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लाइट और साउंड खराब, गांधी भवन का किराया महंगा, नाटक के शो पर लगने लगा ग्रहण
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शाहजहांपुर के टाउनहाल रोड स्थित गांधी भवन । संवाद
- फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। राजपाल यादव, आलोक पांडेय, मोअज्जम बेग, रौनक अली, तसब्बर खान और भी न जाने कितने नाम हैं, जिन्होंने जनपद में रंगकर्म का ककहरा सीखने के बाद मुंबई तक का सफर तय किया। किसी को बड़ा मुकाम मिला तो कई ने छोटे पर्दे पर अपनी चमक बिखेरी। विदेशों तक शाहजहांपुर का रंगकर्म पहुंच गया, पर जनपद का रंगकर्म अब खराब दौर से गुजर रहा।
गांधी भवन रंगकर्मियों को मुहैया कराने के बजाय सरकारी बैठकों का हॉल बना दिया है। लाइट और साउंड सिस्टम खराब होने और गांधी भवन का किराया महंगा होने के कारण संस्थाओं ने शो कराना बंद कर दिया है। चार हजार से बढ़ाकर किराया सात हजार कर दिया। ऐसे में सिर्फ गांधी भवन मैनेज करने में 25 हजार रुपये तक खर्च आ जाता है।
1980 में जनपद में शुरू हुआ था आधुनिक रंगमंच
जनपद में रंगमंच 1914 से होता आया। आधुनिक रंगमंच की शुरुआत 1980 से हुई। बताते हैं कि उस समय साहित्यकार चंद्र मोहन दिनेश, श्याम किशोर सेठ ने अनामिका संस्था का गठन किया था। पहला नाटक ‘इन्ना की आवाज’ कराया। उसे काफी सराहना मिली थी। 1983-84 में आर्य महिला डिग्री कॉलेज में पहली रंगकर्म की कार्यशाला लगाई थी। इसमें डायरेक्टर अमरेंद्र सहाय अमर को आमंत्रित किया था।
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कार्यशाला में ‘कोर्णाक’ नाटक तैयार किया। उसके दो साल के बाद ‘एक था गधा’ तैयार किया गया। वरिष्ठ रंगकर्मी जरीफ मलिक आनंद बताते हैं कि इस नाटक में वर्ग विशेष पर टिप्पणी के चलते प्रशासन ने रोक लगा दी थी। हालांकि, बाद में नाटक का मंचन करा लिया गया था। फिलहाल जनपद के करीब 40 से 50 युवा मायानगरी में काम कर रहे हैं।
बुरे दौर से गुजर रहा रंगकर्म
देश-विदेश तक जनपद का रंगकर्म पहुंचने के बाद भी यहां के रंगकर्मियों की हालत काफी ज्यादा खराब है। नाटक का पूर्वाभ्यास करने तक के लिए जगह नहीं है। बारिश में भीगते हुए कलाकार नाटक करते हैं। विश्व रंगमंच दिवस पर कोई कार्यक्रम न होना भी चिंता का विषय है। मेरी मांग है कि खेल की तरह जिला योजना में नाटक को शामिल किया जाए। उसका सालाना बजट संस्थाओं को जारी कर रंगमंच को बढ़ावा दिया जाए। - जरीफ मलिक आनंद, वरिष्ठ रंगकर्मी
रंगकर्मियों को सरकारी मदद की जरूरत
मराठी और बांग्ला नाटक देखने के लिए लोग ब्लैक में टिकट खरीदते हैं। यहां पर हम फ्री में नाटक दिखाते हैं। फिर भी दर्शक आने को तैयार नहीं होते हैं। जब तक हिंदी नाटक को सरकार की मदद नहीं मिलेगी, तब तक रंगकर्म समृद्ध नहीं हो सकता है। सरकार भी गिने-चुने व्यावसायिक संस्थाओं को मदद देती है। जरूरत है कि छोटे शहरों की संस्थाओं को सरकारी सहयोग मिले। इससे रंगकर्मियों में उत्साह का संचार हो सके। -मनोज मंजुल, अध्यक्ष अनुभूति नाट्य संस्था
नाटक का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं संस्थाएं
जनपद के रंगमंच का जितना पहले नाम था, उतनी ही हालत खराब है। नाटक करने के लिए एक मात्र गांधी भवन है। उसकी भी काफी खराब हालत है। गांधी हॉल का किराया चार से बढ़ाकर सात हजार कर दिया। एसी लगने के कारण किराये में बढ़ोतरी की गई। लाइट और साउंड सिस्टम तक खराब है। इतना बोझ संस्थाएं उठाने की स्थिति में नहीं है। इसलिए शो बंद हो गए हैं। गांधी भवन की हालत में सुधारी जाए। -शमीम आजाद, सचिव अभिव्यक्ति नाट्य मंच
दर्शक बुलाने को जद्दोहद करना पड़ती है
जमीनी स्तर पर जितनी उपलब्धि रंगमंच को मिलना चाहिए थी, उतनी नहीं मिल सकी है। लोग फिल्में देखना पसंद करते हैं, पर उनका रंगमंच से उतना लगाव नहीं है। नाटक देखने के लिए दर्शकों को बुलाने की जद्दोजहद करना पड़ती है। नाटक कराने को आर्थिक सहयोग भी नहीं मिल पाता है। वर्तमान में शहर में आडिटोरियम की जरूरत है, जो सिर्फ रंगकर्मियों को उपलब्ध कराया जाए। साउंड-लाइट सिस्टम ठीक हो। -शिवा सक्सेना, निदेशक मंथन आर्ट
जनपद के रंगकर्म में गहराई नजर आती : राजपाल
-अभिनेता बोले-रंगकर्म से जुड़े कलाकार काफी सृजनशील और मेहनती
शाहजहांपुर। बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव के अभिनय की शुरुआत रंगकर्म से हुई थी। बंडा के कुंडरा गांव से मायानगरी तक का सफर तय करने में राजपाल यादव की मेहनत, संघर्ष और त्याग छिपा है। ‘अंधेर नगरी’ नाटक में बाबा गोवर्धनदास का रोल कर जनपद में चर्चा में आए राजपाल यादव ने 1986 से 1990 तक रंगकर्म का ककहरा सीखा। कोरोनेशन आर्ट थियेटर के बैनर तले वरिष्ठ रंगकर्मी जरीफ मलिक आनंद के निर्देशन में राजपाल यादव ने कई नाटकों में काम कर अभिनय का लोहा मनवाया। विश्व रंगमंच दिवस पर राजपाल यादव ने अपने जनपद के रंगकर्म की सराहना की।
कहा कि जनपद के रंगकर्म में गहराई और गंभीरता दिखती है। अभी कुछ दिन पहले अभिव्यक्ति नाट्य मंच के बैनर तले हुए ‘जानेमन’ नाटक का मंचन देखा था। उसमें कलाकारों ने गजब का अभिनय किया। हमारे शहर के रंगकर्मियों में बहुत बदलाव और प्रगति हुई। भविष्य कला का है। आशा है कि जनपद के रंगकर्मी लगातार उच्च शिखर की ओर कदम बढ़ाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में पांच वेद हैं। पंचम वेद कला का वेद है। जल, वायु, अग्नि प्रकृति की देन है। कला वायु में रहती है। जितने भी थियेटर से जुड़े लोग हैं, वह सृजनशील और मेहनती होते हैं। कला जितनी बिखरेगी, उतनी ही निखरेगी। कला पूरी दुनिया में परचम फैलाए और लोगों का रक्त प्रवाह बढ़ाए, ऐसी कामना करते हैं।
पहला रोल किसान का मिला था
गांव से आए राजपाल यादव 1986 में जनपद के वरिष्ठ रंगकर्मी जरीफ मलिक आनंद के संपर्क में आए थे। राजपाल के गुरु जरीफ मलिक बताते हैं कि उन दिनों ‘अंधेरे के खिलाफ’ नाटक का पूर्वाभ्यास चल रहा था। उसमें राजपाल ने ट्यूबवेल का इंजन स्टार्ट करने वाले किसान का रोल किया था। इस नाटक में बाबा गोवर्धनदास की भूमिका में शानदार रोल करने पर राजपाल चर्चा में आए। यह नाटक करने के लिए टीम के साथ राजपाल शिमला भी गए थे। जरीफ के निर्देशन में ‘दीमक’ नाटक में पति का रोल कर अपनी छाप छोड़ी थी। राजपाल ने ओसीएफ रामलीला में अंगद का किरदार भी निभाया। 1991 के बाद राजपाल लखनऊ और दिल्ली की संस्थाओं में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए चले गए थे।
रंगकर्म सीखने आगरा से आई मन्नी, नौकरी कर चलाया खर्च
आगरा के राजपुर चुंगी निवासी मुकेश चंद्र की बेटी मन्नी शर्मा को रंगकर्म का शौक था। उन्होंने जनपद के रंगकर्म के बारे में बहुत सुना था। 2016 में मन्नी शर्मा जनपद में आ गईं। उनके सामने अभिव्यक्ति नाट्य मंच के सचिव शमीम आजाद ने शर्त रखी कि वह अपने पैसों से रंगकर्म सीखेंगी। उनकी बात को मानकर मन्नी ने डॉन एंड डोना स्कूल में आर्ट एंड क्राफ्ट टीचर की नौकरी ज्वाइन की। उसके बाद शमीम आजाद के निर्देशन में ‘विरासत’, ‘कह रैदास खलास’ और ‘गज फुट इंच’ नाटक में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। इस बीच एनएसडी और बीएनए की तैयारी भी जारी रखी।
थियेटर का ककहरा सीखने को गुरुग्राम से आईं अदिति आर्या
-गुरुग्राम के सेक्टर 14 निवासी अदिति आर्या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के हर बैच में जनपद के एक व्यक्ति का नाम देखती थीं। उनमें जिज्ञासा थी कि कुछ तो है जनपद के थियेटर में, इसलिए वह यहां आ गई। अदिति बताती हैं कि शालू यादव, तसब्बर अली, विवेक, नेहपाल गौतम जैसी कलाकार एनएसडी में देखे। 2013 में रंगकर्म की बेसिक चीजों को सीखने आईं थीं। अभिव्यक्ति नाट्य मंच के बैनर तले ‘स्पार्टकस’ नाटक का मंचन किया था। उसके बाद एनएसडी में चयन हो गया। अदिति ने बताया कि गांधी भवन के मंच पर बहुत कुछ सीखा। बाकी जगह पर सिर्फ कैमरे को फेस करना सिखाते हैं, जबकि जनपद के रंगकर्म में हर चीज में निखार लाने की कोशिश की जाती है।
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गांधी भवन रंगकर्मियों को मुहैया कराने के बजाय सरकारी बैठकों का हॉल बना दिया है। लाइट और साउंड सिस्टम खराब होने और गांधी भवन का किराया महंगा होने के कारण संस्थाओं ने शो कराना बंद कर दिया है। चार हजार से बढ़ाकर किराया सात हजार कर दिया। ऐसे में सिर्फ गांधी भवन मैनेज करने में 25 हजार रुपये तक खर्च आ जाता है।
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1980 में जनपद में शुरू हुआ था आधुनिक रंगमंच
जनपद में रंगमंच 1914 से होता आया। आधुनिक रंगमंच की शुरुआत 1980 से हुई। बताते हैं कि उस समय साहित्यकार चंद्र मोहन दिनेश, श्याम किशोर सेठ ने अनामिका संस्था का गठन किया था। पहला नाटक ‘इन्ना की आवाज’ कराया। उसे काफी सराहना मिली थी। 1983-84 में आर्य महिला डिग्री कॉलेज में पहली रंगकर्म की कार्यशाला लगाई थी। इसमें डायरेक्टर अमरेंद्र सहाय अमर को आमंत्रित किया था।
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कार्यशाला में ‘कोर्णाक’ नाटक तैयार किया। उसके दो साल के बाद ‘एक था गधा’ तैयार किया गया। वरिष्ठ रंगकर्मी जरीफ मलिक आनंद बताते हैं कि इस नाटक में वर्ग विशेष पर टिप्पणी के चलते प्रशासन ने रोक लगा दी थी। हालांकि, बाद में नाटक का मंचन करा लिया गया था। फिलहाल जनपद के करीब 40 से 50 युवा मायानगरी में काम कर रहे हैं।
बुरे दौर से गुजर रहा रंगकर्म
देश-विदेश तक जनपद का रंगकर्म पहुंचने के बाद भी यहां के रंगकर्मियों की हालत काफी ज्यादा खराब है। नाटक का पूर्वाभ्यास करने तक के लिए जगह नहीं है। बारिश में भीगते हुए कलाकार नाटक करते हैं। विश्व रंगमंच दिवस पर कोई कार्यक्रम न होना भी चिंता का विषय है। मेरी मांग है कि खेल की तरह जिला योजना में नाटक को शामिल किया जाए। उसका सालाना बजट संस्थाओं को जारी कर रंगमंच को बढ़ावा दिया जाए। - जरीफ मलिक आनंद, वरिष्ठ रंगकर्मी
रंगकर्मियों को सरकारी मदद की जरूरत
मराठी और बांग्ला नाटक देखने के लिए लोग ब्लैक में टिकट खरीदते हैं। यहां पर हम फ्री में नाटक दिखाते हैं। फिर भी दर्शक आने को तैयार नहीं होते हैं। जब तक हिंदी नाटक को सरकार की मदद नहीं मिलेगी, तब तक रंगकर्म समृद्ध नहीं हो सकता है। सरकार भी गिने-चुने व्यावसायिक संस्थाओं को मदद देती है। जरूरत है कि छोटे शहरों की संस्थाओं को सरकारी सहयोग मिले। इससे रंगकर्मियों में उत्साह का संचार हो सके। -मनोज मंजुल, अध्यक्ष अनुभूति नाट्य संस्था
नाटक का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं संस्थाएं
जनपद के रंगमंच का जितना पहले नाम था, उतनी ही हालत खराब है। नाटक करने के लिए एक मात्र गांधी भवन है। उसकी भी काफी खराब हालत है। गांधी हॉल का किराया चार से बढ़ाकर सात हजार कर दिया। एसी लगने के कारण किराये में बढ़ोतरी की गई। लाइट और साउंड सिस्टम तक खराब है। इतना बोझ संस्थाएं उठाने की स्थिति में नहीं है। इसलिए शो बंद हो गए हैं। गांधी भवन की हालत में सुधारी जाए। -शमीम आजाद, सचिव अभिव्यक्ति नाट्य मंच
दर्शक बुलाने को जद्दोहद करना पड़ती है
जमीनी स्तर पर जितनी उपलब्धि रंगमंच को मिलना चाहिए थी, उतनी नहीं मिल सकी है। लोग फिल्में देखना पसंद करते हैं, पर उनका रंगमंच से उतना लगाव नहीं है। नाटक देखने के लिए दर्शकों को बुलाने की जद्दोजहद करना पड़ती है। नाटक कराने को आर्थिक सहयोग भी नहीं मिल पाता है। वर्तमान में शहर में आडिटोरियम की जरूरत है, जो सिर्फ रंगकर्मियों को उपलब्ध कराया जाए। साउंड-लाइट सिस्टम ठीक हो। -शिवा सक्सेना, निदेशक मंथन आर्ट
जनपद के रंगकर्म में गहराई नजर आती : राजपाल
-अभिनेता बोले-रंगकर्म से जुड़े कलाकार काफी सृजनशील और मेहनती
शाहजहांपुर। बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव के अभिनय की शुरुआत रंगकर्म से हुई थी। बंडा के कुंडरा गांव से मायानगरी तक का सफर तय करने में राजपाल यादव की मेहनत, संघर्ष और त्याग छिपा है। ‘अंधेर नगरी’ नाटक में बाबा गोवर्धनदास का रोल कर जनपद में चर्चा में आए राजपाल यादव ने 1986 से 1990 तक रंगकर्म का ककहरा सीखा। कोरोनेशन आर्ट थियेटर के बैनर तले वरिष्ठ रंगकर्मी जरीफ मलिक आनंद के निर्देशन में राजपाल यादव ने कई नाटकों में काम कर अभिनय का लोहा मनवाया। विश्व रंगमंच दिवस पर राजपाल यादव ने अपने जनपद के रंगकर्म की सराहना की।
कहा कि जनपद के रंगकर्म में गहराई और गंभीरता दिखती है। अभी कुछ दिन पहले अभिव्यक्ति नाट्य मंच के बैनर तले हुए ‘जानेमन’ नाटक का मंचन देखा था। उसमें कलाकारों ने गजब का अभिनय किया। हमारे शहर के रंगकर्मियों में बहुत बदलाव और प्रगति हुई। भविष्य कला का है। आशा है कि जनपद के रंगकर्मी लगातार उच्च शिखर की ओर कदम बढ़ाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में पांच वेद हैं। पंचम वेद कला का वेद है। जल, वायु, अग्नि प्रकृति की देन है। कला वायु में रहती है। जितने भी थियेटर से जुड़े लोग हैं, वह सृजनशील और मेहनती होते हैं। कला जितनी बिखरेगी, उतनी ही निखरेगी। कला पूरी दुनिया में परचम फैलाए और लोगों का रक्त प्रवाह बढ़ाए, ऐसी कामना करते हैं।
पहला रोल किसान का मिला था
गांव से आए राजपाल यादव 1986 में जनपद के वरिष्ठ रंगकर्मी जरीफ मलिक आनंद के संपर्क में आए थे। राजपाल के गुरु जरीफ मलिक बताते हैं कि उन दिनों ‘अंधेरे के खिलाफ’ नाटक का पूर्वाभ्यास चल रहा था। उसमें राजपाल ने ट्यूबवेल का इंजन स्टार्ट करने वाले किसान का रोल किया था। इस नाटक में बाबा गोवर्धनदास की भूमिका में शानदार रोल करने पर राजपाल चर्चा में आए। यह नाटक करने के लिए टीम के साथ राजपाल शिमला भी गए थे। जरीफ के निर्देशन में ‘दीमक’ नाटक में पति का रोल कर अपनी छाप छोड़ी थी। राजपाल ने ओसीएफ रामलीला में अंगद का किरदार भी निभाया। 1991 के बाद राजपाल लखनऊ और दिल्ली की संस्थाओं में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए चले गए थे।
रंगकर्म सीखने आगरा से आई मन्नी, नौकरी कर चलाया खर्च
आगरा के राजपुर चुंगी निवासी मुकेश चंद्र की बेटी मन्नी शर्मा को रंगकर्म का शौक था। उन्होंने जनपद के रंगकर्म के बारे में बहुत सुना था। 2016 में मन्नी शर्मा जनपद में आ गईं। उनके सामने अभिव्यक्ति नाट्य मंच के सचिव शमीम आजाद ने शर्त रखी कि वह अपने पैसों से रंगकर्म सीखेंगी। उनकी बात को मानकर मन्नी ने डॉन एंड डोना स्कूल में आर्ट एंड क्राफ्ट टीचर की नौकरी ज्वाइन की। उसके बाद शमीम आजाद के निर्देशन में ‘विरासत’, ‘कह रैदास खलास’ और ‘गज फुट इंच’ नाटक में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। इस बीच एनएसडी और बीएनए की तैयारी भी जारी रखी।
थियेटर का ककहरा सीखने को गुरुग्राम से आईं अदिति आर्या
-गुरुग्राम के सेक्टर 14 निवासी अदिति आर्या राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के हर बैच में जनपद के एक व्यक्ति का नाम देखती थीं। उनमें जिज्ञासा थी कि कुछ तो है जनपद के थियेटर में, इसलिए वह यहां आ गई। अदिति बताती हैं कि शालू यादव, तसब्बर अली, विवेक, नेहपाल गौतम जैसी कलाकार एनएसडी में देखे। 2013 में रंगकर्म की बेसिक चीजों को सीखने आईं थीं। अभिव्यक्ति नाट्य मंच के बैनर तले ‘स्पार्टकस’ नाटक का मंचन किया था। उसके बाद एनएसडी में चयन हो गया। अदिति ने बताया कि गांधी भवन के मंच पर बहुत कुछ सीखा। बाकी जगह पर सिर्फ कैमरे को फेस करना सिखाते हैं, जबकि जनपद के रंगकर्म में हर चीज में निखार लाने की कोशिश की जाती है।

जरीफ मलिक आनंद- फोटो : SHAHJAHANPUR

राजपाल यादव- फोटो : SHAHJAHANPUR

शिवा सक्सेना- फोटो : SHAHJAHANPUR

शमीम आजाद- फोटो : SHAHJAHANPUR

शाहजहांपुर के गांधी भवन परिसर में बहता गंदा पानी । संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR

शाहजहांपुर के गांधी भवन सभागार में टूटी पड़ी सीलिंग। संवाद- फोटो : SHAHJAHANPUR