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12 दिन में शहर बसाकर अफगानिस्तान चले गए थे बहादुर खान
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शाहजहांपुर। जिले को मुगल बादशाह शाहजहां के नाम पर बसाने वाले नवाब बहादुर खां का मकबरा ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। वह यहां मात्र 12 दिन रहे थे। फिर अफगानिस्तान चले गए। इस शहर से उनका इतना लगाव था कि उनकी इच्छा पर उनके शव को कांधार से लाकर यहां दफनाया गया।
इतिहासकार डॉ. नानक चंद मेहरोत्रा बताते हैं कि मुगल बादशाह जहांगीर की सेना के सिपाही दरिया खान के बेटे बहादुर खान ने मुगल बादशाह शाहजहां के नाम पर शाहजहांपुर शहर बसाया था। वह शाहजहांपुर में केवल 12 दिन रहे। फिर अफगानिस्तान चले गए। उनकी सात बीवियां, दस बेटे, पांच बेटियां थीं। अपनी किताब ‘शाहजहांपुर-ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर’ में नानक चंद मेहरोत्रा लिखते हैं कि शाहजहांपुर शहर के बहादुरगंज मोहल्ले में एक ऊंचे स्थान पर निर्मित नवाब बहादुर खां का भव्य मकबरा आज जीर्णशीर्ण अवस्था में है। शाहजहांनामा के अनुसार शाहजहां को आठ रजब (दस जुलाई 1649) को मालूम हुआ कि कंधार में बहादुर खां पठान की मौत हो गई है। बहादुर खां की मौत औरंगजेब द्वारा उनको हलवा में जहर दिलाने से हुई। बहादुर खां ने अपनी मृत्यु के पूर्व इच्छा प्रकट की थी कि उनको शाहजहांपुर में दफनाया जाए। हालांकि कुछ इतिहासकार जहर की घटना पर संदेह जताते हैं। कहा जाता है कि बहादुर खां की लाश को कंधार से शाहजहांपुर लाकर दफनाया गया। शाहजहांपुर से कंधार 1675 किमी दूर है। उस समय बरसात के दिनों में इतनी दूर से लाश को कैसे और कितने दिनों में लाया गया होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन है। कहीं पर इसकी चर्चा भी नहीं की गई।
नवाब बहादुर खां के वर्तमान मकबरे का निर्माण कार्य सबसे छोटे बेटे अजीज खां ने कराया। नवाब अजीज खां 1712 में नवाब गैरत खां की मृत्यु के बाद शाहजहांपुर के नवाब बने। इस प्रकार वर्तमान मकबरे का निर्माण कार्य नवाब बहादुर खां की मृत्यु के लगभग 62 वर्ष बाद हुआ। इस मकबरे के निकट दूसरा अधूरा मकबरा अजीज खां का है। इसका निर्माण अजीज खां के बेटे तहब्बर खां ने शुरू किया। 1726 में मामू द्वारा उनकी हत्या कर देने पर यह कार्य पूरा नहीं हो सका।
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1857 की क्रांति के बाद गुलाम कादिर अली खां शाहजहांपुर के नाजिम बने। क्रांति की असफलता के बाद ब्रिटिश सरकार ने इन मकबरों समेत कादिर अली की सारी संपत्ति जब्त कर ली। खंडहर (जलालाबाद) निवासी ठाकुर ज्ञान सिंह को ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी के लिए जो संपत्ति दी गई, उसमें यह मकबरा भी शामिल था। इस मकबरे में लगा संगमरमर का तावीज-मजार उखाड़ लिया गया। कहा जाता है कि इस मकबरे का एक हिस्सा और ईंटें तक बेच दी गईं। ज्ञान सिंह की मृत्यु के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि सन 1878 में इन दोनों मकबरों की नीलामी की बोली लगाई गई।
शाहजहांपुर के कुछ रईस पठानों ने चंदा करके इसे खरीद लिया। इसकी व्यवस्था निजामुद्दीन के सुपुर्द कर दी गई। वर्तमान में इस मकबरे की स्थिति बहुत जर्जर है।
संग्रहालय बनाया जा सकता है मकबरा
नवाब बहादुर खान के मकबरे से अतिक्रमण को हटाकर संग्रहालय का रूप दिया जा सकता है। इससे युवा पीढ़ी को अपने इतिहास को समझने में आसानी होगी। यहां पर काफी जमीन है जिस पर आसानी से पुस्तकालय या संग्रहालय बनाया जा सकता है। मुगलिया सल्तनत और आजादी के आंदोलन से जुड़े साक्ष्य संग्रहित किए जा सकते हैं।
केंद्रीय पर्यटन मंत्री को लिखा पत्र, कार्रवाई नहीं हुई
शहर के अलीजई मोहल्ले के रहने वाले मुजम्मिल खां ने 2018 में केंद्रीय पर्यटन मंत्री को पत्र लिखकर नवाब बहादुर खां के मकबरे को संरक्षित करने की मांग की थी। इसका उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है। मुजम्मिल खां ने बताया कि उन्होंने तत्कालीन नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना को पत्र लिखकर और व्यक्तिगत मुलाकात कर आग्रह किया था कि सैकड़ों साल पुराने इस मकबरे को संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग को निर्देशित करें। हालांकि अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। मुजम्मिल ने बताया कि यदि मकबरे को संरक्षित किया जाए तो युवा पीढ़ी को इतिहास की जानकारी बेहतर ढंग से हो सकती है।
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इतिहासकार डॉ. नानक चंद मेहरोत्रा बताते हैं कि मुगल बादशाह जहांगीर की सेना के सिपाही दरिया खान के बेटे बहादुर खान ने मुगल बादशाह शाहजहां के नाम पर शाहजहांपुर शहर बसाया था। वह शाहजहांपुर में केवल 12 दिन रहे। फिर अफगानिस्तान चले गए। उनकी सात बीवियां, दस बेटे, पांच बेटियां थीं। अपनी किताब ‘शाहजहांपुर-ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर’ में नानक चंद मेहरोत्रा लिखते हैं कि शाहजहांपुर शहर के बहादुरगंज मोहल्ले में एक ऊंचे स्थान पर निर्मित नवाब बहादुर खां का भव्य मकबरा आज जीर्णशीर्ण अवस्था में है। शाहजहांनामा के अनुसार शाहजहां को आठ रजब (दस जुलाई 1649) को मालूम हुआ कि कंधार में बहादुर खां पठान की मौत हो गई है। बहादुर खां की मौत औरंगजेब द्वारा उनको हलवा में जहर दिलाने से हुई। बहादुर खां ने अपनी मृत्यु के पूर्व इच्छा प्रकट की थी कि उनको शाहजहांपुर में दफनाया जाए। हालांकि कुछ इतिहासकार जहर की घटना पर संदेह जताते हैं। कहा जाता है कि बहादुर खां की लाश को कंधार से शाहजहांपुर लाकर दफनाया गया। शाहजहांपुर से कंधार 1675 किमी दूर है। उस समय बरसात के दिनों में इतनी दूर से लाश को कैसे और कितने दिनों में लाया गया होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन है। कहीं पर इसकी चर्चा भी नहीं की गई।
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नवाब बहादुर खां के वर्तमान मकबरे का निर्माण कार्य सबसे छोटे बेटे अजीज खां ने कराया। नवाब अजीज खां 1712 में नवाब गैरत खां की मृत्यु के बाद शाहजहांपुर के नवाब बने। इस प्रकार वर्तमान मकबरे का निर्माण कार्य नवाब बहादुर खां की मृत्यु के लगभग 62 वर्ष बाद हुआ। इस मकबरे के निकट दूसरा अधूरा मकबरा अजीज खां का है। इसका निर्माण अजीज खां के बेटे तहब्बर खां ने शुरू किया। 1726 में मामू द्वारा उनकी हत्या कर देने पर यह कार्य पूरा नहीं हो सका।
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1857 की क्रांति के बाद गुलाम कादिर अली खां शाहजहांपुर के नाजिम बने। क्रांति की असफलता के बाद ब्रिटिश सरकार ने इन मकबरों समेत कादिर अली की सारी संपत्ति जब्त कर ली। खंडहर (जलालाबाद) निवासी ठाकुर ज्ञान सिंह को ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादारी के लिए जो संपत्ति दी गई, उसमें यह मकबरा भी शामिल था। इस मकबरे में लगा संगमरमर का तावीज-मजार उखाड़ लिया गया। कहा जाता है कि इस मकबरे का एक हिस्सा और ईंटें तक बेच दी गईं। ज्ञान सिंह की मृत्यु के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि सन 1878 में इन दोनों मकबरों की नीलामी की बोली लगाई गई।
शाहजहांपुर के कुछ रईस पठानों ने चंदा करके इसे खरीद लिया। इसकी व्यवस्था निजामुद्दीन के सुपुर्द कर दी गई। वर्तमान में इस मकबरे की स्थिति बहुत जर्जर है।
संग्रहालय बनाया जा सकता है मकबरा
नवाब बहादुर खान के मकबरे से अतिक्रमण को हटाकर संग्रहालय का रूप दिया जा सकता है। इससे युवा पीढ़ी को अपने इतिहास को समझने में आसानी होगी। यहां पर काफी जमीन है जिस पर आसानी से पुस्तकालय या संग्रहालय बनाया जा सकता है। मुगलिया सल्तनत और आजादी के आंदोलन से जुड़े साक्ष्य संग्रहित किए जा सकते हैं।
केंद्रीय पर्यटन मंत्री को लिखा पत्र, कार्रवाई नहीं हुई
शहर के अलीजई मोहल्ले के रहने वाले मुजम्मिल खां ने 2018 में केंद्रीय पर्यटन मंत्री को पत्र लिखकर नवाब बहादुर खां के मकबरे को संरक्षित करने की मांग की थी। इसका उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है। मुजम्मिल खां ने बताया कि उन्होंने तत्कालीन नगर विकास मंत्री सुरेश कुमार खन्ना को पत्र लिखकर और व्यक्तिगत मुलाकात कर आग्रह किया था कि सैकड़ों साल पुराने इस मकबरे को संरक्षित करने के लिए पुरातत्व विभाग को निर्देशित करें। हालांकि अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है। मुजम्मिल ने बताया कि यदि मकबरे को संरक्षित किया जाए तो युवा पीढ़ी को इतिहास की जानकारी बेहतर ढंग से हो सकती है।