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Sant Kabir Nagar News: अमर शहीद रामप्रीत ने पुलवामा में लिखी थी शौर्य गाथा

Fri, 26 Jan 2024 01:12 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, संत कबीर नगर Updated Fri, 26 Jan 2024 01:12 AM IST
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Amar Shaheed Rampreet wrote the saga of bravery in Pulwama.
शहीद रामप्रीत चौरसिया की फाइल फोटो।
-मुठभेड़ में तीन दहशतगर्दों को उतार दिया था मौत के घाट
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संवाद न्यूज एजेंसी
हरिहरपुर। जिले के अमर शहीद रामप्रीत चौरसिया ने बीस साल पहले कश्मीर के पुलवामा में जो शौर्यगाथा लिखी थी, वह आज भी क्षेत्र के लोगों की जुबां पर है। उन्होंने नरवानी सेक्टर के एक घर में छिपे लश्कर के तीन दहशतगर्दों को मौत की नींद सुला दी थी, लेकिन मुठभेड़ में घायल हुए रामप्रीत चौरसिया शहीद हो गए। उनकी शहादत के किस्से क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं।

नाथनगर ब्लाॅक के अलीनगर गांव निवासी रामप्रीत चौरसिया साल 1988 में बीएसएफ में भर्ती हुए थे। 2001 में उन्हें कश्मीर के पुलवामा में बीएसएफ की 52वीं बटालियन में तैनाती मिली थी। सन 2003 के सितंबर माह में नरवानी सेक्टर के एक घर में दहशतगर्दों के छिपे होने की खुफिया जानकारी मिली। घर में छिपे आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन का जिम्मा जिस बटालियन को सौंपा गया था। उसी बटालियन में रामप्रीत चौरसिया भी तैनात थे। नरवानी सेक्टर के जिस घर में आतंकी छिपे हुए थे।
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उसे बीएसएफ की 52वीं बटालियन ने चारों ओर से घेर लिया। खुद को चारों ओर घिरा देख दहशतगर्दों ने सेना पर अंधाधुंध फायरिंग झोंक दी। जिसमें बटालियन के एएसआई और कांस्टेबल घायल हो गए। साथियों के घायल हो जाने के बाद रामप्रीत चौरसिया ने मोर्चा संभाला। देर तक चले मुठभेड़ में शहीद रामप्रीत चौरसिया ने घर में छिपे तीनों दहशतगर्दों को मौत की नींद सुला दी और खुद आतंकियों की गोली से घायल हो गए। इलाज के दौरान रामप्रीत चौरसिया ने अंतिम सांस ली।
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मरणोपरांत राष्ट्रपति पदक से हुए सम्मानित

शहीद रामप्रीत चौरसिया को 2005 में मरणोपरांत राष्ट्रपति पुलिस पदक गैलेंट्री अवार्ड से सम्मानित किया गया। जिस समय रामप्रीत चौरसिया शहीद हुए थे उस समय वे अपने पीछे माता, पिता, पत्नी व चार बच्चे छोड़ गए थे। उस समय उनके बड़े बेटे विनय कुमार चौरसिया की उम्र महज 13 साल थी।


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छोटे भाई-बहनो की परवरिश के लिए बेटे ने छोड़ दी नौकरी

2010 में शहीद की पत्नी कुशुमावती देवी का बीमारी के चलते निधन हो गया। जिससे परिवार को मिलने वाली पेंशन भी बंद हो गई तब परिवार की परवरिश मुश्किल होने लगी। दस साल बाद शहीद के बेटे विनय कुमार चौरसिया को बीएसएफ में नौकरी भी मिल गई। लेकिन घर पर छोटे भाई बहनों और बुजुर्ग दादा, दादी को छोड़कर वह नौकरी नहीं कर सके और नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

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