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ब्रिटिश मौलाना प्रकरण : निगरानी याचिका खारिज, मदरसा ध्वस्तीकरण का आदेश बरकरार
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संतकबीरनगर। खलीलाबाद शहर के मोतीनगर स्थित ब्रिटिश मौलाना शमशुल हुदा खान के मदरसा मामले में बस्ती मंडल के आयुक्त कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कुल्लियातुल बनातिर रजबिया एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसायटी की ओर से दाखिल निगरानी याचिका को आयुक्त ने खारिज कर दिया है। साथ ही मदरसा ध्वस्तीकरण के एसडीएम और डीएम कोर्ट के पूर्व के आदेश को बरकरार रखा है।
यह मामला मोतीनगर स्थित जमीन के गाटा संख्या-154 की 640 वर्गमीटर भूमि पर मदरसा निर्माण से जुड़ा है। सोसायटी की ओर से वर्ष 2018 में भवन मानचित्र स्वीकृति के लिए आवेदन किया गया था। आरोप था कि नियत प्राधिकारी द्वारा समय पर कोई निर्णय न देने के बावजूद निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया, जिसे बाद में अवैध बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया गया।
सोसायटी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि मानचित्र नियमों के तहत स्वतः स्वीकृत माना जाना चाहिए था और संबंधित अधिकारियों ने बिना पूरी सुनवाई के कार्रवाई की। वहीं सरकारी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि विवादित भूमि पहले ही राजस्व संहिता के तहत राज्य सरकार में निहित हो चुकी है। ऐसे में मानचित्र स्वीकृति का आवेदन निरस्त करना पूरी तरह उचित है। आयुक्त ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद पाया कि नियत प्राधिकारी, एसडीएम और जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेशों में कोई कानूनी या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है।
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आयुक्त ने निगरानी को “बलहीन” मानते हुए प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया। पूर्व में दिए गए 13 जनवरी 2026 व 23 फरवरी 2026 के आदेशों को बरकरार रखा। इस फैसले से साफ है कि यदि भूमि राज्य सरकार के नाम दर्ज हो चुकी है तो उस पर निजी निर्माण के लिए मानचित्र स्वीकृति नहीं दी जा सकती।
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यह मामला मोतीनगर स्थित जमीन के गाटा संख्या-154 की 640 वर्गमीटर भूमि पर मदरसा निर्माण से जुड़ा है। सोसायटी की ओर से वर्ष 2018 में भवन मानचित्र स्वीकृति के लिए आवेदन किया गया था। आरोप था कि नियत प्राधिकारी द्वारा समय पर कोई निर्णय न देने के बावजूद निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया, जिसे बाद में अवैध बताते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश जारी कर दिया गया।
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सोसायटी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि मानचित्र नियमों के तहत स्वतः स्वीकृत माना जाना चाहिए था और संबंधित अधिकारियों ने बिना पूरी सुनवाई के कार्रवाई की। वहीं सरकारी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि विवादित भूमि पहले ही राजस्व संहिता के तहत राज्य सरकार में निहित हो चुकी है। ऐसे में मानचित्र स्वीकृति का आवेदन निरस्त करना पूरी तरह उचित है। आयुक्त ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद पाया कि नियत प्राधिकारी, एसडीएम और जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेशों में कोई कानूनी या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है।
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आयुक्त ने निगरानी को “बलहीन” मानते हुए प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया। पूर्व में दिए गए 13 जनवरी 2026 व 23 फरवरी 2026 के आदेशों को बरकरार रखा। इस फैसले से साफ है कि यदि भूमि राज्य सरकार के नाम दर्ज हो चुकी है तो उस पर निजी निर्माण के लिए मानचित्र स्वीकृति नहीं दी जा सकती।