहीं होता, यह किसी भी समय अर्पित की जा सकती है।
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