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नमामि गंगे प्रोजेक्ट से भी दूर नहीं हुए गोमती के दुर्दिन
अमर उजाला ब्यूरो पुवायां (शाहजहांपुर)।
Updated Fri, 10 Mar 2017 10:57 PM IST
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ganga
- फोटो : amar ujala
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‘आदिगंगा’ की अविरल धारा पर मंडरा रहा है संकट
गंगा को अविरल, निर्मल बनाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नमामि गंगे परियोजना की मंजूरी दी थी। नवंबर, 2016 में इसमें गंगा की सहायक नदियों को भी शामिल कर लिया गया। इसमें आदिगंगा के नाम से विख्यात गोमती नदी को भी शामिल कर लिया गया, लेकिन अभी तक गोमती के विकास के लिए कोई काम नहीं हो सका है।
नमामि गंगे परियोजना में शामिल होने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि ‘आदिगंगा’ के दुर्दिन दूर हो जाएंगे। नदी अपने प्राचीन स्वरूप में फिर से मानव के साथ ही पशु, पक्षियों के लिए जीवन दायिनी साबित होगी। प्रदूषण, अवैध कब्जे आदि से कराह रही गोमती को भी दिल्ली के मरहम से नया जीवन मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। एसडीएम रामशंकर का कहना है कि योजना की प्रगति के बारे में जानकारी कराई जाएगी।
योजना के तहत ये कार्य होने थे
पुवायां। नमामि गंगे परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (डीपीआर) को नवंबर, 2016 में दिल्ली में केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की पहली बैठक में तय किया गया कि गंगा की सहायक नदियों को डीपीआर में शामिल करने से संबंधित राज्यों के अनुरोध को मान लिया जाए। इसके बाद इसे मंजूरी दे दी गई। परियोजना में उत्तर प्रदेश से केवल गोमती, गंडक और शारदा को ही शामिल किया गया था। इससे गोमती, गंडक और शारदा का भी गंगा नदी की तरह विकास किया जाना था। योजना के तहत नदियों के किनारे से अवैध कब्जे हटाने, नदियों को प्रदूषण मुक्त करने और नदियों की धारा अविरल बहती रहे इस पर भी कार्य होना था।
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पीलीभीत में है गोमती का उद्गम स्थल
पुवायां। गोमती की यात्रा पीलीभीत जनपद के माधोटांडा कस्बे के पास से प्रारंभ होती है। यहां गोमत ताल यानी फुलहर झील गोमती नदी का उद्गम स्थल है। पीलीभीत से गोमती शाहजहांपुर, लखीमपुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर होते हुए 960 किमी का सफर तय करके वाराणसी में गंगा में मिल जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, गौतम ऋषि के श्राप से मुक्ति के लिए देवराज इंद्र ने गोमती के तट पर 1001 स्थानों पर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या की थी।
वर्तमान में गोमती का अस्तित्व ही खतरे में
वर्तमान में पुवायां क्षेत्र में गोमती नदी का अस्तित्व ही खतरे में है। नदी में नाममात्र के लिए जल रह गया है। अंदेशा है कि इस बार गर्मी बढ़ने पर सदानीरा गोमती की धारा थम जाएगी। एक समय था जब गोमती किनारे सैकड़ों एकड़ जमीन पर जंगल था। समय बदला तो गोमती के किनारों से हरियाली भी गायब हो गई। भूमाफिया ने नदी की जमीन पर कब्जा जमा लिया। अब तो गोमती के फाट तक में खेती की जा रही है। इसके अलावा नदी में कूड़ा करकट डालने से प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। नदी तट के खेतों में कीटनाशक का प्रयोग होने और इसका पानी नदी में आने से जलीय जंतु भी मर जाते हैं और नदी में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है।
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गंगा को अविरल, निर्मल बनाने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नमामि गंगे परियोजना की मंजूरी दी थी। नवंबर, 2016 में इसमें गंगा की सहायक नदियों को भी शामिल कर लिया गया। इसमें आदिगंगा के नाम से विख्यात गोमती नदी को भी शामिल कर लिया गया, लेकिन अभी तक गोमती के विकास के लिए कोई काम नहीं हो सका है।
नमामि गंगे परियोजना में शामिल होने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि ‘आदिगंगा’ के दुर्दिन दूर हो जाएंगे। नदी अपने प्राचीन स्वरूप में फिर से मानव के साथ ही पशु, पक्षियों के लिए जीवन दायिनी साबित होगी। प्रदूषण, अवैध कब्जे आदि से कराह रही गोमती को भी दिल्ली के मरहम से नया जीवन मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। एसडीएम रामशंकर का कहना है कि योजना की प्रगति के बारे में जानकारी कराई जाएगी।
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योजना के तहत ये कार्य होने थे
पुवायां। नमामि गंगे परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (डीपीआर) को नवंबर, 2016 में दिल्ली में केंद्रीय वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की पहली बैठक में तय किया गया कि गंगा की सहायक नदियों को डीपीआर में शामिल करने से संबंधित राज्यों के अनुरोध को मान लिया जाए। इसके बाद इसे मंजूरी दे दी गई। परियोजना में उत्तर प्रदेश से केवल गोमती, गंडक और शारदा को ही शामिल किया गया था। इससे गोमती, गंडक और शारदा का भी गंगा नदी की तरह विकास किया जाना था। योजना के तहत नदियों के किनारे से अवैध कब्जे हटाने, नदियों को प्रदूषण मुक्त करने और नदियों की धारा अविरल बहती रहे इस पर भी कार्य होना था।
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पीलीभीत में है गोमती का उद्गम स्थल
पुवायां। गोमती की यात्रा पीलीभीत जनपद के माधोटांडा कस्बे के पास से प्रारंभ होती है। यहां गोमत ताल यानी फुलहर झील गोमती नदी का उद्गम स्थल है। पीलीभीत से गोमती शाहजहांपुर, लखीमपुर, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, जौनपुर होते हुए 960 किमी का सफर तय करके वाराणसी में गंगा में मिल जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, गौतम ऋषि के श्राप से मुक्ति के लिए देवराज इंद्र ने गोमती के तट पर 1001 स्थानों पर शिवलिंग स्थापित कर तपस्या की थी।
वर्तमान में गोमती का अस्तित्व ही खतरे में
वर्तमान में पुवायां क्षेत्र में गोमती नदी का अस्तित्व ही खतरे में है। नदी में नाममात्र के लिए जल रह गया है। अंदेशा है कि इस बार गर्मी बढ़ने पर सदानीरा गोमती की धारा थम जाएगी। एक समय था जब गोमती किनारे सैकड़ों एकड़ जमीन पर जंगल था। समय बदला तो गोमती के किनारों से हरियाली भी गायब हो गई। भूमाफिया ने नदी की जमीन पर कब्जा जमा लिया। अब तो गोमती के फाट तक में खेती की जा रही है। इसके अलावा नदी में कूड़ा करकट डालने से प्रदूषण भी तेजी से बढ़ा है। नदी तट के खेतों में कीटनाशक का प्रयोग होने और इसका पानी नदी में आने से जलीय जंतु भी मर जाते हैं और नदी में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है।