{"_id":"aa11333bfdf2ce00e3287980b94aea7e","slug":"jayntion-telling-ballot-holidays-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"वोट की राजनीति करा रही जयंतियों पर छुट्टियां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
वोट की राजनीति करा रही जयंतियों पर छुट्टियां
अजय अवस्थी/शाहजहांपुर।
Updated Sat, 25 Apr 2015 12:02 AM IST
विज्ञापन
तीज-त्योहार और महापुरुषों की जयंती मनाने का सीधा संबंध स्कूल-कॉलेजों से हमेशा रहा है। इस पर कभी राजनीति नहीं हुई, लेकिन इधर कुछ वर्षों से महापुरुषों के नाम पर अवकाश घोषित करने की जो राजनीति हो रही है, उससे साफ है कि महापुरुषों के नाम पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करना सरकारों का शगल बन चुका है। ऐसा करके संबंधित जाति-बिरादरी के वोट हासिल की गारंटी माना जाने लगा है।
कहा जाता है कि इश्क और इलेक्शन में सब कुछ जायज है। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर चुनाव से एक-दो साल पहले से ही सियासत चमकाने का मौका कोई छोड़ना नहीं चाहता। हरकोई चुनावी बिसात पर शतरंज की गोटें कुछ इस तरह बिछाना चाहता है, जिसका काट प्रतिद्वंद्वी सहज न कर सकें। महापुरुषों के नाम पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करना इसी सियासत का हिस्सा है।
बांटो और राज करो की तर्ज पर विभिन्न जातियों के वोट हासिल करना एक सहज और सस्ता साधन बन गया है। नौकरी-रोजगार के साधन तो उपलब्ध कराना आसान है नहीं, ऐसे में यही आसान है कि अवकाश रूपी एक तीर से कई शानदार निशाने लगा लिए जाएं। अवकाश घोषित होने से संबंधित जाति इसलिए खुश कि उनकी बिरादरी के महापुरुष को याद रखा गया, शिक्षक खुश, कॉलेजों के विद्यार्थी खुश, कार्यालयों के कर्मचारी खुश और साथ में खुश उनके बीवी-बच्चे।
विज्ञापन
अवकाश तालिका को गौर से देखा जाए तो उसमें तीज-त्योहारों और विभिन्न जातियों के महापुरुषों की जयंती आदि के 50 अवकाश दर्ज हैं। इसके अलावा, रविवार, सेकेंड सेटरडे, एक माह का ग्रीष्मावकाश और लगभग एक माह का ही शीतावकाश, दो-चार लोकल अवकाश यानी छुट्टियां ही छुट्टियां हैं अपने प्रदेश के स्कूलों में। इतना ही नहीं, व्यक्तिगत रूप से भी छुट्टियों की भरमार है, अर्थात मेडिकल, प्रसूति, अर्जित, आकस्मिक आदि के अनलिमिटेड अवकाश।
वोट रूपी छुट्टियां देख अधिकारी-कर्मचारी-गुरुजन और विद्यार्थी भले ही खुश हो रहे हों, लेकिन इस ओछी व्यवस्था से अभिभावक बहुत कुंठित है। इसका कारण यह है कि उनकी अंटी से मोटी रकम फीस के नाम पर ऐंठी जा रही है।
विज्ञापन
कहा जाता है कि इश्क और इलेक्शन में सब कुछ जायज है। शायद इसी बात को ध्यान में रखकर चुनाव से एक-दो साल पहले से ही सियासत चमकाने का मौका कोई छोड़ना नहीं चाहता। हरकोई चुनावी बिसात पर शतरंज की गोटें कुछ इस तरह बिछाना चाहता है, जिसका काट प्रतिद्वंद्वी सहज न कर सकें। महापुरुषों के नाम पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करना इसी सियासत का हिस्सा है।
विज्ञापन
बांटो और राज करो की तर्ज पर विभिन्न जातियों के वोट हासिल करना एक सहज और सस्ता साधन बन गया है। नौकरी-रोजगार के साधन तो उपलब्ध कराना आसान है नहीं, ऐसे में यही आसान है कि अवकाश रूपी एक तीर से कई शानदार निशाने लगा लिए जाएं। अवकाश घोषित होने से संबंधित जाति इसलिए खुश कि उनकी बिरादरी के महापुरुष को याद रखा गया, शिक्षक खुश, कॉलेजों के विद्यार्थी खुश, कार्यालयों के कर्मचारी खुश और साथ में खुश उनके बीवी-बच्चे।
विज्ञापन
अवकाश तालिका को गौर से देखा जाए तो उसमें तीज-त्योहारों और विभिन्न जातियों के महापुरुषों की जयंती आदि के 50 अवकाश दर्ज हैं। इसके अलावा, रविवार, सेकेंड सेटरडे, एक माह का ग्रीष्मावकाश और लगभग एक माह का ही शीतावकाश, दो-चार लोकल अवकाश यानी छुट्टियां ही छुट्टियां हैं अपने प्रदेश के स्कूलों में। इतना ही नहीं, व्यक्तिगत रूप से भी छुट्टियों की भरमार है, अर्थात मेडिकल, प्रसूति, अर्जित, आकस्मिक आदि के अनलिमिटेड अवकाश।
वोट रूपी छुट्टियां देख अधिकारी-कर्मचारी-गुरुजन और विद्यार्थी भले ही खुश हो रहे हों, लेकिन इस ओछी व्यवस्था से अभिभावक बहुत कुंठित है। इसका कारण यह है कि उनकी अंटी से मोटी रकम फीस के नाम पर ऐंठी जा रही है।