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आवास लाभार्थियों के चयन में ढिलाई पर गिरी बर्खास्तगी की गाज

Fri, 19 Jul 2019 01:34 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 19 Jul 2019 01:34 AM IST
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others in shahjhapur
शहरी क्षेत्र के बेघर गरीब परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत आवास देने को लाभार्थी चयन में बरती गई ढिलाई के कारण कार्यदायी संस्था एसबेंज रेड कंपनी के जिला समन्वयक और अवर अभियंता को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। खास यह है कि कार्यदायी संस्था के यहां तैनात रहे जिला समन्वयक और इसी कंपनी के दो अवर अभियंता करीब दो माह पहले बर्खास्त किए जा चुके हैं। इन कर्मचारियों के स्थान पर आए नए स्टाफ के कामकाज से भी सेवामुक्त किए गए कर्मचारियों की ढिलाई प्रमाणित हो रही है।
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शहरी क्षेत्र में आवासों का निर्माण जिला नगरीय विकास अभिकरण के माध्यम से कराया जा रहा है, लेकिन योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कार्यदायी संस्था पर है। दो साल पहले 22 अक्तूबर 2017 को नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना ने 1443 बेघरों को आवास स्वीकृति पत्र सौंपकर इस योजना की शुरुआत की थी। उस वक्त तक लाभार्थियों का चयन सीधे डूडा की देखरेख में होता था। गत वर्ष भी लाभार्थियों का चयन डूडा के परियोजना अधिकारी अतुल कुमार ने नगर निकायों के अधिशासी अधिकारियों के सहयोग से कराया। ईओ को निर्देश दिए गए कि रात में नगर भ्रमण करें, जिससे कि फुटपाथों पर सोए बेघरों का वास्तविक आकलन किया जा सके। नतीजे में आवास लाभार्थियों की संख्या बढ़कर 3011 हो गई। इनमें नगर निगम क्षेत्र के 980 लाभार्थी शामिल हैं।
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लक्ष्य विहीन योजना के लिए नहीं ढूंढ पाए पात्र बेघर
हाउसिंग टू ऑल अर्थात सभी को आवास देने के सिद्धांत पर लागू इस योजना में लक्ष्य का निर्धारण इसलिए नहीं किया गया ताकि शहरी क्षेत्र के बीपीएल श्रेणी वाले सभी बेघर गरीबों को आवास दिए जा सकें। इसके बावजूद कार्यदायी संस्था के प्रतिनिधियों ने लाभार्थी चयन में कोई खास दिलचस्पी नहीं ली। आवास के जरूरतमंदों ने अपनी शिकायतें शासन-प्रशासन के अधिकारियों तक पहुंचानी शुरू कर दीं। सूडा के निदेशक ने जांच कराई तो अन्य जनपदों की तरह जिले में भी कार्यदायी संस्था के तत्कालीन जिला समन्वयक संदीप पाल और अवर अभियंता आमिर मंसूरी एवं राहुल राज की ढिलाई उजागर हो गई। अंतत: कार्यगत ढिलाई के चलते तीनों कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
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मेरे पति परिवार की आजीविका की आजीविका के लिए गांव-गांव फेरी लगाते हैं। किराए के मकान से छुटकारा पाने के लिए डेढ़ साल पहले आवेदन किया था। कई बार सर्वे के बाद नगरपालिका परिषद से बताया गया कि दिवाली तक आवास की धनराशि खाते में आ जाएगी, लेकिन सात माह बीतने पर मकान बनाने को धनराशि नहीं मिली।
-रेशू भारद्वाज, गांधीनगर (जलालाबाद)
मेरे पति होटल पर नौकरी करते हैं। परिवार के लिए किराये का मकान लेना पड़ा। दो साल पहले आवास पाने की आस मेें फॉर्म जमा किया था। तब से नगरपालिका परिषद दफ्तर के कई चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

-मुन्नी देवी, गांधीनगर (जलालाबाद)
आवास योजना के जिला समन्वयक पद से संदीप पाल और कंपनी के अवर अभियंताओं को लाभार्थी चयन में गड़बड़ी मिलने पर नहीं, बल्कि चयन प्रक्रिया में शिथिलता बरतने पर सेवामुक्त किया गया है। वर्तमान जिला समन्वयक अनुज कुमार के डेढ़ माह के कार्यकाल मेें करीब 3500 शहरी बेघरों का आवास के लिए चयन किया गया है, जबकि इतने लाभार्थी पिछले डेढ़ साल में चयनित नहीं हो सके थे। यह आवास उन्हीं लोगों को स्वीकृत हो रहे हैं, जिनके पास मकान बनाने को जमीन है।
-राजेश मेहता, राज्य समन्वयक, एसबेंज रेड कंपनी (कार्यदायी संस्था)
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