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मौलाना प्रकरण : ब्रिटिश नागरिकता में मामले में शमशुल हुदा की रिट खारिज
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संतकबीरनगर। दुधारा थाना क्षेत्र के देवरिया लाल गांव निवासी ब्रिटिश नागरिकता हासिल करने के आरोप और बिना सरकारी अनुमति जमीन खरीदने के मामले में मौलाना शमशुल हुदा खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी आपराधिक विविध रिट याचिका को पैरवी के अभाव में खारिज कर दी है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई अंतरिम आदेश था तो वह समाप्त माना जाएगा।
मामला खलीलाबाद थाने में दर्ज वर्ष 2024 की प्राथमिकी से जुड़ा है। दूसरी तरफ पिछले दिनों एसडीएम कोर्ट के मदरसा जमीन व भवन को राज्य सरकार के खाते में निहित करने के आदेश के खिलाफ भी प्रबंध तंत्र में हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गई है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट संख्या-49 में 12 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह-प्रथम की पीठ ने मामले की सुनवाई की। आदेश के अनुसार, संशोधित पुकार में याचिकाकर्ता की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। सरकारी अधिवक्ता मौजूद रहे। याचिकाकर्ता की ओर से रिट याचिका पर पैरवी नहीं किए जाने के कारण अदालत ने इसे नॉन-प्रॉसिक्यूशन यानी पैरवी के अभाव में खारिज कर दिया। साथ ही पूर्व में दिया गया अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया।
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मामले में 24 अक्तूबर 2024 को हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी थी कि एफआईआर दर्ज कराने वाला व्यक्ति याचिकाकर्ता का साला है। संपत्ति खरीदने को लेकर कई शिकायतें की गई हैं। शिकायतों में यह आधार बताया गया कि मौलाना शमशुल हुदा खान ने ब्रिटिश नागरिकता हासिल कर ली है। ऐसे में नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा-9 के तहत वह भारतीय नागरिक नहीं रह गए हैं और भारत में जमीन खरीदने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया था कि नागरिकता को लेकर विवाद होने पर उसका निर्धारण नागरिकता अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। अधिवक्ता ने दावा किया था कि इस संबंध में नागरिकता अधिनियम और नागरिकता नियमावली के तहत कोई आवेदन नहीं किया गया।
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राजस्व संहिता का भी दिया गया था हवाला
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा था कि भारत का नागरिक न होने वाला व्यक्ति राज्य सरकार की लिखित पूर्व अनुमति के बिना बिक्री, उपहार या कब्जे के हस्तांतरण के जरिये संपत्ति अर्जित नहीं कर सकता। धारा-229 का भी उल्लेख किया गया था।
दूसरी ओर, एफआईआर दर्ज कराने वाले पक्ष की ओर से अदालत में कहा गया कि मौलाना ने ब्रिटिश नागरिकता हासिल की है और सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कृषि भूमि समेत संपत्ति खरीदी। आरोप था कि संपत्ति खरीदते समय उन्होंने अपनी ब्रिटिश नागरिकता की जानकारी घोषित नहीं की।
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मंडल आयुक्त के यहां भी लंबित था विवाद
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया था कि संपत्ति सोसायटी के नाम पर खरीदी गई है और इस संबंध में मंडल आयुक्त, बस्ती के समक्ष पुनरीक्षण लंबित है। याचिकाकर्ता की ओर से आठ मई 2024 को रिट-सी संख्या 14258/2024 में पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा गया था कि पुनरीक्षण न्यायालय को कार्रवाई 30 जून 2024 तक पूरी करने और यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, सुनवाई के समय पुनरीक्षण लंबित होने की बात सामने आई थी।
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2024 में एफआईआर पर लगाई गई थी कार्रवाई पर रोक
24 अक्तूबर 2024 के आदेश में हाईकोर्ट ने अगली तारीख तक मौलाना शमशुल हुदा खान के खिलाफ एफआईआर के आधार पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। यह एफआईआर सात अप्रैल 2024 को खलीलाबाद थाने में केस क्राइम नंबर 288/2024 के रूप में दर्ज की गई थी। इसमें धारा 419, 420, 467, 468, 471 और 120-बी आईपीसी के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। अब 12 अगस्त 2026 को रिट याचिका पैरवी के अभाव में खारिज होने के साथ ही पूर्व अंतरिम आदेश भी समाप्त हो गया है।
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मामला खलीलाबाद थाने में दर्ज वर्ष 2024 की प्राथमिकी से जुड़ा है। दूसरी तरफ पिछले दिनों एसडीएम कोर्ट के मदरसा जमीन व भवन को राज्य सरकार के खाते में निहित करने के आदेश के खिलाफ भी प्रबंध तंत्र में हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की गई है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट संख्या-49 में 12 अगस्त 2026 को न्यायमूर्ति अजय भनोट और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह-प्रथम की पीठ ने मामले की सुनवाई की। आदेश के अनुसार, संशोधित पुकार में याचिकाकर्ता की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। सरकारी अधिवक्ता मौजूद रहे। याचिकाकर्ता की ओर से रिट याचिका पर पैरवी नहीं किए जाने के कारण अदालत ने इसे नॉन-प्रॉसिक्यूशन यानी पैरवी के अभाव में खारिज कर दिया। साथ ही पूर्व में दिया गया अंतरिम आदेश भी समाप्त कर दिया।
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मामले में 24 अक्तूबर 2024 को हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी थी कि एफआईआर दर्ज कराने वाला व्यक्ति याचिकाकर्ता का साला है। संपत्ति खरीदने को लेकर कई शिकायतें की गई हैं। शिकायतों में यह आधार बताया गया कि मौलाना शमशुल हुदा खान ने ब्रिटिश नागरिकता हासिल कर ली है। ऐसे में नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा-9 के तहत वह भारतीय नागरिक नहीं रह गए हैं और भारत में जमीन खरीदने के लिए सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया था कि नागरिकता को लेकर विवाद होने पर उसका निर्धारण नागरिकता अधिनियम में निर्धारित प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। अधिवक्ता ने दावा किया था कि इस संबंध में नागरिकता अधिनियम और नागरिकता नियमावली के तहत कोई आवेदन नहीं किया गया।
राजस्व संहिता का भी दिया गया था हवाला
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा था कि भारत का नागरिक न होने वाला व्यक्ति राज्य सरकार की लिखित पूर्व अनुमति के बिना बिक्री, उपहार या कब्जे के हस्तांतरण के जरिये संपत्ति अर्जित नहीं कर सकता। धारा-229 का भी उल्लेख किया गया था।
दूसरी ओर, एफआईआर दर्ज कराने वाले पक्ष की ओर से अदालत में कहा गया कि मौलाना ने ब्रिटिश नागरिकता हासिल की है और सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कृषि भूमि समेत संपत्ति खरीदी। आरोप था कि संपत्ति खरीदते समय उन्होंने अपनी ब्रिटिश नागरिकता की जानकारी घोषित नहीं की।
मंडल आयुक्त के यहां भी लंबित था विवाद
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया था कि संपत्ति सोसायटी के नाम पर खरीदी गई है और इस संबंध में मंडल आयुक्त, बस्ती के समक्ष पुनरीक्षण लंबित है। याचिकाकर्ता की ओर से आठ मई 2024 को रिट-सी संख्या 14258/2024 में पारित आदेश का हवाला देते हुए कहा गया था कि पुनरीक्षण न्यायालय को कार्रवाई 30 जून 2024 तक पूरी करने और यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, सुनवाई के समय पुनरीक्षण लंबित होने की बात सामने आई थी।
2024 में एफआईआर पर लगाई गई थी कार्रवाई पर रोक
24 अक्तूबर 2024 के आदेश में हाईकोर्ट ने अगली तारीख तक मौलाना शमशुल हुदा खान के खिलाफ एफआईआर के आधार पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था। यह एफआईआर सात अप्रैल 2024 को खलीलाबाद थाने में केस क्राइम नंबर 288/2024 के रूप में दर्ज की गई थी। इसमें धारा 419, 420, 467, 468, 471 और 120-बी आईपीसी के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। अब 12 अगस्त 2026 को रिट याचिका पैरवी के अभाव में खारिज होने के साथ ही पूर्व अंतरिम आदेश भी समाप्त हो गया है।