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बेमौसम की बरसात से गन्ना फसल को कीट-रोगों से बचाने की जरूरत

Wed, 14 Feb 2018 08:56 PM IST
Updated Wed, 14 Feb 2018 08:56 PM IST
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बेमौसम की बरसात से गन्ना फसल को कीट-रोगों से बचाने की जरूरत
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फोटो 20 में।
बेमौसम बरसात: कीट रोगाें से बचाएं गन्ना फसल
1.15 लाख किसानों ने 82000 हेक्टेयर में बोई गन्ना की फसल
जिले मेें 4.25 करोड़ क्विंटल रिकार्ड गन्ना उत्पादन होने का अनुमान
अमर उजाला ब्यूरो
शाहजहांपुर।
नगदी फसलों में शामिल गन्ना का उत्पादन करने वाले किसानों को बेमौसम की बारिश के बाद कीट-रोगों की आशंका सताने लगी हैं। हालांकि, कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि बारिश के दौरान हवा का वेग धीमा रहने से फसल को तात्कालिक तौर पर कोई क्षति नहीं पहुंची। इसके विपरीत बरसात से गन्ना की पत्तियों पर जमी धूल साफ होने के साथ प्रकाश संश्लेषण की क्रिया तेज होने से पौधों की बढ़वार भी तेजी से होगी, लेकिन वातावरण में आर्द्रता बढ़ने से कतिपय कीट-रोग हमलाकर सकते हैं। इसके लिए उन्होंने किसान भाइयों से घबराने के बजाय जैविक और रासायनिक उपचार इस्तेमाल करने पर जोर दिया है।
जिले में करीब 4.50 लाख किसान रबी-खरीफ सीजन में गेहूं और धान की पारंपरिक खेती सहित गन्ना उत्पादन में अपनी दिलचस्पी लगातार बढ़ा रहे हैं। गन्ना विकास विभाग भी शीघ्र पकने वाली और अधिक चीनी परता देने वाली प्रजातियों को बुवाई में प्रोत्साहित कर किसानोें का गन्ना खेती के प्रति रुझान बढ़ा रहा है। इन प्रयासों के सकारात्मक नतीजे भी सामने आ रहे हैं। गत वर्ष 62885 हेक्टेयर में गन्ना बोया गया, लेकिन चालू पेराई सत्र में गन्ना रकबा करीब 20 हजार हेक्टेयर बढ़ गया है और इसके सापेक्ष गन्ना उत्पादन भी बढ़कर 4.25 करोड़ क्विंटल से अधिक होने का अनुमान है। सहकारी गन्ना समितियों के 1.15 लाख सदस्य किसानों के माध्यम से जिले की पांचों चीनी मिलों को 2.85 करोड़ क्विंटल से अधिक गन्ना सप्लाई होना है।
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शीतकालीन बुवाई से पहले दीमक का उपचार जरूरी
गन्ना शोध परिषद के कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार खेत में तैयार फसल के लिए बारिश का पानी अमृत के समान उपयोगी होगा, लेकिन फरवरी मध्य में होने वाली शीतकालीन बुवाई से पहले हुई 19 मिमी बरसात से पैदा हुई नमी के कारण दीमक कीट बलुई मिट्टी और ऊंचे तथा असिंचित खेत में डेरा जमा लेता है। यह कीट गन्नेे के टुकड़ों की आंख एवं उसके सिरे को चट करके फसल के जमाव को प्रभावित करता है। गन्ने के खाए हुए भाग में मिट्टी भर जाने से उपज भी प्रभावित होती है। इस कीट पर नियंत्रण के लिए बुवाई के समय फोरेट, क्लोरोपाइरीफास आदि कई रसायनों का उचित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। जैविक उपचार के लिए गन्ना शोध परिषद से विकसित बवेरिया बैसियाना भी असरकारक साबित होगा।
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सिरका सी गंध अंकुर बेधक के प्रकोप का सूचक
सूंडी जैसा यह कीट जमीन के नीचे गन्ना पेड़ी में छिद्र बनाकर प्रविष्ट होता है। साथ ही पौध में बढ़ रहे ऊतकों को क्षतिग्रस्त कर देता है। इसके अपशिष्ट मृतसार को सूंघने पर सिरके जैसी गंध आए तो किसान भाई अंकुर बेधक के उपचार को सतर्क हो जाएं। मार्च की शुरुआत से लेकर जून तक इस कीट का प्रकोप रहता है। कृषि विशेषज्ञ अंकुर बेधक का खात्मा करने के लिए खेत की समुचित सिंचाई के बाद पौध पर मिट्टी चढ़ाने की सलाह देते हैं। सिंचाई के समय कोराजेन रसायन प्रयोग करने की दशा में बेधककीट स्वयं एक जगह इकट्ठा होकर नष्ट होने लगते हैं। प्रभावित पौधोें को सूंड़ी और प्यूपासहित काटकर नष्ट कर देने से शेष फसल को सुरक्षित रखना आसान हो जाएगा।
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उपचार से नियंत्रित होगा कंडुआ रोग
इस रोग के प्रकोप से गन्ना पतला और उसकी पोरियां लंबी हो जाती है। अगोले की पत्तियां भी छोटी, पतली और नुकीली हो जाती हैं। यही नहीं, गन्ना की सभी आखें (अंकुरित होने वाला हिस्सा) अपरिवक्त अवस्था में अंकुरित होने लगती हैं। गन्ना की लंबाई बढ़ने के बाद इस रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। इसलिए कृषि वैज्ञानिक इसके उपचार के लिए बुवाई के समय गन्ना के काटे हुए हिस्से को 100 लीटर पानी में 100 ग्राम कार्बेन्डाजिम रसायन के घोल में डुबोकर खेत में डालने की सलाह देते हैं। यह तरीका अपनाने पर नमी बढ़ने की दशा में भी कंडुआ विकसित नहीं होता।

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सावधानियां उपचार से अधिक कारगर
फोटो 29 में।
बात चाहे इंसान की सेहत की हो या फिर फसलों की, उपचार से कहीं अधिक कारगर है सावधानियां बरतना। गन्ना की फसल को कीट-रोगों से बचाने पर भी यही बात लागू होती है। बरसात से गन्ना उपज को कोई हानि नहीं होगी कि कीट-रोगों के समय चक्र को ध्यान में रखते हुए संबंधित सावधानियां बरतनी जरूरी हैं। इसीलिए किसानों को लगातार रासायनिक उपचार पर मृदा परीक्षण और बीज शोधन को वरीयता देने की सलाह दी जाती है।
-डॉ. अरुण सिंह, कृषि वैज्ञानिक, गन्ना शोध परिषद
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