{"_id":"5caa353cbdec2213e54bb53f","slug":"41554658620-sant-kabir-nagar-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"बंद हैं औद्योगिक इकाइयां, नाम भी नहीं लेते नेता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बंद हैं औद्योगिक इकाइयां, नाम भी नहीं लेते नेता
Sun, 07 Apr 2019 11:55 PM IST
राकेश पांडेय
Santkabir Nagar
Santkabir Nagar
Published by: राकेश पांडेय
Updated Sun, 07 Apr 2019 11:55 PM IST
विज्ञापन
मगहर की कताई मिल
- फोटो : अमर उजाला
संतकबीरनगर। वो जनप्रतिनिधि बनेंगे हमारे। पर, क्या बात है कि वो हमारी ही बात नहीं करते। जी हां! यह सच है संतकबीरनगर लोकसभा सीट का। करीब दो दशक पूर्व विभिन्न उद्योगों के लिए मशहूर संतकबीरनगर जिले में अब गिने चुने उद्योग ही हैं। कभी लोगों को रोजगार देने वाली कताई मिल, छपाई मिल और चीनी मिल जैसे बड़े उद्योग यहां थे। हथकरघा जैसा कु टीर उद्योग जिले को विशिष्ट पहचान दिलाता था। राजनीतिक उपेक्षा के कारण ये इकाइयां बंद हैं। उपेक्षा के चलते हथकरघा कुछ परिवारों तक सिमट गया है। यहां के शिक्षित बेरोजगार दूसरे प्रदेशों में नौकरी ढूंढ रहे हैं। ताज्जुब की बात यह है कि उद्योग और रोजगार यहां के स्थानीय चुनावी मुद्दों में शामिल ही नहीं हैं।
खलीलाबाद शहर के बरदहिया बाजार निवासी अवध बिहारी मोदनवाल चुनावी चर्चा शुरू होते ही खींझकर कहते हैं कि नेताओं ने इस शहर को कंगाल बना दिया। शहर की खास पहचान चीनी मिल का अब अवशेष तक नहीं बचा है। चीनी मिल से मजदूरों को रोजगार के साथ-साथ किसानों को फसल का दाम भी मिलता था। परंतु न तो मिल को बचाने का प्रयास हुआ और न ही नई मिल लगाने का। बंजरिया मुहल्ले में रहने वाले रिटायर शिक्षक हीरालाल त्रिपाठी बताते हैं कि खलीलाबाद कस्बे को उद्योग के चलते ही जाना जाता था। उद्योगों की स्थापना के लिए किसानों से सस्ते दर पर जमीनें ली गईं लेकिन एक-एक सभी बंद होते चले गए। मगहर के रिटायर शिक्षक रामशंकर यादव और भोलू सिंह का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र कपड़ा बुनाई के चलते पूर्वांचल में विशेष स्थान रखता था लेकिन राजनीतिक उपेक्षा के चलते खलीलाबाद व मगहर की कताई व छपाई मिलें बंद हो गईं। हथकरघा जैसा कुटीर उद्योग भी संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रहा है। बेलहर क्षेत्र के किसान रामबेलास चौधरी और राधेश्याम कहते हैं कि वर्ष 1997 में जब खलीलाबाद (संतकबीरनगर) जिला बना तभी से इसकी दुर्दशा शुरू हो गई। पहले यहां बखिरा में बर्तन उद्योग के साथ-साथ बुनकरों का भी कारोबार था। खलीलाबाद में कई बड़ी मिलें थीं तो मगहर में भी कताई मिल के साथ-साथ गांधी आश्रम व हथकरघा था। परंतु अब कुछ भी नहीं बचा। यहां के जन प्रतिनिधियों न तो किसानों का भला किया और न ही मजदूरों का।
अब उद्योग की बात नहीं होती
बेरोजगारी का दंश झेल रहे यहां के नौजवानों के मन में बड़ी पीड़ा है। पान विक्रेता गुड्डू, सराफा दुकानदार उमेश वर्मा और होटल चलाने वाले मोनू कहते हैं कि बीते कई चुनावों से यहां मुद्दों की बात नहीं होती। उद्योग बर्बाद हो चुके हैं, सिंचाई के साधनों के अभाव में खेती प्रभावित हो रही है। प्रदूषण के चलते आमी का जल जहर बन चुका है। वहीं घाघरा और राप्ती की बाढ़ से जिले का उत्तरी व दक्षिणी छोर हर वर्ष प्रभावित होता है। भूगर्भ जल स्तर गिरने से गर्मी के दिनों में यहां के लोग पानी के लिए परेशान रहते हैं। परंतु यह सब भी अब चुनावी मुद्दा नहीं बनता।
विज्ञापन
विज्ञापन
खलीलाबाद शहर के बरदहिया बाजार निवासी अवध बिहारी मोदनवाल चुनावी चर्चा शुरू होते ही खींझकर कहते हैं कि नेताओं ने इस शहर को कंगाल बना दिया। शहर की खास पहचान चीनी मिल का अब अवशेष तक नहीं बचा है। चीनी मिल से मजदूरों को रोजगार के साथ-साथ किसानों को फसल का दाम भी मिलता था। परंतु न तो मिल को बचाने का प्रयास हुआ और न ही नई मिल लगाने का। बंजरिया मुहल्ले में रहने वाले रिटायर शिक्षक हीरालाल त्रिपाठी बताते हैं कि खलीलाबाद कस्बे को उद्योग के चलते ही जाना जाता था। उद्योगों की स्थापना के लिए किसानों से सस्ते दर पर जमीनें ली गईं लेकिन एक-एक सभी बंद होते चले गए। मगहर के रिटायर शिक्षक रामशंकर यादव और भोलू सिंह का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र कपड़ा बुनाई के चलते पूर्वांचल में विशेष स्थान रखता था लेकिन राजनीतिक उपेक्षा के चलते खलीलाबाद व मगहर की कताई व छपाई मिलें बंद हो गईं। हथकरघा जैसा कुटीर उद्योग भी संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रहा है। बेलहर क्षेत्र के किसान रामबेलास चौधरी और राधेश्याम कहते हैं कि वर्ष 1997 में जब खलीलाबाद (संतकबीरनगर) जिला बना तभी से इसकी दुर्दशा शुरू हो गई। पहले यहां बखिरा में बर्तन उद्योग के साथ-साथ बुनकरों का भी कारोबार था। खलीलाबाद में कई बड़ी मिलें थीं तो मगहर में भी कताई मिल के साथ-साथ गांधी आश्रम व हथकरघा था। परंतु अब कुछ भी नहीं बचा। यहां के जन प्रतिनिधियों न तो किसानों का भला किया और न ही मजदूरों का।
विज्ञापन
अब उद्योग की बात नहीं होती
बेरोजगारी का दंश झेल रहे यहां के नौजवानों के मन में बड़ी पीड़ा है। पान विक्रेता गुड्डू, सराफा दुकानदार उमेश वर्मा और होटल चलाने वाले मोनू कहते हैं कि बीते कई चुनावों से यहां मुद्दों की बात नहीं होती। उद्योग बर्बाद हो चुके हैं, सिंचाई के साधनों के अभाव में खेती प्रभावित हो रही है। प्रदूषण के चलते आमी का जल जहर बन चुका है। वहीं घाघरा और राप्ती की बाढ़ से जिले का उत्तरी व दक्षिणी छोर हर वर्ष प्रभावित होता है। भूगर्भ जल स्तर गिरने से गर्मी के दिनों में यहां के लोग पानी के लिए परेशान रहते हैं। परंतु यह सब भी अब चुनावी मुद्दा नहीं बनता।
विज्ञापन