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फूलों की खेती से मालामाल होने का सपाना मुरझाया
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चंदौसी के ग्राम गोपालपुर में गेंदे के फूलों की बिक्री न होने पर घूरे पर फेंकता माली हरेंद्र कुमार
- फोटो : SAMBHAL
चंदौसी/संभल। फूल कभी भगवान के चरणों की शोभा को बढ़ाने के काम आते थे तो कभी वर-वधू की जयमाला में सजकर इतराते थे। अब उन फूलों का बुरा हाल है। लॉकडाउन में बाजार बंद हैं। फूल खेतों में मुरझा रहे हैं और खरीदार नहीं मिल रहे हैं। कई किसान फूलों की खेती बंद कर दूसरी फसल के लिए अपने खेत की जुताई कर रहे हैं। कुछ किसानों ने गेंदे के फूल बिक्री के लिए तोड़े पर जब कहीं कोई बाजार नहीं मिला तो टूटे हुए फूलों को खेत के किनारे ही कूड़े में फेंक दिया। वहीं गुलाब के फूल सुखाकर रखे जा रहे हैं ताकि गुलकंद बनाने में काम आ जाए।
प्रति वर्ष फूलों की खेती के लिए नवरात्र से बहार आती है। गेंदा के फूलों की फसल तब तक तैयार होती है और फूलों को बिक्री के लिए नवरात्र के पहले दिन से ही बड़ा बाजार मिल जाता है। चंदौसी क्षेत्र में करीब एक सौ किसान फूलों की खेती करते हैं। संभल और मुरादाबाद तथा आसपास के इलाके में फूलों की जरूरत पूरी होती है। नवरात्र के बाद शादी ब्याह की सहालग शुरू होती है और यह समय बहुत फायदे का माना जाता है। लेकिन लॉक डाउन में फूलों की बिक्री बंद हो गई है। न मंदिरों में भक्त जा रह हैं और न ही भगवान का फूल बंगला सज रहा है। न ही शादी ब्याह की जरूरत निकल रही है।
इसलिए फूलों की खेती करने वाले किसान और फूलों की बिक्री करने वाले दुकानदार संकट में हैं। फूल खेतों में मुरझा रहे हैं और किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं। उमरा गोपालपुर गांव में फूलों को कूड़े के ढेर पर फेंका गया है। यह वही फूल हैं जो कभी भगवान के चरणों की शोभा बनते थे और कभी वर वधू की जयमाल बनकर परिणय को सफल बनाते थे। फूलों की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं हुई है। उमरा गोपालपुर गांव ही कुछ किसानों ने अपने फूलों के खेतों में जुताई करा दी और फूलों वाले खेत में धान की रोपाई की तैयारी की जा रही है। कुछ किसान ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने फूलों के आधे खेत को खाली कर लिया और आधे खेत में फूलों की खेती इसलिए जारी रखी है कि लॉक डाउन के बाद बाजार मिल जाएगा। किसान एक-एक दिन लॉक डाउन खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं।
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फूलों के खेत की जुताई कर अब अगली फसल लगाएंगे
चंदौसी। लॉक डाउन लंबा खिंचा और जब फूलों का कोई खरीदार न मिला तो उमरागोपालपुर के रघुनाथ ने अपने फूलों के खेत में जुताई कर दी। अब वे कोई दूसरी फसल करेंगे। इसी तरह से फूलों की खेती करने वाले किसान सुशील कुमार ने अपने चार बीघा के खेत में फूलों के पौधे नष्ट कर जुताई कर दी है। दो बीघा खेत में अभी फूल हैं। लॉक डाउन खुलने का इंतजार किया जा रहा है। उमरा गोपालपुर गांव निवासी हरेंद्र कुमार ने 5 बीघा गेंदा के खेत में हैरो ट्रैक्टर चलवा दिया। वहीं संजय सैनी ने 6 बीघा गेंदा फूल की फसल ट्रैक्टर से पलटवा दी है। किसान अमीरचंद माली ने फूल की 4 बीघा फसल काटकर गांव के बाहर फेंकी है।
इन गांवों में होती है फूलों की खेती
चंदौसी। उमरा गोपालपुर, खासेपुर, कुंवरपुर में किसान फूलों की खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। तकरीबन 80 बीघा भूमि में विभिन्न किसानों द्वारा अकेले उमरा गोपालपुर गांव में ही फूलों की खेती की जाती है। विभिन्न प्रकार की प्रजाति के गेंदा, गुलाब के फूल यहां पैदा हो रहे हैं। फसल फूलों की उम्र भी अलग-अलग होती है। गेंदा का पौधा दो माह तक चलता है। छह बीघा खेत में लगे गेंदे के फूल से तकरीबन एक लाख रुपये की आय होती है।
किसी भाव में नहीं मिल रहे फूलों के खरीदार
चंदौसी। अमूमन गेंदा फूल का भाव 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है। शादी के सीजन में यह 100-150 रुपये प्रति किलो के भाव बिक जाते हैं। वहीं गुलाब की फसल एक बार बोने पर तीन साल तक चलती है। 6 बीघा गुलाब के खेत से प्रतिदिन 15 किलो गुलाब के फूल चुने जाते हैं। इसके भाव भी ऑफ सीजन सौ से डेढ़ सौ रुपये प्रति किलो तक रहते हैं। वहीं सीजन में इसके भाव दो सौ से ढाई सौ रुपये प्रति किलो तक हो जाते हैं पर इस समय किसी भाव का खरीदार नहीं मिल रहा है।
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प्रति वर्ष फूलों की खेती के लिए नवरात्र से बहार आती है। गेंदा के फूलों की फसल तब तक तैयार होती है और फूलों को बिक्री के लिए नवरात्र के पहले दिन से ही बड़ा बाजार मिल जाता है। चंदौसी क्षेत्र में करीब एक सौ किसान फूलों की खेती करते हैं। संभल और मुरादाबाद तथा आसपास के इलाके में फूलों की जरूरत पूरी होती है। नवरात्र के बाद शादी ब्याह की सहालग शुरू होती है और यह समय बहुत फायदे का माना जाता है। लेकिन लॉक डाउन में फूलों की बिक्री बंद हो गई है। न मंदिरों में भक्त जा रह हैं और न ही भगवान का फूल बंगला सज रहा है। न ही शादी ब्याह की जरूरत निकल रही है।
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इसलिए फूलों की खेती करने वाले किसान और फूलों की बिक्री करने वाले दुकानदार संकट में हैं। फूल खेतों में मुरझा रहे हैं और किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं। उमरा गोपालपुर गांव में फूलों को कूड़े के ढेर पर फेंका गया है। यह वही फूल हैं जो कभी भगवान के चरणों की शोभा बनते थे और कभी वर वधू की जयमाल बनकर परिणय को सफल बनाते थे। फूलों की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं हुई है। उमरा गोपालपुर गांव ही कुछ किसानों ने अपने फूलों के खेतों में जुताई करा दी और फूलों वाले खेत में धान की रोपाई की तैयारी की जा रही है। कुछ किसान ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने फूलों के आधे खेत को खाली कर लिया और आधे खेत में फूलों की खेती इसलिए जारी रखी है कि लॉक डाउन के बाद बाजार मिल जाएगा। किसान एक-एक दिन लॉक डाउन खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं।
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फूलों के खेत की जुताई कर अब अगली फसल लगाएंगे
चंदौसी। लॉक डाउन लंबा खिंचा और जब फूलों का कोई खरीदार न मिला तो उमरागोपालपुर के रघुनाथ ने अपने फूलों के खेत में जुताई कर दी। अब वे कोई दूसरी फसल करेंगे। इसी तरह से फूलों की खेती करने वाले किसान सुशील कुमार ने अपने चार बीघा के खेत में फूलों के पौधे नष्ट कर जुताई कर दी है। दो बीघा खेत में अभी फूल हैं। लॉक डाउन खुलने का इंतजार किया जा रहा है। उमरा गोपालपुर गांव निवासी हरेंद्र कुमार ने 5 बीघा गेंदा के खेत में हैरो ट्रैक्टर चलवा दिया। वहीं संजय सैनी ने 6 बीघा गेंदा फूल की फसल ट्रैक्टर से पलटवा दी है। किसान अमीरचंद माली ने फूल की 4 बीघा फसल काटकर गांव के बाहर फेंकी है।
इन गांवों में होती है फूलों की खेती
चंदौसी। उमरा गोपालपुर, खासेपुर, कुंवरपुर में किसान फूलों की खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। तकरीबन 80 बीघा भूमि में विभिन्न किसानों द्वारा अकेले उमरा गोपालपुर गांव में ही फूलों की खेती की जाती है। विभिन्न प्रकार की प्रजाति के गेंदा, गुलाब के फूल यहां पैदा हो रहे हैं। फसल फूलों की उम्र भी अलग-अलग होती है। गेंदा का पौधा दो माह तक चलता है। छह बीघा खेत में लगे गेंदे के फूल से तकरीबन एक लाख रुपये की आय होती है।
किसी भाव में नहीं मिल रहे फूलों के खरीदार
चंदौसी। अमूमन गेंदा फूल का भाव 60 रुपये प्रति किलोग्राम तक रहता है। शादी के सीजन में यह 100-150 रुपये प्रति किलो के भाव बिक जाते हैं। वहीं गुलाब की फसल एक बार बोने पर तीन साल तक चलती है। 6 बीघा गुलाब के खेत से प्रतिदिन 15 किलो गुलाब के फूल चुने जाते हैं। इसके भाव भी ऑफ सीजन सौ से डेढ़ सौ रुपये प्रति किलो तक रहते हैं। वहीं सीजन में इसके भाव दो सौ से ढाई सौ रुपये प्रति किलो तक हो जाते हैं पर इस समय किसी भाव का खरीदार नहीं मिल रहा है।