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उसने तो सबको दिया लहू का रंग लाल..फिर किस बात का मचा हुआ बवाल
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नूर उल हुदा में गजल सुनातीं कवियत्री
- फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। अरबी फारसी मदारिस एसोसिएशन के तत्वावधान में अल्पसंख्यक अधिकार दिवस के उपलक्ष्य में महफिल-ए-गजल का आयोजन मदरसा नूर उल हुदा में किया गया। इसमें कवियों व शायरों ने गीतों-गजलों से श्रोताओं को आनंदित किया।
कार्यक्रम में कवयित्री वीनस जैन ने गीत के माध्यम से कहा कि उसने तो सबको दिया लहू का रंग लाल। फिर किस बात पर मचा हुआ बवाल। कौन जात-पात भेदभाव का जन्मदाता। किसने हम सबको आपस में है बांटा। गुलिस्तां खान ने गजल पेश करते हुए कहा कि वो अगर हक में नहीं है खिलाफ रहने दो। जो दिल मिले नहीं उनमें शिगाफ रहने दो। राशिद हुसैन राही जुगनू ने सुनाया कि भुला दें आपको दिल से नहीं ऐसी मेरी फितरत। दिलो जां में बसी है जो न मिट पाएगी वह सूरत। मैं कैसे शुक्रिया भेजूं मैं कैसे दूं कोई तोहफा। जमाना है बड़ा जालिम लगा देगा कोई तोहमत।
इशरत सगीर ने कहा कि इंसान से इंसान का रिश्ता टूटा। अकदार के सौ टुकड़े निवाले हो गए। कवि विकास सोनी ऋतुराज ने कहा कि ये किसने कह दिया चाहत नहीं है। गमों से आपके निस्बत नहीं है। आफताब कामिल ने सुनाया कि महकी महकी सी फिजा थी कहकहे थे गूंजते। रक्स करती थीं हवा में कैसी-कैसी तितलियां।
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शायर असगर यासिर ने कहा कि कमजोर अगर मेरी सदा हो तो बताओ। बेदार न लोगों को किया हो तो बताओ। इनके अलावा अफरोज अली खां, डा. असमत मलिक आदि ने भी अपनी रचनाएं सुनाईं। संचालक राशिद हुसैन रहे। संयोजक इकबाल हुसैन फूल मियां ने शायरों व कवियों को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया।
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कार्यक्रम में कवयित्री वीनस जैन ने गीत के माध्यम से कहा कि उसने तो सबको दिया लहू का रंग लाल। फिर किस बात पर मचा हुआ बवाल। कौन जात-पात भेदभाव का जन्मदाता। किसने हम सबको आपस में है बांटा। गुलिस्तां खान ने गजल पेश करते हुए कहा कि वो अगर हक में नहीं है खिलाफ रहने दो। जो दिल मिले नहीं उनमें शिगाफ रहने दो। राशिद हुसैन राही जुगनू ने सुनाया कि भुला दें आपको दिल से नहीं ऐसी मेरी फितरत। दिलो जां में बसी है जो न मिट पाएगी वह सूरत। मैं कैसे शुक्रिया भेजूं मैं कैसे दूं कोई तोहफा। जमाना है बड़ा जालिम लगा देगा कोई तोहमत।
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इशरत सगीर ने कहा कि इंसान से इंसान का रिश्ता टूटा। अकदार के सौ टुकड़े निवाले हो गए। कवि विकास सोनी ऋतुराज ने कहा कि ये किसने कह दिया चाहत नहीं है। गमों से आपके निस्बत नहीं है। आफताब कामिल ने सुनाया कि महकी महकी सी फिजा थी कहकहे थे गूंजते। रक्स करती थीं हवा में कैसी-कैसी तितलियां।
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शायर असगर यासिर ने कहा कि कमजोर अगर मेरी सदा हो तो बताओ। बेदार न लोगों को किया हो तो बताओ। इनके अलावा अफरोज अली खां, डा. असमत मलिक आदि ने भी अपनी रचनाएं सुनाईं। संचालक राशिद हुसैन रहे। संयोजक इकबाल हुसैन फूल मियां ने शायरों व कवियों को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किया।