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पराली के लिए वरदान बनकर आया ‘ऑर्गेनो डी-कंपोजर’
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पराली गलाने के लिए तैयार किए गए आर्गेनो डी-कंपोजर पाउडर के बैग।
खेत में पड़े अपशिष्ट को कंपोस्ट खाद में बदल देता है गन्ना शोध परिषद का पाउडर
परिषद ने दो सालों में टाइकोडर्मा फंगस से विकसित किया पाउडर
पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका में बढ़ी मांग
शाहजहांपुर। गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर ने पराली की समस्या से निजात दिलाने में बड़ी सफलता अर्जित की है। एक ऐसा पाउडर ‘ऑर्गेनो डी-कंपोजर’ तैयार किया है, जो खेतों में पड़े अपशिष्ट पदार्थों (पराली) को कंपोस्ट खाद में बदल देता है। करीब 28 लाख किसान इसका प्रयोग कर चुके हैं। देश-विदेश में इसकी मांग बढ़ रही है। यूएसए और सऊदी अरब के वैज्ञानिक इसकी जानकारी हासिल कर रहे हैं।
करीब दो वर्ष पहले परिषद की केंद्रीय प्रयोगशाला में प्रसाधन सामग्री के तौर पर इस्तेमाल होने वाले टेल्कम पाउडर में ट्राइकोडर्मा फंगस (जैविक फफूंद) की रासायनिक क्रिया से डी-कंपोजर पाउडर तैयार किया गया था। पराली वाले खेतों में इसका परीक्षण सफल हुआ तो बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू कर दिया गया।
परिषद के पूर्व निदेशक डॉ. एसबी सिंह के कार्यकाल में पाउडर आधारित ऐसे डी-कंपोजर पर शोध कार्य किया गया, जिसमें कोई अकार्बनिक रसायन न हो। उन्होंने बताया कि इससे पहले सरकारी नियंत्रण की संस्था इफको ने तरल डी-कंपोजर बनाया, लेकिन उसे बाहर भेजने पर परिवहन के दौरान कई दिक्कतें आ रहीं थीं। इसके बाद पाउडर के रूप में तैयार किया गया। डी-कंपोजर पाउडर पांच और दस किलो के बैग में एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना आसान है। संवाद
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दस किलो पाउडर से एक हेक्टेयर गल जाती है पराली
परिषद के प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर स्थापित सभी नौ केंद्रों पर बाजार की मांग के अनुरूप डी-कंपोजर तैयार कर बाहर भेजा जा रहा है। 10 किलोग्राम पाउडर एक हेक्टेयर पराली सड़ाने में सक्षम है। दस क्विंटल फसल अवशेष के लिए एक किलो डी-कंपोजर पाउडर पर्याप्त है। इसकी मांग देश के विभिन्न राज्यों समेत पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, सऊदी अरब, यूएसए, इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यामार और श्रीलंका तक बढ़ी है। प्रसार अधिकारी संजीव पाठक के अनुसार परिषद के पोर्टल (उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर) से जुड़े देश-विदेश के 28 लाख से अधिक किसान इसकी खूबियां जान चुके हैं। उन्होंने बताया कि परिषद से अब तक 2586 क्विंटल डी-कंपोजर की बिक्री हो चुकी है। अभी केवल लागत मूल्य लिया जा रहा है।
शोध में बरकरार रखा गया डी-कंपोजर का जैविक स्वरूप
परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव कुमार पाठक बताते हैं कि शोध के दौरान पाउडर बेस पर बनाए गए डी-कंपोजर का जैविक स्वरूप बनाए रखने का विशेष ध्यान रखा गया। उन्होंने बताया कि टेल्कम पाउडर कॉर्बन का ही एक रूप है, जिसमें जैविक कीटनाशी ट्राइकोडर्मा मिलाकर रासायनिक क्रिया कराई गई। इस प्रक्रिया में कई माह लगने के बाद ऐसा मदर कल्चर (मूल रसायन मिश्रण) तैयार किया गया, जिसकी मदद से टेल्कम पाउडर को जैविक खरपतवारनाशी में बदलना संभव हो सका। उन्होंने बताया कि ऑर्गेनो डी-कंपोजर एक प्रकार का रासायनिक फंगस है। इसलिए यह रसायन पराली को खेत में जल्दी सड़ा और गला देता है।
फोटो: 02 एसपीएनपी 20
परिषद की प्रयोगशाला में पाउडर ‘ऑर्गेनो डी-कंपोजर’ किसानों की सुविधा के लिए विकसित किया गया है। स्वायत्तशासी संस्था होने के कारण इस पर लाभ कमाने के बजाय केवल लागत मूल्य लिया जा रहा है। कई पड़ोसी देशों के किसान भी फसल अवशेष जैविक विधि से नष्ट करने में इस पाउडर का प्रयोग कर रहे हैं।
- वीके शुक्ला, निदेशक, उप्र गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर
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परिषद ने दो सालों में टाइकोडर्मा फंगस से विकसित किया पाउडर
पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, श्रीलंका में बढ़ी मांग
शाहजहांपुर। गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर ने पराली की समस्या से निजात दिलाने में बड़ी सफलता अर्जित की है। एक ऐसा पाउडर ‘ऑर्गेनो डी-कंपोजर’ तैयार किया है, जो खेतों में पड़े अपशिष्ट पदार्थों (पराली) को कंपोस्ट खाद में बदल देता है। करीब 28 लाख किसान इसका प्रयोग कर चुके हैं। देश-विदेश में इसकी मांग बढ़ रही है। यूएसए और सऊदी अरब के वैज्ञानिक इसकी जानकारी हासिल कर रहे हैं।
करीब दो वर्ष पहले परिषद की केंद्रीय प्रयोगशाला में प्रसाधन सामग्री के तौर पर इस्तेमाल होने वाले टेल्कम पाउडर में ट्राइकोडर्मा फंगस (जैविक फफूंद) की रासायनिक क्रिया से डी-कंपोजर पाउडर तैयार किया गया था। पराली वाले खेतों में इसका परीक्षण सफल हुआ तो बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू कर दिया गया।
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परिषद के पूर्व निदेशक डॉ. एसबी सिंह के कार्यकाल में पाउडर आधारित ऐसे डी-कंपोजर पर शोध कार्य किया गया, जिसमें कोई अकार्बनिक रसायन न हो। उन्होंने बताया कि इससे पहले सरकारी नियंत्रण की संस्था इफको ने तरल डी-कंपोजर बनाया, लेकिन उसे बाहर भेजने पर परिवहन के दौरान कई दिक्कतें आ रहीं थीं। इसके बाद पाउडर के रूप में तैयार किया गया। डी-कंपोजर पाउडर पांच और दस किलो के बैग में एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना आसान है। संवाद
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दस किलो पाउडर से एक हेक्टेयर गल जाती है पराली
परिषद के प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर स्थापित सभी नौ केंद्रों पर बाजार की मांग के अनुरूप डी-कंपोजर तैयार कर बाहर भेजा जा रहा है। 10 किलोग्राम पाउडर एक हेक्टेयर पराली सड़ाने में सक्षम है। दस क्विंटल फसल अवशेष के लिए एक किलो डी-कंपोजर पाउडर पर्याप्त है। इसकी मांग देश के विभिन्न राज्यों समेत पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, सऊदी अरब, यूएसए, इंडोनेशिया, थाईलैंड, म्यामार और श्रीलंका तक बढ़ी है। प्रसार अधिकारी संजीव पाठक के अनुसार परिषद के पोर्टल (उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद शाहजहांपुर) से जुड़े देश-विदेश के 28 लाख से अधिक किसान इसकी खूबियां जान चुके हैं। उन्होंने बताया कि परिषद से अब तक 2586 क्विंटल डी-कंपोजर की बिक्री हो चुकी है। अभी केवल लागत मूल्य लिया जा रहा है।
शोध में बरकरार रखा गया डी-कंपोजर का जैविक स्वरूप
परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव कुमार पाठक बताते हैं कि शोध के दौरान पाउडर बेस पर बनाए गए डी-कंपोजर का जैविक स्वरूप बनाए रखने का विशेष ध्यान रखा गया। उन्होंने बताया कि टेल्कम पाउडर कॉर्बन का ही एक रूप है, जिसमें जैविक कीटनाशी ट्राइकोडर्मा मिलाकर रासायनिक क्रिया कराई गई। इस प्रक्रिया में कई माह लगने के बाद ऐसा मदर कल्चर (मूल रसायन मिश्रण) तैयार किया गया, जिसकी मदद से टेल्कम पाउडर को जैविक खरपतवारनाशी में बदलना संभव हो सका। उन्होंने बताया कि ऑर्गेनो डी-कंपोजर एक प्रकार का रासायनिक फंगस है। इसलिए यह रसायन पराली को खेत में जल्दी सड़ा और गला देता है।
फोटो: 02 एसपीएनपी 20
परिषद की प्रयोगशाला में पाउडर ‘ऑर्गेनो डी-कंपोजर’ किसानों की सुविधा के लिए विकसित किया गया है। स्वायत्तशासी संस्था होने के कारण इस पर लाभ कमाने के बजाय केवल लागत मूल्य लिया जा रहा है। कई पड़ोसी देशों के किसान भी फसल अवशेष जैविक विधि से नष्ट करने में इस पाउडर का प्रयोग कर रहे हैं।
- वीके शुक्ला, निदेशक, उप्र गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर