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गन्ना पैदावार में नए कीर्तिमान बनाएगा गोल्डन सर्वे
अमर उजाला ब्यूरो शाहजहांपुर।
Updated Thu, 18 May 2017 11:47 PM IST
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गन्ना की खेती
- फोटो : अमर उजाला
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स्वीकृत अर्ली वैरायटी ने उम्मीदों को लगाए पंख
अधिक मिठास की प्रजातियों ने बढ़ाई चीनी रिकवरी
गन्ना पैदावार को लेेकर किसानों में आई जागरूकता
गेहूं, धान की पारंपरिक खेती से होेने लगा मोहभंग
उत्पादन-रिकवरी के बेहतर परिणामों ने भरा उत्साह
लक्ष्य एक होे और प्रयास सामूहिक स्तर पर किए जाएं तो सकारात्मक नतीजे मिलने में कोई संदेह नहीं रहता। जिले में उत्पादन के नए आयाम गढ़ने की तैयारी कर रही गन्ना की खेती इसका प्रमाण है। गन्ना विभाग और उप्र गन्ना शोध परिषद के सामूहिक प्रयास से जागरूक हुुए किसानों ने बुवाई की उन्नत तकनीक और उसमें फायदे का सौदा साबित हो रहीं शीघ्र पकने वाली अर्ली वैरायटी के अधिकतम इस्तेमाल से नई उम्मीदों को पंख लगा दिए हैं। अब गोल्डन सर्वे के जरिए गन्ना उत्पादन और रिकवरी के नए कीर्तिमान गढ़ने की तैयारी है।
कृषि प्रधान जिले के साढ़े चार लाख किसानों में अधिसंख्यक अभी तक रबी सीजन में गेहूं और अगली फसल के लिए धान उगाने के मोहजाल में फंसे थे। अपवाद के तौर पर आलू, मटर, मूंगफली की खेती में दिलचस्पी दिखाई, लेकिन मिट्टी और जलवायु की अनुकूलता के बावजूद दलहनी समेत नगदी फसलों में शुमार गन्ना की पैदावार लेने में उनका मोह नहीं जागा था।
संभवत: इसके पीछे अतीत के कई हालात भी जिम्मेदार रहे। एक वह दौर भी था, जब उन्हें अपना गन्ना कौड़ियों के मोल कोल्हुओें-क्र्रेशरों पर बेचना पड़ता था। यही नहीं, ढुलाई भर के दाम नहीं मिलनेे पर किसानों को मेहनत से उगाया गया गन्ना खेत में जलाना पड़ा। इसीलिए किसानों ने गेहूं-धान उत्पादन पर ध्यान केंद्रित कर दिया। वक्त बदला तो कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि और ओेलावृष्टि से इन पारंपरिक फसलोें को क्षति होने लगी।
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ऐसे में गन्ना की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि वैज्ञानिकों और गन्ना विभाग के प्रयास किसानों के लिए वरदान साबित हुुए हैं। इन्हीं कोेशिशोें का नतीजा है कि अब किसानों को गन्ना की खेती में लाभ की तमाम संभावनाएं दिखने लगी हैं। किसानों का नजरिया बदला तो गन्ना के साथ लाही, राजमा, आलू, लहसुन, मटर आदि फसलों का रकबा भी बढ़ने लगा है। सब कुछ ठीक रहा तो अगलेे पेराई सीजन तक गन्ना की खेती उत्पादन और चीनी रिकवरी की उपलब्धियों के चरम बिंदु पर पहुंच जाएगी।
स्वीकृत अर्ली वैरायटी से भरने लगी झोली
जागरूकता के अभाव में अधिकांश किसान पहलेे गन्ना की ऐसी प्रजातियां बुवाई में इस्तेमाल करते थे, जिनमें मिठास कम होने से चीनी मिलेें उन्हें खरीदने से गुरेज करती थीं। इसे देखते हुए गन्ना शोेध परिषद के वैज्ञानिकों ने कोयंबटूर और अन्य संस्थानोें के सहयोग से एक दर्जन ऐसी नई प्रजातियां विकसित कीं जो जल्दी पकने के साथ सूबे के सभी क्षेत्रों की जलवायु में बढ़वार के अनुकूल हैं। चूंकि, किसानों को मिठास के बजाय सिर्फ अपने लाभ के लिए गन्ना के वजन से सरोकार होता है। इसे ध्यान में रखकर गन्ना विभाग ने कोशा 08272, को 0238 और को 0118 प्रजातियां बुवाई को संस्तुत कीं, जिनमें वजन के साथ मिठास की भी अधिकता है। गुजरे कुछ सालों में इन स्वीकृत प्रजातियों का रकबा 3-4 फीसदी से बढ़कर 85 फीसदी होे चुका है और गन्ना विभाग उसेे 90 फीसदी तक पहुंचाने का इरादा रखता है।
ट्रेंच विधि से उत्पादन लागत घटी, लाभांश बढ़ा
गन्ना शोेध परिषद से विकसित हुई बुवाई की नाली पद्धति वाली ट्रेंच विधि ने न केवल सिंचाई समेत अन्य जरूरतोें पर व्यय होने वाली उत्पादन लागत कम कर दी है, किसानों का लाभांश बढ़ा दिया है। इस विधि से बुवाई करने वाले किसान सहफसली खेती से मालामाल हो रहे हैं। परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव पाठक के अनुसार इस विधि में सिंचाई के पानी की 60 प्रतिशत बचत के साथ ब्यात मृत्यु दर बेहद कम होेती है, अर्थात जमाव अधिकतम होने के साथ उर्वरकों के सदुपयोग की क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है।
चीनी रिकवरी का ऊपर चढ़ने लगा ग्र्राफ
अधिक मिठास वाली प्रजातियों की बुवाई को प्रोत्साहन मिलने से चीनी रिकवरी का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा है। पांच साल पहले तक प्रति क्विंटल छह से आठ क्विंटल चीनी बन रही थी। इस वर्ष 62885.12 हेक्टेयर मेें पैदा 4.21 करोड़ क्विंटल गन्ना की अधिकांश मात्रा चीनी मिलों ने खरीदी। यही नहीं, निगोही की डालमियां मिल ने प्रति क्विंटल गन्ना के सापेक्ष 11.45 किलो, रोजा मिल ने 10.46 किलोे, मकसूदापुर मिल ने 10.79 किलो, तिलहर मिल ने 9.28 किलोे और पुवायां मिल ने 10.44 किलो चीनी उत्पादन कर दिखाया।
गन्ना समिति सदस्यता के प्रति बढ़ा रुझान
अभी तक किसान भाई गन्ना समितियोें की पाने के लिए सोसाइटी के चक्कर काटने को मजबूर होते थे, लेकिन इस बार जीपीएस से हो रहे गन्ना रकबा के गोल्डन सर्वे में विभागीय टीमें स्वयं उनके पास जाकर सदस्यता ऑफर कर रही हैं। इसीलिए गन्ना विकास विभाग ने नारा दिया है-किसान के द्वार, त्वरित सदस्यता पहली बार। सर्वे से समिति सदस्यों की संख्या 1.10 लाख से बढ़कर 1.15 लाख हो जाने की पूरी उम्मीद है।
- बृजेश पटेल, जिला गन्ना अधिकारी
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अधिक मिठास की प्रजातियों ने बढ़ाई चीनी रिकवरी
गन्ना पैदावार को लेेकर किसानों में आई जागरूकता
गेहूं, धान की पारंपरिक खेती से होेने लगा मोहभंग
उत्पादन-रिकवरी के बेहतर परिणामों ने भरा उत्साह
लक्ष्य एक होे और प्रयास सामूहिक स्तर पर किए जाएं तो सकारात्मक नतीजे मिलने में कोई संदेह नहीं रहता। जिले में उत्पादन के नए आयाम गढ़ने की तैयारी कर रही गन्ना की खेती इसका प्रमाण है। गन्ना विभाग और उप्र गन्ना शोध परिषद के सामूहिक प्रयास से जागरूक हुुए किसानों ने बुवाई की उन्नत तकनीक और उसमें फायदे का सौदा साबित हो रहीं शीघ्र पकने वाली अर्ली वैरायटी के अधिकतम इस्तेमाल से नई उम्मीदों को पंख लगा दिए हैं। अब गोल्डन सर्वे के जरिए गन्ना उत्पादन और रिकवरी के नए कीर्तिमान गढ़ने की तैयारी है।
कृषि प्रधान जिले के साढ़े चार लाख किसानों में अधिसंख्यक अभी तक रबी सीजन में गेहूं और अगली फसल के लिए धान उगाने के मोहजाल में फंसे थे। अपवाद के तौर पर आलू, मटर, मूंगफली की खेती में दिलचस्पी दिखाई, लेकिन मिट्टी और जलवायु की अनुकूलता के बावजूद दलहनी समेत नगदी फसलों में शुमार गन्ना की पैदावार लेने में उनका मोह नहीं जागा था।
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संभवत: इसके पीछे अतीत के कई हालात भी जिम्मेदार रहे। एक वह दौर भी था, जब उन्हें अपना गन्ना कौड़ियों के मोल कोल्हुओें-क्र्रेशरों पर बेचना पड़ता था। यही नहीं, ढुलाई भर के दाम नहीं मिलनेे पर किसानों को मेहनत से उगाया गया गन्ना खेत में जलाना पड़ा। इसीलिए किसानों ने गेहूं-धान उत्पादन पर ध्यान केंद्रित कर दिया। वक्त बदला तो कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि और ओेलावृष्टि से इन पारंपरिक फसलोें को क्षति होने लगी।
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ऐसे में गन्ना की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि वैज्ञानिकों और गन्ना विभाग के प्रयास किसानों के लिए वरदान साबित हुुए हैं। इन्हीं कोेशिशोें का नतीजा है कि अब किसानों को गन्ना की खेती में लाभ की तमाम संभावनाएं दिखने लगी हैं। किसानों का नजरिया बदला तो गन्ना के साथ लाही, राजमा, आलू, लहसुन, मटर आदि फसलों का रकबा भी बढ़ने लगा है। सब कुछ ठीक रहा तो अगलेे पेराई सीजन तक गन्ना की खेती उत्पादन और चीनी रिकवरी की उपलब्धियों के चरम बिंदु पर पहुंच जाएगी।
स्वीकृत अर्ली वैरायटी से भरने लगी झोली
जागरूकता के अभाव में अधिकांश किसान पहलेे गन्ना की ऐसी प्रजातियां बुवाई में इस्तेमाल करते थे, जिनमें मिठास कम होने से चीनी मिलेें उन्हें खरीदने से गुरेज करती थीं। इसे देखते हुए गन्ना शोेध परिषद के वैज्ञानिकों ने कोयंबटूर और अन्य संस्थानोें के सहयोग से एक दर्जन ऐसी नई प्रजातियां विकसित कीं जो जल्दी पकने के साथ सूबे के सभी क्षेत्रों की जलवायु में बढ़वार के अनुकूल हैं। चूंकि, किसानों को मिठास के बजाय सिर्फ अपने लाभ के लिए गन्ना के वजन से सरोकार होता है। इसे ध्यान में रखकर गन्ना विभाग ने कोशा 08272, को 0238 और को 0118 प्रजातियां बुवाई को संस्तुत कीं, जिनमें वजन के साथ मिठास की भी अधिकता है। गुजरे कुछ सालों में इन स्वीकृत प्रजातियों का रकबा 3-4 फीसदी से बढ़कर 85 फीसदी होे चुका है और गन्ना विभाग उसेे 90 फीसदी तक पहुंचाने का इरादा रखता है।
ट्रेंच विधि से उत्पादन लागत घटी, लाभांश बढ़ा
गन्ना शोेध परिषद से विकसित हुई बुवाई की नाली पद्धति वाली ट्रेंच विधि ने न केवल सिंचाई समेत अन्य जरूरतोें पर व्यय होने वाली उत्पादन लागत कम कर दी है, किसानों का लाभांश बढ़ा दिया है। इस विधि से बुवाई करने वाले किसान सहफसली खेती से मालामाल हो रहे हैं। परिषद के प्रसार अधिकारी संजीव पाठक के अनुसार इस विधि में सिंचाई के पानी की 60 प्रतिशत बचत के साथ ब्यात मृत्यु दर बेहद कम होेती है, अर्थात जमाव अधिकतम होने के साथ उर्वरकों के सदुपयोग की क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है।
चीनी रिकवरी का ऊपर चढ़ने लगा ग्र्राफ
अधिक मिठास वाली प्रजातियों की बुवाई को प्रोत्साहन मिलने से चीनी रिकवरी का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा है। पांच साल पहले तक प्रति क्विंटल छह से आठ क्विंटल चीनी बन रही थी। इस वर्ष 62885.12 हेक्टेयर मेें पैदा 4.21 करोड़ क्विंटल गन्ना की अधिकांश मात्रा चीनी मिलों ने खरीदी। यही नहीं, निगोही की डालमियां मिल ने प्रति क्विंटल गन्ना के सापेक्ष 11.45 किलो, रोजा मिल ने 10.46 किलोे, मकसूदापुर मिल ने 10.79 किलो, तिलहर मिल ने 9.28 किलोे और पुवायां मिल ने 10.44 किलो चीनी उत्पादन कर दिखाया।
गन्ना समिति सदस्यता के प्रति बढ़ा रुझान
अभी तक किसान भाई गन्ना समितियोें की पाने के लिए सोसाइटी के चक्कर काटने को मजबूर होते थे, लेकिन इस बार जीपीएस से हो रहे गन्ना रकबा के गोल्डन सर्वे में विभागीय टीमें स्वयं उनके पास जाकर सदस्यता ऑफर कर रही हैं। इसीलिए गन्ना विकास विभाग ने नारा दिया है-किसान के द्वार, त्वरित सदस्यता पहली बार। सर्वे से समिति सदस्यों की संख्या 1.10 लाख से बढ़कर 1.15 लाख हो जाने की पूरी उम्मीद है।
- बृजेश पटेल, जिला गन्ना अधिकारी