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Shahjahanpur News: प्रधानी से लेकर विधानसभा तक का चुनाव लड़ा, पर नहीं मिली सफलता
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मौलाना तौकीर के परिवार के सदस्यों को भी सियासत में नहीं मिली कामयाबी
बरेली। हजरत रेहान रजा खां की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनका बेटा मौलाना तौकीर रजा खां सियासी मैदान में कूदा, मगर कोई मुकाम नहीं पा सका। ग्राम प्रधान से लेकर विधानसभा तक के चुनाव में मौलाना ने किस्मत आजमाई, मगर कभी सफलता नहीं मिली। मौलाना के परिवार के अन्य सदस्यों ने भी जोर-आजमाइश की, मगर वह भी सफल नहीं हुए।
रेहान-ए-मिल्लत हजरत रेहान रजा खां दरगाह आला हजरत के सज्जादानशीन रहे हैं। इससे पहले उन्होंने राजनीति में हाथ आजमाते हुए बरेली लोकसभा सीट से 1980 में चुनाव लड़ा था, मगर जीत नहीं सके थे। बाद में कांग्रेस से निकटता के चलते पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें एमएलसी बनवाया था। उनका इतना ही राजनीतिक सफर रहा। उसके बाद उन्होंने दरगाह की गद्दी संभाल ली और धर्मगुरु की हैसियत से अपनी पहचान बनाई।
मौलाना तौकीर रजा का पुश्तैनी गांव बदायूं का करतौली है। वहीं से सबसे पहले 1987 में ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा, जो वह जीत नहीं सका। इसके पांच साल बाद 1992 में बदायूं की बिनावर विधानसभा से चुनाव लड़ा, मगर वह भी हार गया। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय उनकी पार्टी जनता दल से बरेली की कैंट विधानसभा सीट से मौलाना ने किस्मत आजमाई और यहां भी मात मिली।
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इसके बाद 2001 में मौलाना ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) बनाई। 2009 के लोकसभा चुनाव में मौलाना ने कांग्रेस पार्टी का समर्थन किया। 2012 के विधानसभा चुनाव में मौलाना ने समाजवादी पार्टी को अपना समर्थन देने के लिए कहा था। मई 2013 में मौलाना को हैंडलूम कॉर्पोरेशन का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में मौलाना ने बहुजन समाज पार्टी का समर्थन किया। 2022 के चुनाव में मौलाना ने फिर कांग्रेस का समर्थन किया।
इस बीच मौलाना तौकीर के चाचा मौलाना मन्नान रजा खां ने भी 1989 में लोकसभा का चुनाव लड़ा। मौलाना के भाई मौलाना तौसीफ रजा खां भी 1983 में पीलीभीत से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। मौलाना तौसीफ ने सियासत में लंबा समय गुजारा। पहले लंबे समय कांग्रस में रहे, फिर समाजवादी पार्टी में आ गए। वह पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के काफी निकट रहे। संवाद
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बरेली। हजरत रेहान रजा खां की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनका बेटा मौलाना तौकीर रजा खां सियासी मैदान में कूदा, मगर कोई मुकाम नहीं पा सका। ग्राम प्रधान से लेकर विधानसभा तक के चुनाव में मौलाना ने किस्मत आजमाई, मगर कभी सफलता नहीं मिली। मौलाना के परिवार के अन्य सदस्यों ने भी जोर-आजमाइश की, मगर वह भी सफल नहीं हुए।
रेहान-ए-मिल्लत हजरत रेहान रजा खां दरगाह आला हजरत के सज्जादानशीन रहे हैं। इससे पहले उन्होंने राजनीति में हाथ आजमाते हुए बरेली लोकसभा सीट से 1980 में चुनाव लड़ा था, मगर जीत नहीं सके थे। बाद में कांग्रेस से निकटता के चलते पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें एमएलसी बनवाया था। उनका इतना ही राजनीतिक सफर रहा। उसके बाद उन्होंने दरगाह की गद्दी संभाल ली और धर्मगुरु की हैसियत से अपनी पहचान बनाई।
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मौलाना तौकीर रजा का पुश्तैनी गांव बदायूं का करतौली है। वहीं से सबसे पहले 1987 में ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा, जो वह जीत नहीं सका। इसके पांच साल बाद 1992 में बदायूं की बिनावर विधानसभा से चुनाव लड़ा, मगर वह भी हार गया। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के समय उनकी पार्टी जनता दल से बरेली की कैंट विधानसभा सीट से मौलाना ने किस्मत आजमाई और यहां भी मात मिली।
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इसके बाद 2001 में मौलाना ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल (आईएमसी) बनाई। 2009 के लोकसभा चुनाव में मौलाना ने कांग्रेस पार्टी का समर्थन किया। 2012 के विधानसभा चुनाव में मौलाना ने समाजवादी पार्टी को अपना समर्थन देने के लिए कहा था। मई 2013 में मौलाना को हैंडलूम कॉर्पोरेशन का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में मौलाना ने बहुजन समाज पार्टी का समर्थन किया। 2022 के चुनाव में मौलाना ने फिर कांग्रेस का समर्थन किया।
इस बीच मौलाना तौकीर के चाचा मौलाना मन्नान रजा खां ने भी 1989 में लोकसभा का चुनाव लड़ा। मौलाना के भाई मौलाना तौसीफ रजा खां भी 1983 में पीलीभीत से लोकसभा का चुनाव लड़े थे। मौलाना तौसीफ ने सियासत में लंबा समय गुजारा। पहले लंबे समय कांग्रस में रहे, फिर समाजवादी पार्टी में आ गए। वह पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के काफी निकट रहे। संवाद