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Sant Kabir Nagar News: नौ दिनों तक आस्था व शुचिता के साथ की पूजा, विसर्जन के बाद बेकद्री
Fri, 27 Oct 2023 01:00 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
Updated Fri, 27 Oct 2023 01:00 AM IST
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विसर्जन के बाद झुड़िया नाले में पड़ा प्रतिमाओं का ढांचा।
संतकबीरनगर। नवरात्र खत्म होने के बाद नदियों-जलाशयों के पास बने अस्थायी पोखरों में देवी प्रतिमाओं का विसर्जन कर दिया गया। जिस आस्था व शुचिता के साथ नौ दिनों तक पूजा-अर्चना की गई, विसर्जन में उसका अंशमात्र भी ध्यान नहीं रखा गया। विसर्जित प्रतिमाओं का ढांचा और अवशेष पोखरों में और जलाशयों के किनारे पड़ा है। उस पर लोग आ-जा भी रहे हैं। प्रशासन की बदइंतजामी का हाल यह है कि नगर पालिका के कर्मचारी प्रतिमाओं के अवशेष को हटाने तक की जहमत नहीं उठा रहे हैं। इसके चलते अब तक अवशेष इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। धर्माचार्य प्रतिमाओं की बेकद्री के लिए पूजा समितियों के साथ ही प्रशासन को भी जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
नवरात्र में नौ दिनों तक प्रतिमाओं की पूजन अर्चन की जाती है। इसके बाद नवमी के बार प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। शहर की प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए मगहर के आमी नदी के पास प्रशासन ने अस्थाई पोखरे का निर्माण कराया था। बुधवार को दोपहर बाद से प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए जुलूस निकाला गया। उसके बाद अस्थाई पोखरे में विसर्जन हुआ। पोखरों में प्रतिमाओं से साड़ी, गहने, लकड़ी आदि लोग निकाल लिए। प्रतिमाओं के अवशेष आज भी पोखरे में अवशेष पड़े हैं। जिस पर लोग आ जा रहे हैं। इसके साथ ही उस पर पैर रख कर खड़े भी हो रहे है। नगर पंचायत मगहर के कर्मी भी अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रात में ही विसर्जन स्थल से गायब हो गए।
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प्रतिमाओं में लगी लकड़ी ले जाने की रही होड़
मगहर के आमी नदी के पास बने अस्थायी पोखरे व अन्य स्थानों पर बने पोखरे में विसर्जित मूर्तियों में लगी लकड़ी को ले जाने की होड़ मची रही। लोग उसका किसी काम में इस्तेमाल करने की बात कह रहे थे। इसके साथ ही प्रतिमाओं के साथ विसर्जित हुए कलश को भी लोग ले जा रहे थे। मां दुर्गा के वस्त्र को लोग ले जाकर उसके इस्तेमाल की भी बात कह रहे थे।
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शास्त्रों में विसर्जन की यह है प्रक्रिया
जानकारों की माने तो शास्त्रीय विधि के अनुसार प्रतिमाओं को पानी के अंदर तक ले जाए और उसे धीरे-धीरे जल में अर्पित कर दें। जिससे मिट्टी की प्रतिमा पूरी तरह से गल जाए और समाप्त हो जाए। इस दौरान यह ध्यान दें कि प्रतिमाएं खंडित न हों।
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मूर्ति विसर्जन के समय रखें मर्यादा का ख्याल
नवरात्र में माता दुर्गा की मूर्ति बनाकर पांडालों में प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रतिदिन उनकी पूजा व दुर्गा सप्तशती का पाठ व आरती होती है। नवमी में हवन होता है। फिर मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। जिस भी जल स्थान पर मूर्ति विसर्जित की जाती है, वहां एकदम वैसे ही विसर्जन होना चाहिए जैसा मूर्ति मूल स्वरूप में थी। मूर्ति पर सजाए गए सामान, आभूषण इत्यादि छूना तक पाप है। उसको खंडित करना या मूर्ति पर अर्पित सामान के लिए उसको खंडित करना लोभ जैसे महापाप में आता है। -सुजीत महाराज, ज्योतिषाचार्य
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नवरात्र में जो मूर्ति स्थापित होती है, वह मिट्टी की बनी रहती है। मूर्ति जब बनती है तो उसकी प्राण प्रतिष्ठा होती है। मंत्रों के जरिए उसे पंडालों में स्थापित कराया जाता है। जब नवमी खत्म होती है तो उसका विसर्जन किया जाता है। देवी प्रतिमाएं मां का स्वरूप होती हैं। इसे गहरे जल में विसर्जित करना चाहिए। आधा अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। जब तक प्रतिमा पूरी तरह से विसर्जित न हो जाए तब तक उस स्थान पर किसी को जाने नहीं देना चाहिए। यह बात शास्त्रों में भी है। -डॉ. विजय कृष्ण ओझा, अध्यक्ष संस्कृत विभाग, एचआरपीजी कॉलेज
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प्रतिमाओं को नदियों में विसर्जित करने से नदियां प्रदूषित होती हैं। नौ दिन तक लोग श्रद्धा के साथ माता की पूजा-अर्चना करते हैं। उसके बाद उसे विसर्जित किया जाता है। विसर्जन का तरीका गलत है। प्रतिमाओं के लिए जो भी विसर्जन स्थल होता है, वहां पर प्रतिमाओं के ले जाकर पानी में प्रवाहित कर देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए की प्रतिमाएं पूरी तरह से पानी में समाहित हो जाएं। तभी सही मायने में विसर्जन होता है। -डॉ. दिग्विजयनाथ पांडेय, पूर्व प्राचार्य
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प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए अस्थायी पोखरे बनाए गए थे और जिसकी निगरानी के लिए कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई थी। सुरक्षा के साथ व्यवस्था का पूरा ख्याल रखा गया था। शांतिपूर्ण तरीके से प्रतिमाएं विसर्जित हुईं। -महेंद्र सिंह तंवर,डीएम
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नवरात्र में नौ दिनों तक प्रतिमाओं की पूजन अर्चन की जाती है। इसके बाद नवमी के बार प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। शहर की प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए मगहर के आमी नदी के पास प्रशासन ने अस्थाई पोखरे का निर्माण कराया था। बुधवार को दोपहर बाद से प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए जुलूस निकाला गया। उसके बाद अस्थाई पोखरे में विसर्जन हुआ। पोखरों में प्रतिमाओं से साड़ी, गहने, लकड़ी आदि लोग निकाल लिए। प्रतिमाओं के अवशेष आज भी पोखरे में अवशेष पड़े हैं। जिस पर लोग आ जा रहे हैं। इसके साथ ही उस पर पैर रख कर खड़े भी हो रहे है। नगर पंचायत मगहर के कर्मी भी अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रात में ही विसर्जन स्थल से गायब हो गए।
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प्रतिमाओं में लगी लकड़ी ले जाने की रही होड़
मगहर के आमी नदी के पास बने अस्थायी पोखरे व अन्य स्थानों पर बने पोखरे में विसर्जित मूर्तियों में लगी लकड़ी को ले जाने की होड़ मची रही। लोग उसका किसी काम में इस्तेमाल करने की बात कह रहे थे। इसके साथ ही प्रतिमाओं के साथ विसर्जित हुए कलश को भी लोग ले जा रहे थे। मां दुर्गा के वस्त्र को लोग ले जाकर उसके इस्तेमाल की भी बात कह रहे थे।
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शास्त्रों में विसर्जन की यह है प्रक्रिया
जानकारों की माने तो शास्त्रीय विधि के अनुसार प्रतिमाओं को पानी के अंदर तक ले जाए और उसे धीरे-धीरे जल में अर्पित कर दें। जिससे मिट्टी की प्रतिमा पूरी तरह से गल जाए और समाप्त हो जाए। इस दौरान यह ध्यान दें कि प्रतिमाएं खंडित न हों।
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मूर्ति विसर्जन के समय रखें मर्यादा का ख्याल
नवरात्र में माता दुर्गा की मूर्ति बनाकर पांडालों में प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रतिदिन उनकी पूजा व दुर्गा सप्तशती का पाठ व आरती होती है। नवमी में हवन होता है। फिर मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। जिस भी जल स्थान पर मूर्ति विसर्जित की जाती है, वहां एकदम वैसे ही विसर्जन होना चाहिए जैसा मूर्ति मूल स्वरूप में थी। मूर्ति पर सजाए गए सामान, आभूषण इत्यादि छूना तक पाप है। उसको खंडित करना या मूर्ति पर अर्पित सामान के लिए उसको खंडित करना लोभ जैसे महापाप में आता है। -सुजीत महाराज, ज्योतिषाचार्य
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नवरात्र में जो मूर्ति स्थापित होती है, वह मिट्टी की बनी रहती है। मूर्ति जब बनती है तो उसकी प्राण प्रतिष्ठा होती है। मंत्रों के जरिए उसे पंडालों में स्थापित कराया जाता है। जब नवमी खत्म होती है तो उसका विसर्जन किया जाता है। देवी प्रतिमाएं मां का स्वरूप होती हैं। इसे गहरे जल में विसर्जित करना चाहिए। आधा अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। जब तक प्रतिमा पूरी तरह से विसर्जित न हो जाए तब तक उस स्थान पर किसी को जाने नहीं देना चाहिए। यह बात शास्त्रों में भी है। -डॉ. विजय कृष्ण ओझा, अध्यक्ष संस्कृत विभाग, एचआरपीजी कॉलेज
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प्रतिमाओं को नदियों में विसर्जित करने से नदियां प्रदूषित होती हैं। नौ दिन तक लोग श्रद्धा के साथ माता की पूजा-अर्चना करते हैं। उसके बाद उसे विसर्जित किया जाता है। विसर्जन का तरीका गलत है। प्रतिमाओं के लिए जो भी विसर्जन स्थल होता है, वहां पर प्रतिमाओं के ले जाकर पानी में प्रवाहित कर देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए की प्रतिमाएं पूरी तरह से पानी में समाहित हो जाएं। तभी सही मायने में विसर्जन होता है। -डॉ. दिग्विजयनाथ पांडेय, पूर्व प्राचार्य
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प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए अस्थायी पोखरे बनाए गए थे और जिसकी निगरानी के लिए कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई थी। सुरक्षा के साथ व्यवस्था का पूरा ख्याल रखा गया था। शांतिपूर्ण तरीके से प्रतिमाएं विसर्जित हुईं। -महेंद्र सिंह तंवर,डीएम