{"_id":"6079dfd08ebc3e8d3663fdc0","slug":"civic-amenities-shahjahanpur-news-bly4441454123","type":"story","status":"publish","title_hn":"117 साल पहले पहली बार शुरू हुआ था आइसोलेशन-सैनिटाइजेशन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
117 साल पहले पहली बार शुरू हुआ था आइसोलेशन-सैनिटाइजेशन
विज्ञापन
शाहजहांपुर। कोरोना संक्रमण काल में सैनिटाइजेशन, आइसोलेशन और क्वारंटीन जैसे शब्द लोगों के लिए अपरिचित नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में भी लोग इन शब्दों का भावार्थ समझने लगे हैं। हालांकि यह बात कम ही लोगों को पता होगी कि पहली बार महामारी फैलने के दौरान इन शब्दों का प्रचलन 117 साल पहले हुआ था। तब प्लेग फैलने से रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने इस तरह के एहतियात अपनाए थे।
एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ब्रिटिश गजेटियर के हवाले से बताते हैं कि सन 1902 में जिले में पहली बार प्लेग का मरीज मिला था। यह मरीज राजस्थान से संक्रमित होकर आया था। थोड़े ही दिनों में प्लेग के मरीजों का आंकड़ा सौ के पार चला गया। यह संख्या लगातार बढ़ता गया। 1907 तक प्लेग ने 1279 लोगों की जान ले ली थी। ब्रिटिश प्रशासन ने लोगों को प्लेग जैसी महामारी से बचाने के लिए 1904 में सेनेटाइजेशन कराया। तब प्लेग को बढ़ने से रोकने के लिए शहर में बड़े पैमाने पर सैनेटाइजेशन कराया गया था। ब्रिटिश प्रशासन ने मरीजों और बीमारी के संदिग्ध लोगों को आइसोलेट और क्वारंटीन किया था। उस समय भी आइसोलेशन व क्वारंटाइन करके तमाम लोगों की जान बचाई गई थी। तत्कालीन प्रशासन ने तब कई लोगों को जिला बदर भी किया था। सैकड़ों लोगों की मौत के बाद किसी तरह ब्रिटिश प्रशासन ने प्लेग पर काबू पाया था। विकास खुराना बताते हैं कि देश में लाखों लोग प्लेग से मरे थे। इंग्लैंड में तब प्लेग से जनसंख्या तिहाई रह गई थी। इसे ब्लैक डेथ के नाम से भी जाना जाता है।
डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि 1909 के शाहजहांपुर गजेटियर से पता चलता है कि आश्चर्यजनक रूप से यह शहर अपनी स्वास्थ्य वर्धक आबोहवा के लिए संयुक्त प्रांत में प्रसिद्ध था। शहर के अलावा जिले के अन्य स्थानों पर स्थिति भिन्न थी। उत्तर के जंगली भाग भारी वर्षा के कारण पर्याप्त रूप से अस्वस्थ थे। यहां बहने वाली एक नदी का नामकरण ही मलेरिया के नाम पर था। जिले की अन्य अवसाद ग्रस्त नदियां भी ड्राप्सी जैसी बीमारियों के लिए मुफीद बनी रहीं। 1918-1921 के मध्य में फैले स्पेनिश फ्लू से 22,809 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कालरा ने वर्ष 1915 में 5,605 लोगों और 1929 में 2002 लोगों की जान ली थी। इन महामारियों से निपटने के लिये 1907 से जिले में विशेष टीकाकरण अभियान शुरू किया गया था। दो ही वर्षों में तकरीबन सात लाख लोगों को टीके लगा दिए गए। जिला अस्पताल में इसके लिए एक सर्जन तथा 20 व्यक्तियों का स्टाफ कार्य कर रहा था। घर-घर टीकाकरण अभियान चलाए गए। तिलहर तथा शाहजहांपुर नगरपालिका क्षेत्र में टीकाकरण अनिवार्य था।
विज्ञापन
विज्ञापन
एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ब्रिटिश गजेटियर के हवाले से बताते हैं कि सन 1902 में जिले में पहली बार प्लेग का मरीज मिला था। यह मरीज राजस्थान से संक्रमित होकर आया था। थोड़े ही दिनों में प्लेग के मरीजों का आंकड़ा सौ के पार चला गया। यह संख्या लगातार बढ़ता गया। 1907 तक प्लेग ने 1279 लोगों की जान ले ली थी। ब्रिटिश प्रशासन ने लोगों को प्लेग जैसी महामारी से बचाने के लिए 1904 में सेनेटाइजेशन कराया। तब प्लेग को बढ़ने से रोकने के लिए शहर में बड़े पैमाने पर सैनेटाइजेशन कराया गया था। ब्रिटिश प्रशासन ने मरीजों और बीमारी के संदिग्ध लोगों को आइसोलेट और क्वारंटीन किया था। उस समय भी आइसोलेशन व क्वारंटाइन करके तमाम लोगों की जान बचाई गई थी। तत्कालीन प्रशासन ने तब कई लोगों को जिला बदर भी किया था। सैकड़ों लोगों की मौत के बाद किसी तरह ब्रिटिश प्रशासन ने प्लेग पर काबू पाया था। विकास खुराना बताते हैं कि देश में लाखों लोग प्लेग से मरे थे। इंग्लैंड में तब प्लेग से जनसंख्या तिहाई रह गई थी। इसे ब्लैक डेथ के नाम से भी जाना जाता है।
विज्ञापन
डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि 1909 के शाहजहांपुर गजेटियर से पता चलता है कि आश्चर्यजनक रूप से यह शहर अपनी स्वास्थ्य वर्धक आबोहवा के लिए संयुक्त प्रांत में प्रसिद्ध था। शहर के अलावा जिले के अन्य स्थानों पर स्थिति भिन्न थी। उत्तर के जंगली भाग भारी वर्षा के कारण पर्याप्त रूप से अस्वस्थ थे। यहां बहने वाली एक नदी का नामकरण ही मलेरिया के नाम पर था। जिले की अन्य अवसाद ग्रस्त नदियां भी ड्राप्सी जैसी बीमारियों के लिए मुफीद बनी रहीं। 1918-1921 के मध्य में फैले स्पेनिश फ्लू से 22,809 लोगों की मौत हुई थी, जबकि कालरा ने वर्ष 1915 में 5,605 लोगों और 1929 में 2002 लोगों की जान ली थी। इन महामारियों से निपटने के लिये 1907 से जिले में विशेष टीकाकरण अभियान शुरू किया गया था। दो ही वर्षों में तकरीबन सात लाख लोगों को टीके लगा दिए गए। जिला अस्पताल में इसके लिए एक सर्जन तथा 20 व्यक्तियों का स्टाफ कार्य कर रहा था। घर-घर टीकाकरण अभियान चलाए गए। तिलहर तथा शाहजहांपुर नगरपालिका क्षेत्र में टीकाकरण अनिवार्य था।
विज्ञापन