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महाशिवरात्रि विशेष : ऐतिहासिक शिव मंदिरों की महिमा अपरंपार
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जैतीपुर के विकासखंड क्षेत्र के गोगेपुर में प्राचीन शिव मंदिर । संवाद
- फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। महाशिवरात्रि के मौके पर यूं तो हर शिव मंदिर में शिवभक्तों की भीड़ दिखाई देती है, लेकिन जिले के कुछ प्रमुख मंदिरों का इतिहास और महत्ता दूरदराज के क्षेत्रों तक हैं। जहां पर अनगिनत शिवभक्तों पहुंचकर पूजा अर्चना करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर अपनी श्रद्धा के अनुसार दान-पुण्य आदि भी करके जाते हैं। इसके साथ ही कई मंदिरों पर मेला लगता है। महाशिवरात्रि के मौके पर जिले के ऐसे ही कुछ मंदिरों के इतिहास और महत्ता को प्रस्तुत करती यह विशेष रिपोर्ट:
बाबा विश्वनाथ मंदिर
बाबा विश्वनाथ मंदिर शहर के टाउनहॉल क्षेत्र में स्थित है। जोकि शिव भक्तों के लिए छोटी काशी के समान है। इस मंदिर की आधारशिला 50 के दशक में रखी गई थी। उस समय इस स्थान पर घने जंगल थे। स्व. पूर्व सांसद बिशनचंद्र सेठ व स्व. शिव प्रसाद सेठ के प्रयास से बाबा विश्वनाथ मंदिर को विशाल रूप मिला। इस मंदिर के महत्व की बात की जाए तो यह शहर का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां पर चांदी का शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग पर लिपटा हुआ सर्प भी पूरी तरह चांदी का बना हुआ है। मंदिर पर सावन के महीने में भक्तों का मेला लगा रहता है। मंदिर के पुजारी उमेश चंद्र उपाध्याय के मुताबिक जो भी भक्त यहां सच्चे मन से प्रार्थना करता उसकी हर मुराद जरूर पूरी होती है।
बाबा कालसेन शिव मंदिर
जिले के सेहरामऊ दक्षिणी कस्बे में स्थित बाबा कालसेन शिवमंदिर प्राचीन मंदिरों में से एक है। आषाढ़ की पूर्णमासी को मंदिर पर हवन होता है, जिसमें कुंतलों के हिसाब से देसी घी की आहुतियां डाली जाती हैं। इसके साथ ही मंदिर परिसर में मेला भी लगता है। यह मेला एक सप्ताह तक चलता है। मंदिर के पुजारी ऋषिकांत मिश्रा के अनुसार, अंग्रेजी शासनकाल में सेहरामऊ कस्बा के ठाकुर फूल सिंह किन्हीं कारणों से जेल में बंद थे। उनके ऊपर बाबा की सवारी आती थी। 80 साल पहले आषाढ़ मास के पूर्णमासी की रात में बाबा की कृपा से रात में अचानक जेल के दरवाजे खुल गए, ताले टूट गए और ठाकुर फूल सिंह जेल से छूटकर अपने घर आ गए। उस दिन आषाढ़ी पूर्णिमा थी। पूर्णमासी के दिन उन्होंने बाबा के मंदिर में हवन का आयोजन किया। मान्यता यह भी है आषाढ़ी पूर्णमासी को हवन होने के बाद पानी भी बरसता है।
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पटना देवकली मंदिर
शाहजहांपुर-बदायूं बॉर्डर पर स्थित पटना देवकली मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां अनेकों बार शिवभक्त रावण खुद पूजा करने आ चुका है। सतयुग के चौथे चरण में दैत्य गुरु शुक्राचार्य इस स्थान पर आए थे। उन्होंने संजीवनी विद्या हासिल करने के लिए यहां तपस्या की थी। सालों तक तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया था। भगवान शिव ने शुक्राचार्य से कहा था कि जब वह यहां पर आठ शिवलिंग की स्थापना करेंगे तभी उन्हें संजीवनी विद्या प्राप्त होगी। अमूमन किसी भी शिवमंदिर में एक शिवलिंग होता है, लेकिन पटना देवकली मंदिर में शुक्राचार्य ने आठ हजार सालों तक तपस्या कर संजीवनी विद्या हासिल की। इन आठ हजार सालों में उन्होंने सर्व, रूद्र, उग्र, भीमा, पशुपति, इशा नकशा, महादेव और रामू नाम के आठ शिवलिंगों की स्थापना की। बताया जाता है कि प्राचीन समय में मंदिर के पास से होकर गंगा निकलती थीं। समय के साथ-साथ वह भी विलुप्त होती चली गई।
प्राचीन शिव मंदिर, गोगेपुर जैतीपुर
मंदिर का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है। यहां कभी जंगल हुआ करता था, जिससे आसपास के गांवों के लोग लकड़ी लेने और पशु चराने का काम करते थे। एक बार खुदाई करते समय किसी मजदूर का फावड़ा शिवलिंग पर लग गया, जिसमें से दूध निकलने लगा। तभी लोगों ने इसकी सूचना क्षेत्र के खमरिया गांव के जमींदार को दी। तब उन्होंने शिवलिंग को खमरिया लाने के लिए खुदाई करानी शुरू कर दी। जमीन की सतह तक खुदाई कराई, लेकिन शिवलिंग का अंत नहीं मिला। जमीदार ने जंजीरों में बांधकर हाथियों से शिवलिंग को खिंचवाया, लेकिन हाथियों के जोर से शिवलिंग हिला भी नहीं। उन्हें रात में स्वप्न हुआ कि यहां मंदिर का निर्माण कराओ। तब 400 वर्ष पूर्व जमींदार ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। तब से यहां पर शिव भक्तों ने जलाभिषेक व पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यहां पर मेला लगने लगा। जोकि अब लकड़ी व्यापारियों के लिए लाभ का केंद्र बन गया है।
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बाबा विश्वनाथ मंदिर
बाबा विश्वनाथ मंदिर शहर के टाउनहॉल क्षेत्र में स्थित है। जोकि शिव भक्तों के लिए छोटी काशी के समान है। इस मंदिर की आधारशिला 50 के दशक में रखी गई थी। उस समय इस स्थान पर घने जंगल थे। स्व. पूर्व सांसद बिशनचंद्र सेठ व स्व. शिव प्रसाद सेठ के प्रयास से बाबा विश्वनाथ मंदिर को विशाल रूप मिला। इस मंदिर के महत्व की बात की जाए तो यह शहर का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां पर चांदी का शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग पर लिपटा हुआ सर्प भी पूरी तरह चांदी का बना हुआ है। मंदिर पर सावन के महीने में भक्तों का मेला लगा रहता है। मंदिर के पुजारी उमेश चंद्र उपाध्याय के मुताबिक जो भी भक्त यहां सच्चे मन से प्रार्थना करता उसकी हर मुराद जरूर पूरी होती है।
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बाबा कालसेन शिव मंदिर
जिले के सेहरामऊ दक्षिणी कस्बे में स्थित बाबा कालसेन शिवमंदिर प्राचीन मंदिरों में से एक है। आषाढ़ की पूर्णमासी को मंदिर पर हवन होता है, जिसमें कुंतलों के हिसाब से देसी घी की आहुतियां डाली जाती हैं। इसके साथ ही मंदिर परिसर में मेला भी लगता है। यह मेला एक सप्ताह तक चलता है। मंदिर के पुजारी ऋषिकांत मिश्रा के अनुसार, अंग्रेजी शासनकाल में सेहरामऊ कस्बा के ठाकुर फूल सिंह किन्हीं कारणों से जेल में बंद थे। उनके ऊपर बाबा की सवारी आती थी। 80 साल पहले आषाढ़ मास के पूर्णमासी की रात में बाबा की कृपा से रात में अचानक जेल के दरवाजे खुल गए, ताले टूट गए और ठाकुर फूल सिंह जेल से छूटकर अपने घर आ गए। उस दिन आषाढ़ी पूर्णिमा थी। पूर्णमासी के दिन उन्होंने बाबा के मंदिर में हवन का आयोजन किया। मान्यता यह भी है आषाढ़ी पूर्णमासी को हवन होने के बाद पानी भी बरसता है।
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पटना देवकली मंदिर
शाहजहांपुर-बदायूं बॉर्डर पर स्थित पटना देवकली मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां अनेकों बार शिवभक्त रावण खुद पूजा करने आ चुका है। सतयुग के चौथे चरण में दैत्य गुरु शुक्राचार्य इस स्थान पर आए थे। उन्होंने संजीवनी विद्या हासिल करने के लिए यहां तपस्या की थी। सालों तक तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया था। भगवान शिव ने शुक्राचार्य से कहा था कि जब वह यहां पर आठ शिवलिंग की स्थापना करेंगे तभी उन्हें संजीवनी विद्या प्राप्त होगी। अमूमन किसी भी शिवमंदिर में एक शिवलिंग होता है, लेकिन पटना देवकली मंदिर में शुक्राचार्य ने आठ हजार सालों तक तपस्या कर संजीवनी विद्या हासिल की। इन आठ हजार सालों में उन्होंने सर्व, रूद्र, उग्र, भीमा, पशुपति, इशा नकशा, महादेव और रामू नाम के आठ शिवलिंगों की स्थापना की। बताया जाता है कि प्राचीन समय में मंदिर के पास से होकर गंगा निकलती थीं। समय के साथ-साथ वह भी विलुप्त होती चली गई।
प्राचीन शिव मंदिर, गोगेपुर जैतीपुर
मंदिर का इतिहास करीब 400 वर्ष पुराना है। यहां कभी जंगल हुआ करता था, जिससे आसपास के गांवों के लोग लकड़ी लेने और पशु चराने का काम करते थे। एक बार खुदाई करते समय किसी मजदूर का फावड़ा शिवलिंग पर लग गया, जिसमें से दूध निकलने लगा। तभी लोगों ने इसकी सूचना क्षेत्र के खमरिया गांव के जमींदार को दी। तब उन्होंने शिवलिंग को खमरिया लाने के लिए खुदाई करानी शुरू कर दी। जमीन की सतह तक खुदाई कराई, लेकिन शिवलिंग का अंत नहीं मिला। जमीदार ने जंजीरों में बांधकर हाथियों से शिवलिंग को खिंचवाया, लेकिन हाथियों के जोर से शिवलिंग हिला भी नहीं। उन्हें रात में स्वप्न हुआ कि यहां मंदिर का निर्माण कराओ। तब 400 वर्ष पूर्व जमींदार ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। तब से यहां पर शिव भक्तों ने जलाभिषेक व पूजा-पाठ करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यहां पर मेला लगने लगा। जोकि अब लकड़ी व्यापारियों के लिए लाभ का केंद्र बन गया है।

कलान के पटना देवकली स्थित प्राचीन शिव मंदिर । संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR

सेहरामऊ दक्षिणी। कस्बा स्थित बाबा कालसेन शिव मंदिर- फोटो : SHAHJAHANPUR

शाहजहांपुर के टाउनहाल स्थित बाबा विश्वनाथ मंदिर। संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR