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--जाति-बिरादरी के चुनावी शोर में गुम हो रहे जलालाबाद के जनमुद्दे--

Tue, 01 Feb 2022 02:18 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 01 Feb 2022 02:18 AM IST
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public issue lost in election noise
जलालाबाद में कोलाघाट टूटा पुल का फाइल फोटो - फोटो : SHAHJAHANPUR
जलालाबाद। जनपद के पिछड़े इलाकों में शुमार जलालाबाद विधानसभा क्षेत्र में कई ऐसी समस्याएं हैं जो आम जनमानस को सीधा प्रभावित करती हैं। परंतु दुर्भाग्य से यह कभी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाईं। हर बार की तरह इस चुनाव में भी ये दिक्कतें कायम तो हैं लेकिन चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहीं। चुनाव के बाद पांच साल के दौरान इनको लेकर मुखर रहने वाले अधिकतर लोग इस समय जाति-बिरादरी के समीकरणों में ही उलझे हुए हैं। प्रमुख राजनीतिक दलों से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी भी इन मुद्दों पर बात करने के बजाय अपने समीकरण बनाने और विरोधी का खेल बिगाड़ने में लगे हैं।
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रेलवे लाइन का अभाव
शाहजहांपुर व फर्रुखाबाद जनपदों के बीच करीब 80 किलोमीटर का क्षेत्र आजादी के बाद अब तक रेलवे लाइन से नहीं जुड़ सका है। इस दूरी के मध्य जलालाबाद विधानसभा है जिसका विस्तृत क्षेत्र जनपद बदायूं से लेकर कायमगंज तहसील तक जुड़ा है। इस समूचे क्षेत्र में बड़ी तादाद में रहने वाले लोगों के लिए अवागमन के सीमित साधन परेशानी का सबब बने हुए हैं। रेलवे की इस मिसिंग लिंक को पूरा कराने को लंबे समय से आंदोलन चलते आ रहे हैं परंतु मजबूत पैरवी के अभाव में लोगों की यह महत्वपूर्ण जरूरत कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनी।
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छुट्टा पशुओं का आतंक
नगर से लेकर देहात तक छुट्टा पशु भारी तादाद में हैं। इन पशुओं से होने वाले नुकसान से क्षेत्र का किसान ही नहीं समाज का हर तबका परेशान है। इस समस्या से निजात पाने को लोगो द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किये गए और कई बार ग्रामीणों ने पशुओं को पकड़ने के बाद उन्हें स्कूलों आदि में बंद करके प्रशासनिक कार्रवाई का भी सामना किया। परंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। रोड हादसों की वजह बनने के अलावा पशु क्षेत्र में कई लोगों की जान भी ले चुके हैं। अब तक समस्या का निस्तारण नहीं हो सका है।
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नहीं बन सका पर्यटन स्थल
जलालाबाद भगवान परशुराम की जन्मस्थली के रूप में दूर-दूर तक विख्यात है। नगर का नाम बदलकर परशुरामपुरी करने और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए दशकों से आंदोलन चलता आ रहा है। आंदोलन से इस क्षेत्र के अलावा कई अन्य जनपदों के लोग भी जुड़े हैं। पिछले कुछ दिनों से इस मांग को लेकर राष्ट्र स्वाभिमान ट्रस्ट के नेतृत्व में चलाए जा रहे आंदोलन में जन्मस्थली नहीं तो वोट नहीं का नारा भी चर्चा में है। परंतु तमाम लोगों की आस्था से जुड़ा यह मामला भी चुनावी मुद्दे का रूप नहीं ले पाया।
बाढ़ से बचाव का कोई ठोस समाधान नहीं
गंगा, रामगंगा और बहगुल नदियों से घिरे इस क्षेत्र में लम्बे समय से आने वाली बाढ़ से दो तिहाई आबादी के अरमान पानी मे बहते आ रहे है। इस आपदा में बड़ी मात्रा में उपजाऊ जमीन के साथ रिहायशी घर भी नदियों के पानी मे समा जाते है और तमाम परिवार खानाबदोशों जैसी जिंदगी जीने को विवश हो जाते है। त्रासदी निपटने के बाद वादे रूपी मरहम से पीड़ितों के जख्मो को भरने की कवायद के अलावा इसकी रोकथाम की कोई ठोस व्यवस्था अभी तक नही हो सकी। दो माह पहले भी बाढ़ से बड़ी तबाही हुई परंतु चुनाव में यह मुद्दा नदारद है।

बेरोजगारी के चलते पलायन
आजादी के बाद से अब तक इस क्षेत्र में कोई कारखाना या चीनी मिल जैसी सौगात क्षेत्र को नसीब नहीं हुई। बसपा शासन में ग्राम दहेना के लिए मंजूर हुई चीनी मिल उचित पैरवी के अभाव में मूर्तरूप नहीं ले सकी। रोजगार का कोई साधन न होने से यहां का बड़ी तादाद में युवा नौकरी की तलाश में दिल्ली, नोएडा, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब आदि प्रांतों में पलायन को मजबूर हैं। यही नहीं रोजगारपरक शिक्षण संस्थानों का अभाव भी क्षेत्र के लोगों के किसी अभिशाप से कम नहीं परंतु आमजन से जुड़ी यह समस्या कभी चुनावी मुद्दा नहीं बनी। संवाद
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