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पढ़ाई मार्च तक, फीस ले ली जून तक की
अजय अवस्थी/शाहजहांपुर।
Updated Sun, 19 Apr 2015 11:31 PM IST
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अपने सूबे में शिक्षा को हमेशा से ही प्रयोग की भट्ठी में झोंका जाता रहा है। कभी भी कोई सरकार किसी ऐसे ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी, जिसको बाद की सरकारें सही मानतीं और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ती नजर आती। शैक्षिक सत्र परिवर्तन भी इसी प्रयोग का हिस्सा है। आननफानन में लिए गए निर्णय का खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है। शिक्षण संस्थाओं का खजाना तीन माह में ही बिना कुछ किए धरे भर गया है।
यूपी में हिंदी माध्यम यानी बेसिक और माध्यमिक शिक्षा परिषद से संचालित होने वाले स्कूल-कॉलेजों का सत्र आदिकाल से ही पहली जुलाई से 30 जून तक चलता रहा है, लेकिन इस बार परिषद ने अपनी पगडंडी छोड़ सीबीएसई रोड पर फर्राटे भरने का निर्णय ले लिया और बीच सत्र में ही शैक्षिक सत्र 2015-16 एक अप्रैल से शुरू कर 31 मार्च को खत्म करने का निर्णय ले लिया। इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन विभाग और शासन से भूल ये हो गई कि जो सत्र पहले से पुराने पैटर्न पर चल रहा था, उसे भी 31 मार्च को खत्म करने का फरमान जारी कर दिया। जबकि यह सत्र हमेशा की तरह पहली जुलाई से ही शुरू हुआ था। नतीजा यह हुआ कि बीता सत्र अर्थात 2014-15 का सत्र एक साल के बजाय नौ महीने में निपटा दिया गया, जबकि अभिभावकों से पूरे बारह महीनों की फीस वसूली गई। फीस वसूली में किसी तरह की रियायत नहीं की गई।
खास बात यह भी है कि इस तीन माह (अप्रैल, मई, जून) की फीस को आगामी यानी नवीन शैक्षिक सत्र जो पहली अप्रैल से शुरू हुआ, उसमें समायोजित की गई। इसी बात को लेकर अभिभावकों के तेवर चढ़े हुए है, जो लाजिमी भी है। आखिर सरकार के तुगलकी फरमान का खामियाजा जनता क्यों भरे। सरकार को शैक्षिक सत्र में बदलाव करना था, तो शिक्षण संस्थाओं को आदेश करके मार्च तक की फीस ही लेने के आदेश दिए जाते, लेकिन कहीं न कहीं सरकार की मंशा में भी खोट ही रहा। इसका सीधा लाभ शिक्षण संस्थाओं ने उठाया। फिर चाहें वह प्राइवेट स्कूल-कॉलेज रहे हों, या फिर सरकारी अथवा अर्ध सरकारी। फर्क सिर्फ यह है कि सरकारी स्कूलों में फीस कम है और प्राइवेट स्कूलों में शुल्क का दायरा सीमित ही नहीं है, यानी जितने स्कूल उतनी ही प्रकार की फीस। हर स्कूल ने फीस का निर्धारण अपने स्टैंडर्ड के हिसाब से तय कर रखा है।
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अब शिक्षण संस्थाएं शिक्षण सत्र का हवाला देकर अभिभावकों को दोहरी चोट पहुंचाने की जुगत में लगी हैं, वह नौ या बारह महीनों की गिनती नहीं कर रहीं, सीधे सत्र समाप्ति बता रही हैं। ऐसे में अभिभावकों को सरकारी और स्कूली चक्की के पाटों के बीच पिसने के अलावा और कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है।
फीस समायोजन डीआईओएस का अधिकार नहीं
‘फीस का समायोजन कराना डीआईओएस के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। शासन ने शैक्षिक सत्र में परिवर्तन किया है, इसलिए शुल्क का समायोजन और निर्धारण भी उसी का काम है। फीस समायोजन की समस्या केवल शाहजहांपुर में ही नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में है। इसमें जो कुछ संशोधन करना होगा, वह सरकार ही करेगी’।
- राकेश कुमार, जिला विद्यालय निरीक्षक
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यूपी में हिंदी माध्यम यानी बेसिक और माध्यमिक शिक्षा परिषद से संचालित होने वाले स्कूल-कॉलेजों का सत्र आदिकाल से ही पहली जुलाई से 30 जून तक चलता रहा है, लेकिन इस बार परिषद ने अपनी पगडंडी छोड़ सीबीएसई रोड पर फर्राटे भरने का निर्णय ले लिया और बीच सत्र में ही शैक्षिक सत्र 2015-16 एक अप्रैल से शुरू कर 31 मार्च को खत्म करने का निर्णय ले लिया। इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन विभाग और शासन से भूल ये हो गई कि जो सत्र पहले से पुराने पैटर्न पर चल रहा था, उसे भी 31 मार्च को खत्म करने का फरमान जारी कर दिया। जबकि यह सत्र हमेशा की तरह पहली जुलाई से ही शुरू हुआ था। नतीजा यह हुआ कि बीता सत्र अर्थात 2014-15 का सत्र एक साल के बजाय नौ महीने में निपटा दिया गया, जबकि अभिभावकों से पूरे बारह महीनों की फीस वसूली गई। फीस वसूली में किसी तरह की रियायत नहीं की गई।
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खास बात यह भी है कि इस तीन माह (अप्रैल, मई, जून) की फीस को आगामी यानी नवीन शैक्षिक सत्र जो पहली अप्रैल से शुरू हुआ, उसमें समायोजित की गई। इसी बात को लेकर अभिभावकों के तेवर चढ़े हुए है, जो लाजिमी भी है। आखिर सरकार के तुगलकी फरमान का खामियाजा जनता क्यों भरे। सरकार को शैक्षिक सत्र में बदलाव करना था, तो शिक्षण संस्थाओं को आदेश करके मार्च तक की फीस ही लेने के आदेश दिए जाते, लेकिन कहीं न कहीं सरकार की मंशा में भी खोट ही रहा। इसका सीधा लाभ शिक्षण संस्थाओं ने उठाया। फिर चाहें वह प्राइवेट स्कूल-कॉलेज रहे हों, या फिर सरकारी अथवा अर्ध सरकारी। फर्क सिर्फ यह है कि सरकारी स्कूलों में फीस कम है और प्राइवेट स्कूलों में शुल्क का दायरा सीमित ही नहीं है, यानी जितने स्कूल उतनी ही प्रकार की फीस। हर स्कूल ने फीस का निर्धारण अपने स्टैंडर्ड के हिसाब से तय कर रखा है।
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अब शिक्षण संस्थाएं शिक्षण सत्र का हवाला देकर अभिभावकों को दोहरी चोट पहुंचाने की जुगत में लगी हैं, वह नौ या बारह महीनों की गिनती नहीं कर रहीं, सीधे सत्र समाप्ति बता रही हैं। ऐसे में अभिभावकों को सरकारी और स्कूली चक्की के पाटों के बीच पिसने के अलावा और कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है।
फीस समायोजन डीआईओएस का अधिकार नहीं
‘फीस का समायोजन कराना डीआईओएस के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। शासन ने शैक्षिक सत्र में परिवर्तन किया है, इसलिए शुल्क का समायोजन और निर्धारण भी उसी का काम है। फीस समायोजन की समस्या केवल शाहजहांपुर में ही नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में है। इसमें जो कुछ संशोधन करना होगा, वह सरकार ही करेगी’।
- राकेश कुमार, जिला विद्यालय निरीक्षक