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Shahjahanpur News: अतिक्रमण के चलते अस्तित्व बचाने के कठिन दौर से गुजर रही कठिना नदी

Thu, 16 Mar 2023 12:25 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहाँपुर Updated Thu, 16 Mar 2023 12:25 AM IST
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Due to the encroachment, the Kathina river is going through a difficult phase to save its existence.
खुटार में सूखी पड़ी भैंसी नदी। संवाद
खुटार (शाहजहांपुर)। आदि गंगा गोमती की प्रमुख सहायक नदी कठिना इस समय बेहद कठिन दौर से गुजर रही है। गोमती को सदानीरा बनाए रखने में भैंसी, झुकना, गोन, सई, रेठ, पिली, कल्याणी आदि नदियों का जितना महत्त्व है, उतना ही कठिना का भी है। शासन, प्रशासन और आमजन की अनदेखी से कठिना नदी का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है।
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जनश्रुतियों के अनुसार काठ के जंगलों से प्रवाहित होने के कारण नदी को कठिना नाम से जाना जाता है। यह नदी भी गोमती के ही समान सदानीरा रही है। कठिना पहले शाहजहांपुर और अब पीलीभीत जिले में स्थित मोतीझील से उद्गमित हुई है। गांव महादेव मातिन के पास स्थित मोतीझील को स्थानीय लोकभाषा में भोगनई झील भी कहा जाता है। तकरीबन 150 किमी और शाहजहांपुर में करीब 50 किमी तक प्रवाहित होने वाली कठिना शाहजहांपुर में नवदिया दरोदग्रह, ढाका, बेला, कोल्हूगाढ़ा, तुलापुर तक दिखती है। इसके बाद नदी नाले में तब्दील हो जाती है। नदी का धारा रुकने का प्रमुख कारण है नदी की भूमि को समतल कर खेती करना है।
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खुटार रेंज के जंगल से होती हुई नदी लखीमपुर खीरी के मैलानी जंगल से होते हुए तहसील गोला से मोहम्मदी और मितौली होते हुए सीतापुर जिले के अंतर्गत आने वाले बख्तौली गांव में गोमती नदी में विलीन हो जाती है। कृषि के लिए किए गए अतिक्रमण के साथ साथ रेत के खनन ने भी इस नदी को जलविहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
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वन्य पशुओं के लिए जीवनदायिनी है कठिना
बाघों सहित तमाम वन्य पशुओं की सैरगाह रही कठिना नदी न केवल वन्य जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती है बल्कि यह किसानों की भी लाइफलाइन है। अपने उद्गम क्षेत्र के बाद जब कठिना खुटार और मैलानी रेंज के जंगलों के होकर गुजरती है, तो इसका कछार बाघों की पसंदीदा जगह बन जाता है। तकरीबन 4200 हेक्टेयर के दायरे में विस्तृत खुटार, मोहम्मदी जंगल का फैलाव गांवों तक है, जहां जंगल की भूमि और कृषि क्षेत्र में अधिक अंतर नहीं है। शाहजहांपुर में एक ओर कठिना जहां कोरों, सागौन तो लखीमपुर में आंवला और बेंत के जंगलों को सिंचित करती है। सिंचाई के उद्देश्य से भी यह नदी बेहद अहम है।
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बड़े किसानों ने किया कब्जा
शाहजहांपुर और लखीमपुर जनपद की सीमा का निर्धारण करने वाली कठिना आज जगह जगह पर विलुप्त होने के कगार पर है, यहां कृषि के साथ साथ वन्य जीवन के लिए भी पेयजल संकट उत्पन्न हो गया है। नदी के सूखने का दायरा वर्ष दर वर्ष बढ़ता जा रहा है। नदी सूखने से खेतों में विचरण करने वाले वन्य जीव, छुट्टा पशु, पक्षी पानी की तलाश में किसानों के ट्यूबवेलों पर भटक रहे हैं। इससे किसान परेशान हैं।
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जंगल की लाइफ लाइन सूखी तो घातक परिणाम
क्षेत्र में स्थित बेंत के जंगल भी इसके जलस्तर को गिराने का कार्य कर रहे हैं, जिसके लिए प्रशासन को सजग होना पड़ेगा। साथ ही नदी विभिन्न स्थानों पर बेहद प्रदूषित भी है, जिससे इसके प्रदूषण का प्रभाव गोमती पर भी पड़ रहा है। सरकार एक ओर नमामि गंगे की बात करती है वहीं दूसरी ओर यदि गंगा की सहायक नदियों पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
तेजराम, खुटार ----------
हर समय रहता था पानी
पहले यह नदी बारहों मास बहती थी। इसलिए इसे सदानीरा कहा जाता है। किंतु अब कई स्थानों पर नदी सूखने लगी है। यही हाल रहा तो नदी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

रमेशचंद्र, खुटार
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गोमती की सहायक कठिना नदी पर अवैध कब्जों की जानकारी कराई जाएगी और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई कराई जाएगी। नदी भूमि से लोगों को खुद ही कब्जा छोड़ देना चाहिए।
हिमांशु उपाध्याय, एसडीएम पुवायां

खुटार में सूखी पड़ी भैंसी नदी। संवाद

खुटार में सूखी पड़ी भैंसी नदी। संवाद

खुटार में सूखी पड़ी भैंसी नदी। संवाद

खुटार में सूखी पड़ी भैंसी नदी। संवाद

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