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भोले की भक्ति में डूबे यामीन, लेकर निकले कांवड़
संभ्ाल/अमर उजाला ब्यूराे
Updated Fri, 24 Feb 2017 02:07 AM IST
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हरिद्वार से कांवड़ लेकर आते मो.यामीन।
- फोटो : अमर उजाला
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हिंदु-मुस्लिमों को बांटने के लिए तरह-तरह हथकंडे अपना रहे हैं, ऐसे में यामीन खां एक मिसाल बनकर उभरे हैं। अल्लाह की इबादत के साथ वह भोले भंडारी के भी इतने दीवाने हैं कि अपने हिंदू भाइयों के साथ हरिद्वार से कांवड़ लेकर आते हैं और पूरे विधि विधान से मंदिर में जलाभिषेक करते हैं। वह ऐसा पहली बार नहीं कर रहे, ये सिलसिला पिछले आठ साल से चला आ रहा है।
जो लोग उन्हें जानते हैं वह उनको ऐसा करते देख चौंकते हैं, लेकिन उन पर र्कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी धुन के पक्के यामीन महाशिवरात्रि पर कांवड़ लाकर लोगों के सामने नजीर पेश कर रहे हैं। तहसील क्षेत्र के गांव सतूपुरा निवासी बाबू खां का बेटे यामीन खां पिछले आठ वर्ष से हरिद्वार से कांवड़ लेने के लिए हिंदु समाज के लोगों के साथ जाते हैं। इस बार भी वह गांव के कांवड़ियों के जत्थे के साथ हरिद्वार गए थे। चार दिन तक हरिद्वार से सतूपुरा तक की मंजिल पैदल ही पार करके वह गांव पहुंचे। इतनी दूरी तय करने के बाद भी यामीन खां काफी खुश नजर आ रहे थे। थकान उनके चेहरे से कोसों दूर नजर आ रही थी। वह अन्य कांवड़ियों के साथ बम-बम भोले के जयकारे लगाते हुए चल रहे थे। खां ने बताया कि वह पिछले आठ वर्ष से कांवड़ लेकर आ रहे हैं। हर बार पैदल ही आते हैं। जब ये समय आता है तो उन्हें बहुत खुशी होती है।
बोले, लोग कुछ कहें, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। ईश्वर एक है। ऐसा सभी कहते हैं। कोई मस्जिद में नमाज पढ़ता है, तो कोई मंदिर में पूजा करता है। मस्जिद और मंदिर में जाने वाले लोग भगवान को ही याद करते हैं, तो फिर कांवड़ लाओ या फिर नमाज पढ़ो, क्या फर्क पड़ता है। बस इबादत का तरीका अलग है, काम तो एक ही हो रहा है।
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जो लोग उन्हें जानते हैं वह उनको ऐसा करते देख चौंकते हैं, लेकिन उन पर र्कोई फर्क नहीं पड़ता। अपनी धुन के पक्के यामीन महाशिवरात्रि पर कांवड़ लाकर लोगों के सामने नजीर पेश कर रहे हैं। तहसील क्षेत्र के गांव सतूपुरा निवासी बाबू खां का बेटे यामीन खां पिछले आठ वर्ष से हरिद्वार से कांवड़ लेने के लिए हिंदु समाज के लोगों के साथ जाते हैं। इस बार भी वह गांव के कांवड़ियों के जत्थे के साथ हरिद्वार गए थे। चार दिन तक हरिद्वार से सतूपुरा तक की मंजिल पैदल ही पार करके वह गांव पहुंचे। इतनी दूरी तय करने के बाद भी यामीन खां काफी खुश नजर आ रहे थे। थकान उनके चेहरे से कोसों दूर नजर आ रही थी। वह अन्य कांवड़ियों के साथ बम-बम भोले के जयकारे लगाते हुए चल रहे थे। खां ने बताया कि वह पिछले आठ वर्ष से कांवड़ लेकर आ रहे हैं। हर बार पैदल ही आते हैं। जब ये समय आता है तो उन्हें बहुत खुशी होती है।
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बोले, लोग कुछ कहें, उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। ईश्वर एक है। ऐसा सभी कहते हैं। कोई मस्जिद में नमाज पढ़ता है, तो कोई मंदिर में पूजा करता है। मस्जिद और मंदिर में जाने वाले लोग भगवान को ही याद करते हैं, तो फिर कांवड़ लाओ या फिर नमाज पढ़ो, क्या फर्क पड़ता है। बस इबादत का तरीका अलग है, काम तो एक ही हो रहा है।
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