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पांच लाख के गबन के मामले में कार्रवाई के बजाय की गई लीपापोती
Updated Tue, 25 Jul 2017 07:02 PM IST
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पांच लाख गबन के मामले कर दी गई लीपापोती
अफसर अपनी गर्दन बचाने के लिए अधीनस्थोें को ठहरा रहे दोषी
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर।
जिला अस्पताल में पांच लाख रुपये के गबन के मामले में दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी लीपापोती में लगे है। मरीजों से अस्पताल को पर्चे पर मिलने वाली रकम का चार महीने तक निजी उपयोग किया। जब शासन स्तर पर मॉनीटरिंग हुई तो रकम जमा करा दी गई। इस मामले में अब छोटे कर्मचारियों को दोषी ठहराया जा रहा है, लेकिन कार्रवाई किसी के खिलाफ नहीं की जा रही है।
पं. रामप्रसाद बिस्मिल संयुक्त जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना दो सौ से तीन सौ मरीज आते हैं। प्रति मरीज से रजिस्ट्रेशन का एक रुपया लिया जाता है। इस रकम को रोजाना अस्पताल के अकाउंट में जमा किया जाता है। इसकी मॉनीटरिंग भी होती है। इसके बावजूद नवंबर, 2016 से फरवरी, 2017 तक इस धनराशि को अकाउंट में जमा नहीं किया गया। शासन स्तर से जब मॉनीटरिंग हुई तो अपनी गर्दन पर तलवार लटकती देख अधिकारियों ने आनन-फानन में रकम अकाउंट में जमा करा दी। अधिकारी अब खुद को बचाने के लिए इस मामले में कर्मचारियों की गलती बता रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई से बच रहे हैं।
यह गबन का मामला नहीं है। रुपया जमा करने पर कुछ देरी जरूर हुई, लेकिन पूरी रकम जमा कर दी गई है। इसकी जांच भी की जा रही है कि लेट-लतीफी किस स्तर पर हुई है। शासन को भी संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर कार्रवाई के लिए लिखा जा चुका है।
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- डॉ. केशव स्वामी, सीएमएस
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अफसर अपनी गर्दन बचाने के लिए अधीनस्थोें को ठहरा रहे दोषी
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर।
जिला अस्पताल में पांच लाख रुपये के गबन के मामले में दोषियों पर कार्रवाई करने के बजाय अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी लीपापोती में लगे है। मरीजों से अस्पताल को पर्चे पर मिलने वाली रकम का चार महीने तक निजी उपयोग किया। जब शासन स्तर पर मॉनीटरिंग हुई तो रकम जमा करा दी गई। इस मामले में अब छोटे कर्मचारियों को दोषी ठहराया जा रहा है, लेकिन कार्रवाई किसी के खिलाफ नहीं की जा रही है।
पं. रामप्रसाद बिस्मिल संयुक्त जिला अस्पताल की ओपीडी में रोजाना दो सौ से तीन सौ मरीज आते हैं। प्रति मरीज से रजिस्ट्रेशन का एक रुपया लिया जाता है। इस रकम को रोजाना अस्पताल के अकाउंट में जमा किया जाता है। इसकी मॉनीटरिंग भी होती है। इसके बावजूद नवंबर, 2016 से फरवरी, 2017 तक इस धनराशि को अकाउंट में जमा नहीं किया गया। शासन स्तर से जब मॉनीटरिंग हुई तो अपनी गर्दन पर तलवार लटकती देख अधिकारियों ने आनन-फानन में रकम अकाउंट में जमा करा दी। अधिकारी अब खुद को बचाने के लिए इस मामले में कर्मचारियों की गलती बता रहे हैं लेकिन उनके खिलाफ कार्रवाई से बच रहे हैं।
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यह गबन का मामला नहीं है। रुपया जमा करने पर कुछ देरी जरूर हुई, लेकिन पूरी रकम जमा कर दी गई है। इसकी जांच भी की जा रही है कि लेट-लतीफी किस स्तर पर हुई है। शासन को भी संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ जांच कर कार्रवाई के लिए लिखा जा चुका है।
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- डॉ. केशव स्वामी, सीएमएस