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जंगलों से हो रही कीमती जड़ीबूटियों की तस्करी
ब्यूरो/शाहजहांपुर
Updated Sun, 24 Jul 2016 11:44 PM IST
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Vaidya Balendu plant rare herbs in tehri
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तहसील में सड़कों के किनारे और जंगल में खड़े तमाम पेड़ देशी दवाओं और दुर्लभ जड़ीबूटियों की खान हैं, लेकिन तस्कर इन्हें काटकर उत्तराखंड सहित प्रदेश के अन्य हिस्सों में भेजकर कमाई कर रहे हैं। वन विभाग के लोग भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। खुटार रेंज में भी कीमती लकड़ी को काटकर जलाने का काम लिया जा रहा है।
पुवायां तहसील के कई मार्गों के किनारे तमाम औषधीय पेड़ खड़े हैं। यहां द्रोणपुष्पी (गुम्मा), गिलोय, वासा (असौआ), अर्जुन, घुघंची, अकौआ, अशोक, चौधारा और ब्राह्मी बहुतायत में है। इसकेे अलावा गोमती पुल के पास तालाब में घाेंघा और सीप भी मिलती है। इनकी भस्म कई रोगों में महत्वपूर्ण है। वैद्यों के अनुसार द्रोणपुष्पी सर्प काटे के इलाज में, गिलोय बुखार, वासा रक्त शोधक और खांसी में, अर्जुन हृदय रोग, घुंघची सफेद दाग, घोघा और सीप भस्म बुखार, चौधारा खांसी, श्वांस और ब्राह्मी याददाश्त बढ़ाने के लिए खास उपयोगी है। चौधारा इनमें सबसे महत्वपूर्ण और विलुप्त होने की कगार पर है। यदि इन मार्गों पर औषधियों की देखभाल की जाए और उचित संरक्षण दिया जाए तो वन विभाग को इससे बढ़िया लाभ हो सकता है। इस संबंध में खुटार के रेंजर का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।
लापरवाही में नष्ट हुई औषधिय वाटिका
खुटार-पुवायां मार्ग पर भैंसी नदी के पास वन विभाग ने औषधिय पौधों की वाटिका शुरू कराई थी। शुरूआत में इसकी देखभाल के लिए एक चौकीदार और माली रखकर जड़ीबूटियों के कीमती पौधे लगाए गए थे, लेकिन बाद में इस ओर से ध्यान हटा लिया गया, जिस कारण वाटिका नष्ट हो गई है।
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तस्करी भी जोरों पर
क्षेत्र से मकोय, घुघंची, गिलोय, सतावर, मेदा की छाल, अर्जुन आदि की तस्करी भी धड़ल्ले से की जा रही है। तस्कर क्षेत्र से छोटी गाड़ियों में बहुमूल्य वन संपदा को भरकर बाहर की मंडियों में अवैध रूप से ले जाकर बिक्री करते हैं। देशी जड़ीबूटियों की सबसे ज्यादा तस्करी उत्तराखंड के टनकपुर को होती है। इसके अलावा लखनऊ, कानपुर, मेरठ आदि को भी वनौषधि की तस्करी की जाती है।
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पुवायां तहसील के कई मार्गों के किनारे तमाम औषधीय पेड़ खड़े हैं। यहां द्रोणपुष्पी (गुम्मा), गिलोय, वासा (असौआ), अर्जुन, घुघंची, अकौआ, अशोक, चौधारा और ब्राह्मी बहुतायत में है। इसकेे अलावा गोमती पुल के पास तालाब में घाेंघा और सीप भी मिलती है। इनकी भस्म कई रोगों में महत्वपूर्ण है। वैद्यों के अनुसार द्रोणपुष्पी सर्प काटे के इलाज में, गिलोय बुखार, वासा रक्त शोधक और खांसी में, अर्जुन हृदय रोग, घुंघची सफेद दाग, घोघा और सीप भस्म बुखार, चौधारा खांसी, श्वांस और ब्राह्मी याददाश्त बढ़ाने के लिए खास उपयोगी है। चौधारा इनमें सबसे महत्वपूर्ण और विलुप्त होने की कगार पर है। यदि इन मार्गों पर औषधियों की देखभाल की जाए और उचित संरक्षण दिया जाए तो वन विभाग को इससे बढ़िया लाभ हो सकता है। इस संबंध में खुटार के रेंजर का पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।
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लापरवाही में नष्ट हुई औषधिय वाटिका
खुटार-पुवायां मार्ग पर भैंसी नदी के पास वन विभाग ने औषधिय पौधों की वाटिका शुरू कराई थी। शुरूआत में इसकी देखभाल के लिए एक चौकीदार और माली रखकर जड़ीबूटियों के कीमती पौधे लगाए गए थे, लेकिन बाद में इस ओर से ध्यान हटा लिया गया, जिस कारण वाटिका नष्ट हो गई है।
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तस्करी भी जोरों पर
क्षेत्र से मकोय, घुघंची, गिलोय, सतावर, मेदा की छाल, अर्जुन आदि की तस्करी भी धड़ल्ले से की जा रही है। तस्कर क्षेत्र से छोटी गाड़ियों में बहुमूल्य वन संपदा को भरकर बाहर की मंडियों में अवैध रूप से ले जाकर बिक्री करते हैं। देशी जड़ीबूटियों की सबसे ज्यादा तस्करी उत्तराखंड के टनकपुर को होती है। इसके अलावा लखनऊ, कानपुर, मेरठ आदि को भी वनौषधि की तस्करी की जाती है।