Shahjahanpur: लोगों ने चंदा कर भरी जुर्माने की राशि, वकीलों ने नहीं ली फीस, जेल से रिहा हुए 400 बंदी
शाहजहांपुर जिला जेल से एक साल में करीब 400 बंदी रिहा किए गए हैं। ये बंदी पैरवी के अभाव में जेल में बंद थे। शहर के सामाजिक संगठन, समाजसेवी व व्यापारियों के सहयोग से चंदा जुटाकर जुर्माने की राशि भरी गई। वकीलों ने पैरवी की फीस नहीं ली। इन लोगों की मदद से ये बंदी अब खुली हवा में सांस ले रहे हैं।
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शाहजहांपुर में छोटे आपराधिक मामलों में जिला कारागार की सलाखों के पीछे बेबसी की जिंदगी व्यतीत कर रहे 400 बंदियों को खुले में सांस लेकर सामान्य जिंदगी जीने का मौका मिल सका है। यह काम उन बड़े दिल वालों की वजह से संभव हो सका, जिन्होंने बंदियों के प्रति करुणा और दया का भाव रखते हुए हरसंभव मदद की। चंदा कर जुर्माने की राशि भरी और वकीलों ने पैरवी के लिए फीस तक छोड़ दी।
जिला कारागार में गत वर्ष करीब 1700 बंदी थे। इनमें 100 से अधिक महिलाएं थीं। कपटपूर्वक कृत्य, चोरी, मारपीट समेत कई छोटे मामलों में पैरवी के अभाव में बंदी जिला कारागार में बंद थे। जेल अधीक्षक मिजाजी लाल ने छोटे अपराधों में निरुद्ध बंदियों को सूचीबद्ध कराया। इसके बाद उनकी रिहाई के प्रयास शुरू किए। अपने शहर के सामाजिक संगठन, समाजसेवी, व्यापारियों से संपर्क साधने के साथ लखनऊ और दूसरे जिले के संपन्न लोगों से बात की।
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जेल अधीक्षक मिजाजी लाल बताते हैं कि जेल में बंद 50 बंदी जुर्माना नहीं चुका पाने के चलते रिहा नहीं हो पा रहे थे। उनके लिए पूर्व कुलपति जिल्लुर्रहमान खान के पुत्र नदीम रहमान, पैगामे इंसानियत के पदाधिकारियों, लखनऊ के समाजसेवी, जेल कर्मियों से चंदा एकत्र किया गया। इस बीच जुटाई धनराशि से जुर्माना भरकर बंदियों को रिहा कराया गया।
लोक अदालत से छूटे सबसे ज्यादा बंदी
जिला कारागार में एक महीने में चार बार लोक अदालत लगवाई गई जहां पर छोटे अपराधों में निरुद्ध बंदियों के केसों की सुनवाई हुई। लोक अदालत के जरिये कई बंदियाें को रिहा कराया गया। वहीं बड़े अपराधों में लंबे समय से जेल में निरुद्ध 12 बंदियों को शासन ने रिहा कर दिया। इसमें अधिकतर आजीवन कारावास के बंदी थे। इनके लिए डीएम-एसपी से पैरवी कर अनुमति कराकर शासन को पत्र भिजवाया गया था।
ज्यादातर बंदियों को जमानतदार नहीं मिलने के चलते वे जेल से बाहर नहीं आ पा रहे थे। ऐसे बंदियों के लिए जमानतदार का इंतजाम कराया गया। उनके व्यक्तिगत बांड के आधार पर रिहाई कराई गई। कुछ बंदी वकील की फीस देने की स्थिति में नहीं थे। जेल अधीक्षक ने वकीलों से संपर्क कर सेवाभाव करने की गुजारिश की। वकीलों ने अपनी फीस नहीं ली और पैरवी कर बंदियों को जेल से बाहर निकाला।