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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Shahjahanpur News ›   Stockpiles of rice nursery would be cast action

साठा धान की नर्सरी डाली तो होगी कार्रवाई

Fri, 13 Jan 2017 12:05 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला शाहजहांपुर
ब्यूरो, अमर उजाला शाहजहांपुर Updated Fri, 13 Jan 2017 12:05 AM IST
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साठा धान से जल और पर्यावरण को हो रहे नुकसान को देखते हुए प्रशासन ने किसानों को साठा धान के प्रति हतोत्साहित करने की तैयारी कर ली है। इसके तहत साठा धान की पौध डालने वाले किसानों की सूची तलब की गई है। इन किसानों को सीआरपीसी की धारा 133 के तहत नोटिस भिजवाया जाएगा। गौरतलब है कि पुवायां तहसील में साठा धान की फसल भारी भूभाग में की जाती है। साल दर साल साठा का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है। साठा धान को ज्यादा पानी की जरूरत होती है जिस कारण वाटर लेबिल नीचे गिरता जा रहा है और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचता है। पंजाब और हरियाणा में भी साठा धान की खेती बड़े क्षेत्रफल में की जाती थी। इससे हो रहे नुकसान हो देखते हुए पंजाब सरकार ने 2009 में पानी एक्ट लागू कर दिया। इसके तहत 10 जून से पहले धान नहीं लगाया जा सकता है। हरियाणा में कोई भी किसान 10 मई से पहले धान की नर्सरी तैयार नहीं कर सकता है। 
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अब जिले में भी साठा धान के प्रति हतोत्साहित करने के लिए जिला विकास अधिकारी ने जिला कृषि रखा अधिकारी को भेजे पत्र में साठा धान से हो रहे नुकसान पर चिंता जताते हुए कार्रवाई के निर्देश दिए थे। सीडीओ के पत्र के क्रम में जिला कृषि रक्षा अधिकारी ने जिले की समस्त कृषि रक्षा इकाई के प्रभारियों को भेजे पत्र में साठा धान की नर्सरी तैयार करने वाले किसानों की सूची तलब की है। पत्र में कहा गया है कि साठा की पौध डालने वाले किसानों को सक्षम स्तर से सीआरपीसी की धारा 133 के तहत नोेटिस जारी कर कार्रवाई कराई जाएगी। 
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साठा धान से जल स्तर प्रभावित होता है और जन सामान्य के लिए स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था भी प्रभावित होती है। साठा धान लगाने के लिए किसानों को हतोत्साहित किए जाने के क्रम में सूची मांगी गई है। - डीएस चौधरी, जिला कृषि रक्षा अधिकारी शाहजहांपुर
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पर्यावरण और पानी का दुश्मन है साठा
पुवायां। तहसील पुवायां क्षेत्र में साठा धान के बढ़ते क्षेत्रफल ने भूगर्भीय जलस्तर काफी नीचे ढकेल दिया है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि साठा का क्षेत्रफल इसी गति से बढ़ता रहा तो पीने तक के लिए पानी का संकट खड़ा हो जाएगा। 
तहसील क्षेत्र के कुल 30 प्रतिशत भाग पर साठा धान की खेती की जाती है। इस बार इसके 40 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। कहने को तो यह साठा अर्थात साठ दिन में तैयार होने वाली फसल है, लेकिन इसके तैयार होने में लगभग 90 दिन का समय लग जाता है। जमीन से ज्यादा लाभ लेने की प्रवृत्ति के चलते वर्ष में धान की दो और गेंहू अथवा आलू की एक फसल तैयार की जाने लगी है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति तो कम हो ही रही है, सिंचाई के लिए पानी के अंधाधुंध दोहन से भूगर्भीय जलस्तर में गिरावट आ रही है। 

साठा धान की फसल ओजोन परत के लिए काफी नुकसानदायक है। ओजोन परत का लगातार क्षरण होने से पर्यावरण और मानव जीवन खतरे में पड़ सकता है। महंगाई के इस युग में वैज्ञानिक दो से ज्यादा फसलें उगाने को बुरा नहीं मानते हैं लेकिन उनका मानना है कि यदि साठा का क्षेत्रफल बढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब स्थित रेगिस्तान जैसी हो जायेगी। बंडा के गांव पिपरिया मझरा के बड़े किसान जसविंदर सिंह साठा के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं। उनका कहना है कि भूमि के लिए क्राप रोटेशन बहुत ही जरूरी है, इससे जैव संरक्षण के साथ ही भूमि कर उर्वरा शक्ति का भी विकास होता है। लगातार फसल उगाने और रासायनिक खादों और कीटनाशकों के प्रयोग से मित्र कीट भी मर जाते हैं और जमीन भी जहरीली होती जा रही है। साठा धान लगाने से खतरनाक कीट ‘ब्रादन हार्पर’ को भोजन मिलता रहता है और यह ज्यादा ताकतवर होकर धान की मुख्य फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है।
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