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नफरत बढा़ने आ गए चुनाव शहर में.....
Updated Mon, 05 Jun 2017 10:03 AM IST
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पुवायां (शाहजहांपुर)।
नगर के ग्लोबल एजूकेशन इंस्टीट्यूट में आयोजित कवि सम्मेलन का जनकल्याण स्कूल की पूर्व प्रधानचार्या, साहित्यकार माया गुप्ता ने श्ुाभारंभ किया। इसके बाद कवि अनूप मिश्र ने मां सरस्वती और मां गायत्री की वंदना की।
कवि आशीष देव ने सुनाया-
सभी रिश्ते हैं मतलब के,
यही मतलब है रिश्तों का।
कवि अरविंद प्रियदर्शी ने कहा-
जिए देश के लिए और मरे देश के हित,
ऐसे हिंद के शहीदों को सलाम लिखता हूं मैं।
कवि डॉ. रामबाबू शुक्ल ने सुनाया-
समय पड़ा तो बच्चा बच्चा अभिमन्यु होता है,
धरती में तब बीज नहीं वो तलवारें बोता है।
गीतकार तेजपाल जोशी ने अपनी बात कुछ इस तरह कही-
हमने देखा काम करते नन्हे उस मजदूर को,
याद आया मेरा बचपन और मैं रोने लगा।
कवि विजय तन्हा ने सुनाया-
जिधर देखूं उधर मुझको यही मंजर दिखाई दे,
कहीं पर बम दिखाई दे, कहीं खंजर दिखाई दे।
अनूप मिश्र ने सुनाया
चलने लगे सियासतों के दांव शहर में,
नफरत बढ़ाने आ गए चुनाव शहर में।
भरने लगा है दिल में अलगाव का जहर,
बढ़ने लगा है मजहबी तनाव शहर में।।
कवि संजय अकेला ने फरमाया-
रहना जरा संभलकर अपनों के बीच में,
होते हैं छिपे अपनों में गद्दार देखिए।
प्रदीप बैरागी ने सुनाया-
काट सको छप्पर में रातें तो आना,
कोठी, बंगला, कार हमारे पास नहीं।
इसके अलावा रामलड़ैते श्रीवास ने भी कविता पाठ किया। इस मौके पर संजीव प्रबल, अभिषेक डैनियल, सुधीर यादव, अमिय कृष्ण, संजय गुप्ता, विजय वर्मा, गायत्री शर्मा, पुष्पेंद्र यादव, प्रेरणा, प्रांजल, विवेक मिश्र, दिव्यांशी सिंह, कन्हैया, सीपी सिंह आदि मौजूद रहे। इंस्टीट्यूट की ओर से कवियों को सम्मान पत्र भी प्रदान किए गए।
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नगर के ग्लोबल एजूकेशन इंस्टीट्यूट में आयोजित कवि सम्मेलन का जनकल्याण स्कूल की पूर्व प्रधानचार्या, साहित्यकार माया गुप्ता ने श्ुाभारंभ किया। इसके बाद कवि अनूप मिश्र ने मां सरस्वती और मां गायत्री की वंदना की।
कवि आशीष देव ने सुनाया-
सभी रिश्ते हैं मतलब के,
यही मतलब है रिश्तों का।
कवि अरविंद प्रियदर्शी ने कहा-
जिए देश के लिए और मरे देश के हित,
ऐसे हिंद के शहीदों को सलाम लिखता हूं मैं।
कवि डॉ. रामबाबू शुक्ल ने सुनाया-
समय पड़ा तो बच्चा बच्चा अभिमन्यु होता है,
धरती में तब बीज नहीं वो तलवारें बोता है।
गीतकार तेजपाल जोशी ने अपनी बात कुछ इस तरह कही-
हमने देखा काम करते नन्हे उस मजदूर को,
याद आया मेरा बचपन और मैं रोने लगा।
कवि विजय तन्हा ने सुनाया-
जिधर देखूं उधर मुझको यही मंजर दिखाई दे,
कहीं पर बम दिखाई दे, कहीं खंजर दिखाई दे।
अनूप मिश्र ने सुनाया
चलने लगे सियासतों के दांव शहर में,
नफरत बढ़ाने आ गए चुनाव शहर में।
भरने लगा है दिल में अलगाव का जहर,
बढ़ने लगा है मजहबी तनाव शहर में।।
कवि संजय अकेला ने फरमाया-
रहना जरा संभलकर अपनों के बीच में,
होते हैं छिपे अपनों में गद्दार देखिए।
प्रदीप बैरागी ने सुनाया-
काट सको छप्पर में रातें तो आना,
कोठी, बंगला, कार हमारे पास नहीं।
इसके अलावा रामलड़ैते श्रीवास ने भी कविता पाठ किया। इस मौके पर संजीव प्रबल, अभिषेक डैनियल, सुधीर यादव, अमिय कृष्ण, संजय गुप्ता, विजय वर्मा, गायत्री शर्मा, पुष्पेंद्र यादव, प्रेरणा, प्रांजल, विवेक मिश्र, दिव्यांशी सिंह, कन्हैया, सीपी सिंह आदि मौजूद रहे। इंस्टीट्यूट की ओर से कवियों को सम्मान पत्र भी प्रदान किए गए।
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