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दाता से शिकवा करने को विवश धरती का अन्नदाता
शाहजहांपुर
Updated Wed, 15 Apr 2015 07:40 PM IST
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कुछ सप्ताह पहले लहलहाती गेहूं की फसल को खेतों में खड़ा देखकर जहां किसानों का सीना चौड़ा हो जाता था। बुधवार को उसी खेत में बर्बाद हो रही फसल को देखकर किसान के दुखों का छोर नहीं रहा। जिले का हर खेत किसानों की फसलों के साथ हुई बर्बादी को बयां कर रहा है। हर खेत में बर्बादी की एक अलग दास्तां है। बे-मौसम बारिश का यह रुख देखकर किसान भगवान से शिकवा कर रहे हैं। किसानों की इस बदहाल हालत को देखकर ‘बना के क्यों बिगाड़ा रे... बिगाड़ा रे नसीबा ऊपर वाले’ की यह कड़ी एकदम सटीक बैठती कि ‘तूने भी एक पाप किया है कैसे कहूं तू दाता है...’
आज रिमझिम बारिश के दौरान किसानों के खेतों का हाल जानने के लिए अमर उजाला टीम पुवायां रोड पर गई। टीम ने शहर से करीब सात किलोमीटर निकलने के बाद रास्ते में फूलसिंह इंटर कॉलेज गेट के पास खेतों में कटे पड़े गेहूं के खेत को देखकर बाइक रोकी। खेत की आधी फसल कटी पड़ी थी, जबकि बाकी खेत में तैयार खड़ी थी। बारिश होने की वजह से फसल अब करीब पांच दिन तक गहाई होने की स्थिति में नहीं दिख रही थी।
बाद में टीम नियामतपुर गांव के पास पहुंची। गांव से करीब 500 मीटर दूर पहले तिराहे के पास बारिश से हुई इस बर्बादी की लोग आपस में चर्चा ही कर रहे थे। उनसे पूछा तो बोझिल मन से बोले कि अब बोलने के लिए कुछ नहीं बचा है। सब कुछ लुट गया। उस खेत में गेहूं की फसल गिरने की वजह से फैली पड़ी थी। इस बारिश ने उसके सड़ने की आशंका को और भी बल दिया।
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वहां से आगे बढ़ने पर गांव दाउदपुर मुरादगंज के एक खेत में भरे पानी को देखकर वहां से गुजर रहे एक किसान से पूछा तो बोला कि खेत तराई में होने की वजह से पानी भर गया है। अब तो इसमें कुछ भी नहीं बच सकता। इससे आगे बढ़ने पर कुछ खेतों से गेहूं तो कट गया था, लेकिन भूसा घरों तक पहुंचाने लायक हालत में नहीं था। इससे इस साल इंसानों के साथ ही जानवरों के लिए भी खाने का संकट रहेगा।
कई खेत ऐसे दिखे जहां पर फसल को काटकर खेतों में डाल दिया गया था, लेकिन बारिश होने से उसे थ्रेशर से काटने में करीब पांच दिन लगेंगे। उसमें भी आधी फसल खराब हो जाएगी। वहीं कई खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो रही है। कुल मिलाकर इस साल किसानों की सारी मेहनत बेकार जाती नजर आ रही है।
जानवरों के लिए भूसे का रहेगा संकट
जिले के तमाम खेतों में किसानों ने फसल को काटकर जो भी गेहूं हुआ उसे बचाकर तो घर पहुंचाने में कामयाब हो गया, लेकिन जानवरों के लिए भूसे को वह नहीं पहुंचा सका। इससे इस साल सबसे बड़ी किल्लत भूसे की होगी, जिससे जानवरों का पेट भरने के लिए किसान के सामने संकट खड़ा हो जाएगा।
किसानों की नहीं निकल पा रही लागत
किसानों की माने तों एक बीघा खेत में गेहूं की फसल तैयार करने में कम से कम एक हजार रुपये लागत लगती है। इसे काटकर घर तक ले जाने में करीब डेढ़ हजार रुपये प्रति बीघा का खर्च आ जाता है। इसके अलावा खेत मालिकों को दो क्विंटल प्रति बीघा गेहूं पटका का देना पड़ता है। इस बार खेतों में गेहूं एक क्विंटल प्रति बीघा निकल पा रहा है। इससे पटका की धनराशि ही अदा नहीं हो पा रही है।
‘एक पुरा मैं अब तौ बर्फउ नाय मिलत हई’
भावलखेड़ा ब्लाक के गांव दाउदपुर मुरादगंज में अंदर जाते ही सड़क के किनारे चार बच्चे गेहूं के एक पुरा को छोड़कर उसमें से गेहूं निकालकर बर्फ वाले के पास गए। गेहूं पर्याप्त न होने की वजह से बर्फ वाले ने चार बर्फ देने से मना कर दिया। इससे झल्लाए बच्चे बोले कि ‘एक पुरा मैं अब तौ बर्फउ नाय मिलत हई’। फसल खराब होने की वजह से गेहूं में अब दाने कम और बहुत हल्के हो गए हैं। इससे काफी कम गेहूं निकल रहा है।
गेहूं की खरीद से पल्ला झाड़ रहा सरकारी तंत्र
शाहजहांपुर। फसलें खराब होने का दंश भोग रहे किसानों का बचा-खुचा गेहूं खरीदने में तरह-तरह की बहानेबाजी करके सरकारी तंत्र उन्हें निराशा के गर्त में धकेलने पर आमादा है। क्रय केंद्र प्रभारी कभी नमी ज्यादा बताकर तो कभी बारिश से क्वालिटी खराब होने की आड़ लेकर किसानों का जो गेहूं रिजेक्ट कर रहे, उसे मंडियों में आढ़ती समर्थन मूल्य से 100-150 रुपये कम कीमत पर धड़ल्ले से खरीद रहे हैं। इसीलिए अभी तक मूल्य समर्थन योजना केतहत मुश्किल से 60 मीट्रिक टन गेहूं खरीद हो पाई। विभिन्न एजेंसियों के 155 क्रय केंद्रों में तमाम ऐसे हैं, जहां खरीद की प्रगति शून्य है। गेहूं क्रय प्रभारी बनाए गए एडीएम वित्त एवं राजस्व पीके श्रीवास्तव के अनुसार क्रय केंद्रों पर आ रहा अधिकांश गेहूं शासन से नियत नमी और गुणवत्ता संबंधी अन्य कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा। कटाई कराने केलिए खेत मजदूर भी नहीं मिल रहे। दरअसल, ऐसे खेतिहर मजदूर खुद एक-दो बीघा जमीन के मालिक हैं और मौसम के बिगडै़ल तेवर देख पहले अपनी फसलें बचाने में जुटे हैं। यूपी में फसली बर्बादी के किस्से फ्लैश होने से इस बार पंजाब-हरियाणा से जिले कंबाइन मशीनें भी जिले में ज्यादा नहीं आईं, जिससे मध्यम श्रेणी के किसान कटाई को लेकर परेशान हैं।
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आज रिमझिम बारिश के दौरान किसानों के खेतों का हाल जानने के लिए अमर उजाला टीम पुवायां रोड पर गई। टीम ने शहर से करीब सात किलोमीटर निकलने के बाद रास्ते में फूलसिंह इंटर कॉलेज गेट के पास खेतों में कटे पड़े गेहूं के खेत को देखकर बाइक रोकी। खेत की आधी फसल कटी पड़ी थी, जबकि बाकी खेत में तैयार खड़ी थी। बारिश होने की वजह से फसल अब करीब पांच दिन तक गहाई होने की स्थिति में नहीं दिख रही थी।
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बाद में टीम नियामतपुर गांव के पास पहुंची। गांव से करीब 500 मीटर दूर पहले तिराहे के पास बारिश से हुई इस बर्बादी की लोग आपस में चर्चा ही कर रहे थे। उनसे पूछा तो बोझिल मन से बोले कि अब बोलने के लिए कुछ नहीं बचा है। सब कुछ लुट गया। उस खेत में गेहूं की फसल गिरने की वजह से फैली पड़ी थी। इस बारिश ने उसके सड़ने की आशंका को और भी बल दिया।
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वहां से आगे बढ़ने पर गांव दाउदपुर मुरादगंज के एक खेत में भरे पानी को देखकर वहां से गुजर रहे एक किसान से पूछा तो बोला कि खेत तराई में होने की वजह से पानी भर गया है। अब तो इसमें कुछ भी नहीं बच सकता। इससे आगे बढ़ने पर कुछ खेतों से गेहूं तो कट गया था, लेकिन भूसा घरों तक पहुंचाने लायक हालत में नहीं था। इससे इस साल इंसानों के साथ ही जानवरों के लिए भी खाने का संकट रहेगा।
कई खेत ऐसे दिखे जहां पर फसल को काटकर खेतों में डाल दिया गया था, लेकिन बारिश होने से उसे थ्रेशर से काटने में करीब पांच दिन लगेंगे। उसमें भी आधी फसल खराब हो जाएगी। वहीं कई खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो रही है। कुल मिलाकर इस साल किसानों की सारी मेहनत बेकार जाती नजर आ रही है।
जानवरों के लिए भूसे का रहेगा संकट
जिले के तमाम खेतों में किसानों ने फसल को काटकर जो भी गेहूं हुआ उसे बचाकर तो घर पहुंचाने में कामयाब हो गया, लेकिन जानवरों के लिए भूसे को वह नहीं पहुंचा सका। इससे इस साल सबसे बड़ी किल्लत भूसे की होगी, जिससे जानवरों का पेट भरने के लिए किसान के सामने संकट खड़ा हो जाएगा।
किसानों की नहीं निकल पा रही लागत
किसानों की माने तों एक बीघा खेत में गेहूं की फसल तैयार करने में कम से कम एक हजार रुपये लागत लगती है। इसे काटकर घर तक ले जाने में करीब डेढ़ हजार रुपये प्रति बीघा का खर्च आ जाता है। इसके अलावा खेत मालिकों को दो क्विंटल प्रति बीघा गेहूं पटका का देना पड़ता है। इस बार खेतों में गेहूं एक क्विंटल प्रति बीघा निकल पा रहा है। इससे पटका की धनराशि ही अदा नहीं हो पा रही है।
‘एक पुरा मैं अब तौ बर्फउ नाय मिलत हई’
भावलखेड़ा ब्लाक के गांव दाउदपुर मुरादगंज में अंदर जाते ही सड़क के किनारे चार बच्चे गेहूं के एक पुरा को छोड़कर उसमें से गेहूं निकालकर बर्फ वाले के पास गए। गेहूं पर्याप्त न होने की वजह से बर्फ वाले ने चार बर्फ देने से मना कर दिया। इससे झल्लाए बच्चे बोले कि ‘एक पुरा मैं अब तौ बर्फउ नाय मिलत हई’। फसल खराब होने की वजह से गेहूं में अब दाने कम और बहुत हल्के हो गए हैं। इससे काफी कम गेहूं निकल रहा है।
गेहूं की खरीद से पल्ला झाड़ रहा सरकारी तंत्र
शाहजहांपुर। फसलें खराब होने का दंश भोग रहे किसानों का बचा-खुचा गेहूं खरीदने में तरह-तरह की बहानेबाजी करके सरकारी तंत्र उन्हें निराशा के गर्त में धकेलने पर आमादा है। क्रय केंद्र प्रभारी कभी नमी ज्यादा बताकर तो कभी बारिश से क्वालिटी खराब होने की आड़ लेकर किसानों का जो गेहूं रिजेक्ट कर रहे, उसे मंडियों में आढ़ती समर्थन मूल्य से 100-150 रुपये कम कीमत पर धड़ल्ले से खरीद रहे हैं। इसीलिए अभी तक मूल्य समर्थन योजना केतहत मुश्किल से 60 मीट्रिक टन गेहूं खरीद हो पाई। विभिन्न एजेंसियों के 155 क्रय केंद्रों में तमाम ऐसे हैं, जहां खरीद की प्रगति शून्य है। गेहूं क्रय प्रभारी बनाए गए एडीएम वित्त एवं राजस्व पीके श्रीवास्तव के अनुसार क्रय केंद्रों पर आ रहा अधिकांश गेहूं शासन से नियत नमी और गुणवत्ता संबंधी अन्य कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा। कटाई कराने केलिए खेत मजदूर भी नहीं मिल रहे। दरअसल, ऐसे खेतिहर मजदूर खुद एक-दो बीघा जमीन के मालिक हैं और मौसम के बिगडै़ल तेवर देख पहले अपनी फसलें बचाने में जुटे हैं। यूपी में फसली बर्बादी के किस्से फ्लैश होने से इस बार पंजाब-हरियाणा से जिले कंबाइन मशीनें भी जिले में ज्यादा नहीं आईं, जिससे मध्यम श्रेणी के किसान कटाई को लेकर परेशान हैं।