{"_id":"2dd3f8c60c5707514323ecb1b1c8bafd","slug":"creating-the-morsels-of-helpless-tongue-ctkare-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जुबान के चटकारे को निवाला बनाए जा रहे बेजुबान ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जुबान के चटकारे को निवाला बनाए जा रहे बेजुबान
पुवायां।
Updated Tue, 08 Dec 2015 11:48 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
खुटार के गांव मुरादपुर में हैचरी के पास का झाबर विदेशी पक्षियों की कत्लगाह बन गया है। आसपास के गांवों के कुछ लोगों ने इन बेजुबान और दूर से आने वाले मेहमानों को अपनी कमाई का जरिया बना लिया है। कुछ लोग लालच में इन बेजुबान विदेशी और रंग बिरंगे, खूबसूरत पक्षियों की जान ले लेते हैं। ये लोग सुबह होते ही इन पक्षियों की फांसी का इंतजाम कर जाते हैं और दोपहर बाद मृत पक्षियों को उठाकर ले जाने के बाद गांवों में बेच देते हैं।
मैलानी और पूरनपुर रोड के बीच एक विशाल झाबर है। कई सौ एकड़ में फैले इस झाबर की सीमाएं मैलानी रोड पर गांव सलनहा से शुरू होकर नरौठा होते हुए मुरादपुर और पूरनपुर रोड के गांव कुंइयां, लालपुर, गुरघिया को छूती है। कई गांवों के बीच में बना यह झाबर पशु, पक्षियों के लिए चारागाह और रहने के ठिकाना बना हुआ है। जिन देशों में भयंकर ठंड पड़ने लगती है, वहां के पक्षी यहां जलवायु अनुकूल होने के कारण चले आते हैं। यहां तमाम तरह के पक्षी देखने वालों का मन बरवस ही मोह लेते हैं। विदेशी मेहमान अक्सर झाबर के बीच बने छोटे टापुओं पर आराम फरमाते देखे जा सकते हैं।
स्थानीय लोग विदेशी मेहमान पक्षियों को मुर्गाबी, नकटा, टिकारी, बुड़ार, पडऱा, सिलही आदि बोलते है। आसपास के गांवों के कुछ लोग सुबह होते ही झाबर पहुंच जाते हैं। यह ऐसा समय होता है जब पक्षी भी रात भर के भूखे होने से झाबर में घूमकर अपनी भूख मिटाते हैं। शिकारी लोग घास और झाबर में खड़ी नरई के रंग से मिलती महीन प्लास्टिक की डोरी के फंदे बनाकर पानी के बीच लगा दिए जाते हैं। जैसे ही पक्षी अंजाने में अपनी गरदन फंदे में डालता है और आगे बढ़ता है, फंदा कस जाता है। फंदा कसते ही पक्षी की जान निकल जाती है। इन पक्षियों के फांसी लगकर मारने पर दोपहर के करीब शिकारी इन्हें पानी से उठा ले जाते हैं। फिर इन्हें गांवों में ले जाकर बेचा जाता है। एक पक्षी 90 से 100 रुपए में बिक जाता है। यह धंधा यहां सर्दी के हर सीजन में किया जाता है। वन अधिकारियों से इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि विदेशी पक्षियों का शिकार किए जाने की जानकारी नहीं है। ऐसा है तो जांचकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
विज्ञापन
विज्ञापन
मैलानी और पूरनपुर रोड के बीच एक विशाल झाबर है। कई सौ एकड़ में फैले इस झाबर की सीमाएं मैलानी रोड पर गांव सलनहा से शुरू होकर नरौठा होते हुए मुरादपुर और पूरनपुर रोड के गांव कुंइयां, लालपुर, गुरघिया को छूती है। कई गांवों के बीच में बना यह झाबर पशु, पक्षियों के लिए चारागाह और रहने के ठिकाना बना हुआ है। जिन देशों में भयंकर ठंड पड़ने लगती है, वहां के पक्षी यहां जलवायु अनुकूल होने के कारण चले आते हैं। यहां तमाम तरह के पक्षी देखने वालों का मन बरवस ही मोह लेते हैं। विदेशी मेहमान अक्सर झाबर के बीच बने छोटे टापुओं पर आराम फरमाते देखे जा सकते हैं।
विज्ञापन
स्थानीय लोग विदेशी मेहमान पक्षियों को मुर्गाबी, नकटा, टिकारी, बुड़ार, पडऱा, सिलही आदि बोलते है। आसपास के गांवों के कुछ लोग सुबह होते ही झाबर पहुंच जाते हैं। यह ऐसा समय होता है जब पक्षी भी रात भर के भूखे होने से झाबर में घूमकर अपनी भूख मिटाते हैं। शिकारी लोग घास और झाबर में खड़ी नरई के रंग से मिलती महीन प्लास्टिक की डोरी के फंदे बनाकर पानी के बीच लगा दिए जाते हैं। जैसे ही पक्षी अंजाने में अपनी गरदन फंदे में डालता है और आगे बढ़ता है, फंदा कस जाता है। फंदा कसते ही पक्षी की जान निकल जाती है। इन पक्षियों के फांसी लगकर मारने पर दोपहर के करीब शिकारी इन्हें पानी से उठा ले जाते हैं। फिर इन्हें गांवों में ले जाकर बेचा जाता है। एक पक्षी 90 से 100 रुपए में बिक जाता है। यह धंधा यहां सर्दी के हर सीजन में किया जाता है। वन अधिकारियों से इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि विदेशी पक्षियों का शिकार किए जाने की जानकारी नहीं है। ऐसा है तो जांचकर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
विज्ञापन